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जवाबदेही से परे कोई नहीं, सवाल दागिये..

By   /  January 29, 2020  /  No Comments

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-श्याम मीरा सिंह।।

जवाबदेहिता से परे कोई नहीं है. यदि कल को रवीश कुमार किसी खास मजहब, खास जाति-वर्ग के खिलाफ स्टूडियो से जहर उगलें, विश्वविद्यालयों को टुकड़ों पर पलने वाला कहें, देश के विपक्षी नेताओं को राजनीति सेंकने वाला और सरकार के चरणों में रीढ़ की हड्डी झुका दें. दूसरी विचारधाराओं वालों को देशद्रोही कहें, तो देश के नागरिकों को पूरा हक है, अवसर मिलने पर गलेबान न खींचे तो कम से कम उनसे सवाल तो करें. उन्हें देश के नागरिकों को एक धर्मांध भीड़ में बदलने से रोकें, उन्हें लोकतंत्र को कुचलने से रोकें.

मीडिया और लोकतंत्र को रीएस्टेब्लिश करने के लिए ये सबसे बड़ा नागरिक कर्तव्य बन गया है कि सबके नाम ले लेकर दलाल कहा जाए, चोर कहा जाए. यदि मैं एक धर्मांध-अवैज्ञानिक, मूढ़ भीड़ तैयार करने लगूं तो मैं चाहता हूं कि मेरी गलेबान पकड़ने वाले सबसे पहले आप हों. किसी को भी इस मुल्क को बरबाद करने का हक नहीं है. न पूंजीपतियों, न व्यापारियों को, न ऊंची जातियों को, न किसी खास संगठन को, न अध्यापकों को.

सभ्यता का तकाजा यही है कि ऐसे लोगों की आंखों में आंखें डालकर बात की जाए, जहां अवसर मिले इन्हें इनकी करतूतों का अहसास कराया जाए. रवीश ही नहीं, बरखा मिले, कन्हैया मिले, चंद्रशेखर आजाद मिले, शशि थरूर मिले. जो भी देश के नागरिकों को बांटने का, दो मजहबों के बीच घृणा फैलाने का काम करे उससे सवाल पूछे जाने ही चाहिए.

सुधीर चौधरी, अर्नब गोस्वामी, अमिश देवगन को कोई हक नहीं है कि एक बन्द कमरे के स्टूडियो में इतना जहर भर दें कि देश की एकता, अखंडता, भाईचारा, स्वतंत्रता ही खतरे में आ जाए.

सभ्यता के कथित खांचे तोड़ दीजिए, जहां मिलें इनके खिलाफ नारे लगाइए, इन्हें शेम कहिए. इससे पहले देर हो जाए. इनके किए का अहसास कराने का कोई भी अवसर मत छोड़िए.

निरंकुश दलाल मीडिया को संयमित करना, उससे सवाल करना, उसके प्रोपोगेंडा को एक्सपोज करना ही आज के दौर की सबसे बड़ी देशभक्ति है, संविधान की सच्ची पूजा है. जिंदा नागरिकों का सबसे पहला कर्तव्य है.

आप ऐसे नरभक्षियों के सामने “वेल एडुकेटेड सभ्य” बने रहेंगे तो एक दिन ये नरभक्षी पूरे देश को असभ्य बना देंगे. वक्त आ गया है कि मीडिया से सवाल पूछा जाए. क्योंकि मीडिया ही है जो आपके लोकतांत्रिक अधिकारों को कुंद कर रहा है। मीडिया ही है जो आपके संविधान को अप्रसांगिक कर रहा है. मीडिया ही है जो आपके नागरिक होने को खत्म कर रहा है. उससे पहले कि सब खत्म हो जाए, देश मूढ़ नागरिकों का झुंड बन कर रह जाए. मीडिया से सवाल करना शुरू कर दीजिए.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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