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सरकार का नया दांव : जनसंख्या नियंत्रण कानून…

By   /  January 21, 2020  /  No Comments

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-श्याम मीरा सिंह के साथ राजीव मित्तल।।

मुस्लिमों को काउंटर करने के लिए भाजपा के कई राष्ट्रवादी नेता हिन्दुओं को दस – दस बच्चे पैदा करने की सलाह बड़े जोरों से देते आ रहे हैं, लेकिन मोहन भागवत को गैलपिंग कर रही देश की आबादी पर नियंत्रण लगाने का जैसे ही इहलाम हुआ, तो अब यह मामला भी देशभक्ति बन ठाठे मारने लगा है..

1938 से ही देश की बढ़ती आबादी पर चिंता व्यक्त करते रहे जवाहरलाल नेहरु ने आज़ादी के फौरन बाद प्रधानमंत्री बनते ही परिवार नियोजन को अमलीजामा पहनाया, जो सबसे ज़्यादा संघ परिवार को खटका था लेकिन अब “ताकत वतन की हमसे है” टाइप ‘जनसंख्या कानून’ ला कर देश भर को मोहने की यह योजना एक ऐसा मुद्दा है, जिसके चलते मोदी-शाह के महत्व का उछालें मारना तय है.

हालांकि इस कानून के बनने पर देश का हाल नोटबंदी और एनसीआर या सीसीए जैसा ही होना है क्योंकि सारा काम हड़बड़ी में होगा..सरकार इसकी टेक्निकेलिटीज को जानती है, लेकिन फिर भी वह इसे देश पर थोपने के लिए एकदम रेडी ही है क्योंकि डीमोनेटाइजेशन की तरह इस मुद्दे से भी नरेंद्र मोदी की नायक वाली छवि गढ़ने में मदद मिलनी है.

अमित शाह भाषण में कहेंगे कि ये देशहित में है, कार्यकर्ता आपस में व्हाट्सएप पर भेजेंगे कि मुसलमानों को मोदी जी ने मजा चखा दिया. अंततः मुद्दा देशभक्ति बनाम देशद्रोही हो जाना है. असली मुद्दे हमेशा की तरह हवा हो जाएंगे.

अब आइए इससे जुड़ी टेक्निकेलिटीज पर, जिसके बारे में मीडिया या तो मूर्खता दिखाएगा या चुप्पी मार जाएगा..इसके पीछे क्या टेक्निकेलिटीज हैं ये जानने के लिए पूरा सब्र चाहिए – आइए देखें..

