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…और दिल्ली की ‘जनता’ ने दंड दे दिया

By   /  January 31, 2020  /  No Comments

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-संजय कुमार सिंह।।

दिल्ली विधानसभा चुनाव की शुरुआत से पहले दिल्ली विकास प्राधिकरण द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में गृहमंत्री अमित शाह ने कहा था कि दिल्ली में अशांति के लिए कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में टुकड़े-टुकड़े गैंग ज़िम्मेदार है, इनको दंड देने का समय आ गया है। दिल्ली की जनता ने दंड देना चाहिए। मैंने इसे दिल्ली में भाजपा के चुनाव प्रचार का नमूना माना था। गृहमंत्री ने तो मतदान के जरिए सजा देने की बात की थी पर जो टुकड़े-टुकड़े गैंग गृहमंत्रालय के रिकार्ड में है ही नहीं उसे चुनाव में कैसे दंड दिया जाए?

इसलिए जो मतदाता नहीं हैं उनकी अपनी समस्या थी और जिस बच्चे को अक्ल समझ नहीं है उसकी बात अलग है। हमलावर दिल्ली का है भी नहीं। लेकिन, रैली या चुनावी भाषण में यह नहीं कहा जाता है कि जनता मतदान के जरिए ही दंड दे सकती है उसके पास और कोई तरीका नहीं है। पर कुछ लोग कानून हाथ में लेते हैं और (शायद प्रेरित भी होते हैं)। ऐसे ही एक राम भक्त ने कल दिल्ली में गोली चला दी और पुलिस देखती रही। हिन्दी के अखबार तो इस घटना की रिपोर्ट अपने अंदाज में अपनी औकात के अनुसार करेंगे। टेलीग्राफ का यह पन्ना देखिए और उसकी खबर का अनुवाद पढ़िए। आपके अखबार अगर कायदे से खबर बता रहे होते तो मुमकिन है कोई बच्चा गोली मारने के लिए प्रेरित नहीं होता।

अखबार में सबसे ऊपर नरेन्द्र मोदी की फोटो है और उसका कैप्शन है – बाईं तरफ की पीटीआई की तस्वीर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गुरुवार को गांधी स्मृति में महात्मा गांधी को नमन करते हुए दिखाए गए हैं। 72 साल पहले यहां राष्ट्रपिता की हत्या की गई थी। अब वहां फूलों से ढंके इस बलिदान स्मारक में महात्मा गांधी के अंतिम शब्द लिखे हैं और उनकी हत्या की तारीख व समय दर्ज है : हे राम, 5.17 सांयकाल, 30-1-1948।

महात्मा गांधी की हत्या के 72 वर्ष पूरे होने पर नरेन्द्र मोदी ने गुरुवार को कहा, बापू के आदर्श हमें एक मजबूत, सक्षम और संपन्न नया भारत बनाने के लिए प्रेरित करते रहेंगे। इसके बाद अखबार ने लिखा है, प्रधानमंत्री जी, आपके नए भारत के हत्यारों ने बापू के अमर, हे राम को हे राम भक्त में बदल दिया है। अखबार की इस खबर का शीर्षक है, मंत्री रैली (में) : गोली मारो। युवक कर दिखाता है।

फिरोज एल विनसेनट की बाईलाइन वाली खबर इस प्रकार है, एक स्वघोषित राम भक्त ने गुरुवार को दोपहर बाद दिल्ली की सड़क पर जामिया मिलिया इस्लामिया मार्च के दौरान एक छात्र को गोली मारकर घायल कर दिया। उस समय व चीख रहा था, आओ तुम्हे आजादी देता हूं। दो दिन पहले एक केंद्रीय मंत्री ने रैली में कहा था, गोली मारो। जम्मू और कश्मीर के एमए जनसंचार के छात्र शदाब फारुक को बाएं हाथ में गोली लगी है। उस समय वह अपने साथियों के साथ महात्मा गांधी के स्मारक की ओर बढ़ रहा था जिनकी हत्या 1948 में आज ही के दिन हिन्दू राष्ट्रवाद के एक समर्थक नाथू राम गोड्से ने कर दी थी। गुरुवार के शूटर ने अपनी पहचान रामभक्त गोपाल के रूप में दी।

पुलिस ने शुरू में उसकी आयु 19 साल बताई पर बाद में कहा कि वह बच्चा है और 17 साल का है। वह एक देसी पिस्तौल लहरा रहा था और गोली चलाने से पहले आधे मिनट से ज्यादा देर तक मार्च करने वालों को धमकाता रहा। पुलिस क्रिकेट पिच की लंबाई के बराबर दूरी से देखती रही पर हिली नहीं।

फोटो कैप्शन : खाकी में दर्शक – रायटर के फोटोग्राफर दानिश सिद्दीक की इस तस्वीर में दिखाई दे रहा है कि रामभक्त गोपाल गुरुवार को दिल्ली में जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के पास प्रदर्शनकारियों की ओर पिस्तौल ताने हुए है। वह पीछे की ओर बढ़ रहा था तो उसके पीछे 20-30 मीटर दूर रायट पुलिस लाइन में खड़ी देख रही थी। पुलिस वाले, इनमें कम से कम एक अपनी बांह मोड़े दिख रहा है, दर्शक की तरह खड़े रहे। और बंदूकची से निपटने के लिए कुछ नहीं किया। भारत में रायटर के प्रमुख फोटोग्राफर सिद्दीक ने कहा, जब प्रदर्शन शुरू हुआ तो तत्काल कोई खतरा नहीं था। इसलिए मैं पुलिस लाइन की ओर बढ़ रहा था और यह किसी सामान्य दिन की तरह था। तभी मैंने देखा कि उसके पास पिस्तौल थी। मैं तुरंत एक तरफ हो गया। (रायटर की तस्वीर)

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  • Published: 4 weeks ago on January 31, 2020
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  • Last Modified: January 31, 2020 @ 1:43 pm
  • Filed Under: राजनीति

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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