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योगी यूपी के मुख्यमंत्री हैं कोई डॉन नहीं..

By   /  January 23, 2020  /  No Comments

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-सुरेन्द्र ग्रोवर||
यूपी के मुख्यमंत्री योगी अक्सर भूल जाते है कि वे अब सिर्फ गोरखपुर पीठ के महंत नहीं बल्कि लोकतान्त्रिक देश के एक राज्य के मुख्यमंत्री हैं और धमकी भरी भाषा उन्हें एक डॉन की तरह पेश करती है. नागरिकता संशोधन अधिनियम को लेकर देश भर में महिलायें इसे काला कानून बताते हुए इसके विरोध में सड़कों पर उतरी हुई हैं और यह उनका अधिकार भी है कि वे इस तरह अपना विरोध प्रदर्शित करें, लेकिन योगी आदित्यनाथ इस विरोध के चलते बुरी तरह बौखला गए हैं और आने वाली पीढ़ियों तक को याद रखने वाली सज़ा देने की धमकियां देने में लगे हैं.
आदित्यनाथ योगी कुछ दिनों पहले लखनऊ में हुए प्रदर्शनों के दौरान बदला लेने की घोषणा कर पुलिस को उकसा चुके हैं और इसके बाद से लगातार यूपी पुलिस द्वारा आम जनता पर किये जा रहे जुल्मो सितम के ढेरों वीडियोज सोशल मीडिया पर लगातार वायरल हो रहे हैं. अब उन्होंने कानपुर में भी ऐसा ही बयान देकर उत्तरप्रदेश पुलिस को जुल्मो सितम ज़ारी रखने की खुली छूट दे दी है. योगी जी अक्सर भूल जाते हैं कि अपनी जनता के लिए इस तरह दमन की भाषा बोलना संविधान की लोक कल्याणकारी भावना को ज़मींदोज कर देना होता है. मुख्यमंत्री होने के नाते वे राज्य की जनता के संरक्षक हैं और उनका पहला फर्ज़ आमजन की रक्षा करना है.
योगी आदित्यनाथ को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि गुरु गोरखनाथ ने भी कभी ऐसी भाषा का उपयोग नहीं किया जबकि उनके समुदाय के लोग जैसे नाथ और सपेरे समुदाय के लोगों को देश के किसी हिस्से में बसने की ही अनुमति नहीं थी और पूरे समुदाय को दर दर भटकते रहना होता था. ऐसे में देश की जनता के सामने नागरिकता जैसा खतरा मंडरा रहा हो तो वे उनके प्रति मानवीय संवेदना रखने की बजाय उन नागरिकों को धमकियां कैसे दे सकते हैं? क्या उन्हें नाथ समुदाय की पीड़ा पता नहीं?

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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