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ईवीएम – मतदान का प्रतिशत बताने में देर क्यों होती है?

By   /  February 10, 2020  /  No Comments

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-संजय कुमार सिंह।।


ईवीएम हैकिंग पर किताब लिखना और फिर भ्रम फैलाना दोनों संभव है और एक ही राजनीतिक दल के लोग दोनों करें तो यह समझने में दिक्कत नहीं होनी चाहिए। यह वैसे ही है कि उसे हैक किया जा सकता है के पक्ष में तर्क दिए जा सकते हैं तो नहीं किए जा सकने के पक्ष में भी तर्क दिए जा सकते हैं। इसलिए एक ही पार्टी के लोग जब दोनों बात कह रहे हैं तो मान लीजिए कि दोनों संभव है। असंभव कुछ भी नहीं है। वैसे भी नामुमकिन मुमकिन है का जमाना है। विकसित देश इसका प्रयोग नहीं करते हैं तो यह यूं ही नहीं है। विरोध करने वाले समर्थन करने लगें तो उसे समझने की जरूरत है। भले मंत्री न बनाया जाए, सलाह न ली जाए। राज्य सभा का सदस्य बनाकर छोड़ देना भी मुफ्त का मामला नहीं है।
इसलिए ईवीएम पर शक नहीं करने का कोई कारण नहीं है। सरकार ऐसा कुछ नहीं कर रही है कि शक कम हो उल्टे वह बढ़ता जा रहा है। इसे इस तथ्य से जोड़कर देखिए कि वोटिंग का प्रतिशत बताने में देर हो रही है। पुराने लोग कहते हैं कि अब पहले के मुकाबले ज्यादा समय लग रहा है। मशीन से यह समय कम होना चाहिए, बढ़ क्यों गया? जब तक इसका कोई ऐसा कारण नहीं बताया जाए तब तक शक होगा और शक होना वाजिब है। इसलिए सरकार (चुनाव आयोग) को कोई विश्वसनीय कारण बताना चाहिए। मेरे हिसाब से देरी का कारण यह है कि अब क्रॉस चेक करना आसान है इसलिए पहले ही ठीक से चेक करके बताना पड़ता है। दूसरे, मान लीजिए ईवीएम में कुछ वोट पहले ही किसी एक पार्टी या उम्मीदवार के पक्ष में डाल दिए जाएं। मैं नहीं कह रहा ऐसा होता है। मैं कह रहा हूं हो सकता है और यह सिर्फ कल्पना है। ऐसा शक करने का जो कारण है, यहां मैं वही बता रहा हूं।
अब हरेक बूथ पर यह संख्या निश्चित नहीं हो सकती है ना ऐसी कोई संख्या तय हो सकती है जिससे ऐसा करने का पक्का लाभ मिले। लाभ पक्का नहीं हो तो कोई जोखिम क्यों लेगा? इसलिए संभावना है कि किस मशीन में कम से कम कितने वोट एक उम्मीदवार के लिए पहले डाल दिए जाएं तो न्यूनतम मतदान की स्थिति में भी वह जीत जाए और अधिकतम (जो सौ प्रतिशत नहीं होता है) कितना हो कि उम्मीदवार जीत जाए और मतदान 100 प्रतिशत या ज्यादा न हो जाए या हो तो उसे कैसे कम किया जाए। ये सब गणना का मामला है पर असंभव नहीं है। और अगर अगर इसे शामिल करके वोट का प्रतिशत बताना होगा तो समय लगेगा। और इसके बावजूद अगर किसी पार्टी को एकतरफा वोट पड़ जाए तो वह जीत जाएगा और मशीन की साख भी बनी रहेगी।
ईवीएम नंबर पर काम करता है। अलग-अलग नंबर पर उम्मीदवार होते हैं पार्टी होती है पर मशीन के लिए वह नंबर है। इन्हीं नंबरों से मशीन को कमांड दिया जा सकता है कि उसे इन नंबरों से क्या काम करना है। और यह कमांड ऐसा नहीं होगा कि राम बोलने से भाजपा को वोट जाएगा और पप्पू बोलने से कांग्रेस को वोट जाएगा। वह अंक होगा सिर्फ अंक। इसलिए आप किसी को कह सकते हैं कि मशीन काम शुरू करे उससे पहले उसपर कोई निश्चत नंबर दबा दिया जाए। नंबर दबाने वाले समझेगा कि उसने मशीन को ऑन किया है जबकि उसने दरअसल एक कमांड दिया है और कमांड क्या है वह नहीं जानता है। वह तो सिर्फ नंबर जानता है। यह नंबर किस बात का कमांड है इसकी जानकारी हो सकता है एक ही व्यक्ति को हो। पर सबको बताया गया हो कि मतदान शुरू करने पर ये नंबर फीड करना है। बंद होने पर एक नंबर, गिनती शुरू करने पर एक और नंबर तथा बंद करने के बाद कोई तीसरा नंबर। खेल इसी नंबर में है। और वह कुछ भी हो सकता है। मोटी सी बात है। सामान्य समझ से समझ आती है। फालतू में उलझा दिया गया है।

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  • Published: 2 weeks ago on February 10, 2020
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  • Last Modified: February 10, 2020 @ 4:32 pm
  • Filed Under: देश

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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