  1. सबसे पहले ‘प्रजनन दर’ क्या है ये समझना जरूरी है, प्रजनन दर मतलब है, अपने जीवनकाल में एक औरत कितने बच्चे जन सकती है. यदि किसी देश की प्रजनन दर 3 है तो इसका मतलब ये है कि वहां की औरतें औसतन तीन बच्चे पैदा करती हैं.
  2. इस कानून से रिलेटेड एक और टर्म को समझने की जरूरत है, जिसे ‘रिप्लेसमेंट रेट’ कहते हैं, इसका सादा सा अर्थ है जन्म और मृत्यु की संख्या बराबर होना, यानी इस रेट पर जनता न बढ़ेगी, न घटेगी. तकनीकी तौर पर रिप्लेसमेंट रेट को 2.1 माना जाता है. यानी ऐसे देश में एक औरत औसतन दो बच्चों को जन्म देंगी, और उस देश का जनसंख्या स्थिर हो जाएगी. प्रजनन दर 2 से मोटामाटी मतलब है कि एक लड़का होगा, एक लड़की होगी. दोनों ही अगली पीढ़ी के प्रजनन के लिए आवश्यक हैं. इनमें से कोई भी कम हुआ तो उस देश की डेमोग्राफी गड़बड़ा सकती है. जो पहले से ही गड़बड़ाई हुई है..
  3. अब आते हैं प्रजनन दर पर..भारत जब आजाद हुआ था तब यह औसतन 6 हुआ करती थी, यानी भारत में एक औरत लगभग 6 बच्चों को जन्म दिया करती थी, लेकिन अब वह दर घटकर 2.2 हो चुकी है. यानी भारत रिप्लेसमेंट रेट के काफी करीब पहुंच चुका है. इसके आगे देश की जनसंख्या स्थिर हो जाएगी, और एक वक्त वह भी आएगा जब देश की जनसंख्या घटने लगेगी. भारत के बहुत से प्रदेश तो ऐसे हैं जो जनसंख्या दर को नियंत्रित कर चुके हैं, वहां रिप्लेसेबल रेट 2 से भी कम है- जैसे केरल, कर्नाटक, पंजाब, तमिलनाडु, तेलंगाना, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल. असल में जनसंख्या नियंत्रण उत्तर भारत के कुछ प्रदेशों की प्रॉब्लम है न कि पूरे देश की. हालांकि उत्तरी राज्यों में भी जनसंख्या दर पिछले सालों में संतोषजनक रूप से घटी है, वह भी बिना किसी अभियान के.
  4. इसका मतलब है कि बिना कोई खास कानून लाए भी जनता को जागरूक करके जनसंख्या पर नियंत्रण पाया जा सकता है. जैसे निरोध बाँटकर, जैसे कि स्त्री-पुरुषों को ऑपरेशन के लिए प्रोत्साहित कर.
  5. कानूनी रूप से बच्चों की पैदाइश पर रोक लगाने के क्या परिणाम सामने आएंगे, इसके लिए हमें चीन के उदाहरण को समझना होगा. जिस चीन की नजीर देते हुए इस देश में जनसंख्या कानून लाने की बात की जा रही है, उसके बारे में बड़े मुग्ध भाव से हम भारतीयों को ये तो बताया जाता रहा है कि जनसंख्या नियंत्रण के लिए वहां कोई ऐसी कारगर नीति लाई गई है. लेकिन ये कभी नहीं बताया गया है कि इस नीति के दुष्परिणामों के चलते चीन को भी अपने यहां उस नीति को 2015 में ही खत्म करना पड़ गया.. चीन ने भी अपने यहां, बच्चों की संख्या पर रोक लगाने वाले कानून को वापस ले लिया है, जबकि चीन पूरी दुनिया में सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है.
  6. चीन ने 1979 में ‘एक बच्चे की नीति’ लाई थी, इससे हुआ ये कि चीन में लड़कियों की संख्या गिर गई. चूंकि लोगों के पास एक बच्चे का ही ऑप्शन था इसलिए लोग उसके लिए ‘लड़के’ को प्राथमिकता देने लगे, इसका परिणाम ये हुआ कि चीन में लड़के ज्यादा हो गए, लड़कियां कम हो गईं. लिंगानुपात बुरी तरह से प्रभावित हुआ.
  7. भारत जैसे देश में यदि बच्चों की संख्या पर रोक लगाई गई तो उसका सबसे ज्यादा बुरा प्रभाव स्त्रियों पर ही पड़ेगा, एबॉर्शन की संख्या तेजी से बढ़ जाएगी, अब तक चोरी छुपे मारी जा रही है, फिर तो बेटियां खुलेआम कोख में मारी जाएंगी..
  8. जिन देशों में जनसंख्या पर कृत्रिम रोक लगाई जाती है वहां देखा गया है कि काम करने वाले युवाओं की संख्या घट जाती है, यानी वहां बड़े-बूढ़ों की संख्या बढ़ जाती है, आज भारत में नौजवानों की संख्या ज्यादा है, जिसे रोजगार देकर देश के विकास के काम में लगाया जा सकता है. अंग्रेजी में इसे डेमोग्राफिक डिविडेंड कहते हैं. लेकिन सरकार रोजगार पैदा करने, इंडस्ट्रीज खड़ी करने जैसे उपायों पर काम करने के बजाय जनसंख्या नियंत्रण के हवाबाजी वाले उपायों में अधिक रुचि दिखा रही है.
  9. भारत जैसे गरीब और अपढ़ देश में जहां आज भी निरोध (कंडोम) को लेकर पर्याप्त जानकारी नहीं है, अगर जानकारी है भी तो लोग सहज रूप से उपयोग ही नहीं करते, या हर रोज निरोध यूज करना उनके लिए आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं है. जिस कारण अक्सर अनुचित गर्भधारण हो जाता है. यदि जनसंख्या के लिए सख्त कानून होगा तो अंततः गरीबों को ही प्रभावित करेगा. क्योंकि एबॉर्शन कराना उनके लिए तो बिल्कुल भी आसान नहीं है.
  10. संवैधानिक रूप से भी ऐसा कोई भी कानून व्यक्ति के ‘जीवन जीने के अधिकार’ को संकुचित करता है, ये किसी औरत की आजादी पर भी प्रतिबंध लगाता है कि उसे कितने बच्चों को जन्म देना है, कितनों को नहीं. एक आधुनिक समाज में, राज्य या राजा, किसी व्यक्ति की आजादी में इतना दखल दे बिल्कुल भी उचित नहीं है. ये राज्य तय नहीं करेगा कि बैडरूम में क्या करना है, कितने गर्भ धारण करने हैं, ये तय करने का अधिकार व्यक्ति के विवेक पर छोड़ देना चाहिए. एक परिपक्व लोकतंत्र में राज्य की शक्तियां सीमित होती हैं, और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को धीरे धीरे अधिक विस्तृत किया जाता है. लेकिन जनसंख्या नियंत्रण जैसा कोई भी कानून, नागरिकों के व्यक्तिगत अधिकारों पर संसद के नियंत्रण को बढ़ा देगा जो लोकतंत्र के एकदम खिलाफ है, हम जनसंख्या नियंत्रण के उपायों के लिए चीन का उदाहरण देते हैं, लेकिन हम चीन नहीं हैं न! हमारे यहां व्यक्तिगत आजादी का अपना महत्व है.
  11. बच्चों की संख्या पर कृत्रिम रोक प्रकृति विज्ञान की दृष्टि से भी अनुचित है, चीन में इससे जनसंख्या पर नियंत्रण करने में मदद जरूर मिली थी, लेकिन वहां लिंगानुपात, और कामगारों की क जैसी और अधिक बड़ी समस्याएं पैदा हो गईं हैं. बूढ़ी होती जनसंख्या और काम करने वाले नौजवानों की कम होती जनसंख्या के कारण चीन में अब श्रम का भाव बढ़ रहा है इसके चलते वहां लेबर मार्केट संकट में आ गया है..मजदूरी बढ़ने के कारण ही चीन का वस्त्र उद्योग और चमड़ा उद्योग भी विश्व बाजार में कम्पीटीटिव नहीं रहा है. यही कारण है कि इन दोनों क्षेत्रों में चीन का विश्व बाजार वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देशों ने हथियाना शुरू कर दिया है जहां काम करने वाले नौजवान कम मजदूरी में अधिक संख्या में उपलब्ध हैं.
  12. सरकार जनसंख्या के वाजिब उपायों पर काम न करके, नौजवान लोगों को रोजगार न देकर, जनसंख्या कानून की हवाबाजी में देश की जनता को उलझाए रखना चाहती है. जो अपने आप में एक असफल मॉडल है. लेकिन सरकार जानती है कि उसके हाथ ऐसा फॉर्मूला है जिसे आसानी से हिन्दू-मुसलमान का खेल खेला सकता है. अब जबकि भारत की प्रजनन दर स्थिर होने को है, वो रिप्लेसेबल रेट के लगभग पास है, तब बिना कानून भी भारत की जनसंख्या एक समय के बाद स्थिर होने वाली है.

लेकिन सरकार को इस काम के लिए भी अपने नेता को नायक बनाना है, जिससे लगे कि भारत को ऐसा प्रधानमंत्री मिला है जो ठोस निर्णय लेने में पीछे नहीं हटता. लेकिन कोई यह बताएगा कि 1977 के बाद से और अब तक बारह साल केंद्र की सत्ता में गुजार चुकी भाजपा सरकारों ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए कौन-कौन से वाजिब उपाय किए हैं?

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  • Published: 1 month ago on January 21, 2020
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  • Last Modified: January 21, 2020 @ 12:33 pm
  • Filed Under: देश

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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