Loading...
You are here:  Home  >  मीडिया  >  Current Article

हिंदी पत्रकारिता में सॉफ्ट हिंदुत्व और संतों में लीन सम्पादक..

By   /  February 12, 2020  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

-राजीव मित्तल।।

1983 के अंत में बेनेट कोलमेन ने लखनऊ में अपनी सूबेदारी स्थापित की और डालीबाग में नभाटा और Toi शुरू हो गए..लेकिन जैसे किसी आलीशान बंगले के पीछे सर्वेंट क्वार्टर्स होते हैं, उन्हीं क्वार्टरों का सा हाल इन दोनों अखबारों का लखनऊ में..किसी मारवाड़ी की दुकान के अंदाज़ में जनसेवक कार्यालय के तहत..मंशा साफ थी कि लखनऊ के कर्मचारियों को न तो बेनेट कोलमेन वाला वेतन देना है न सुविधाएं.. अपने ही अख़बार में इस दोमुहेंपन का विरोध गिरिलाल जैन और राजेंद्र माथुर को करना चाहिए था, लेकिन दोनों को अपनी कुर्सी की पड़ी थी..बाद में यही नज़ीर अपनायी गयी, और दिल्ली के बाहर जिन जिन मीडिया संस्थानों ने अपने अख़बार शुरू किए, सभी का हाल गोदाम से बदतर..(बाद में कई ऐसे अखबारों में काम किया, जहां का हाल और भी बुरा था..उन पर चर्चा समय पर)..

डालीबाग में अखबार गोदाम वाले हालात में शुरू हुआ..जहां गर्मी में पसीना बहता और जाड़ों में शरीर ठिठुरता..गर्मियों में तो कई बार पानी से रीते जग को ऊपर लटके पंखे से लटकाया, जिस पर लिखा होता- मैं प्यास का मारा आत्महत्या कर रहा हूँ..

लखनऊ संपादकीय विभाग कई गुटों का अखाड़ा, इसके चलते अख़बार की दुनिया में नयानवेला होने के नाते (दिल्ली में तो पिकनिक मनाई थी) कुछ दिन हुक्का गुड़गुड़ाया और उस के बाद अपन ने परवाज़ खोले और धमाचौकड़ी मचानी शुरू कर दी..

नभाटा के प्रथम सूबेदार थे रामपाल सिंह..डेस्क के आदमी थे, दिल्ली वाला खुलापन भी था..कांचू किस्म के ठाकुर थे, म्यान खाली ही रहती उनकी..स्टाफ में एक से एक धुरंधर, तो काम भी जल्द ही सीख गया तो आत्मविश्वास भी बढ़ गया..तब संपादक मैनेजमेंट की दलाली नहीँ करता था और न ही ठुमके लगाता था..काम करने में मज़ा आता और ऑफिस में मन रमता..खुलापन खूब ज़्यादा था..रामपाल जी खेल तो करते लेकिन सीमाओं में रह कर..

एक दिन मीटिंग में अपन से बोले-पंडित जी (उनका तकिया कलाम था) आप तो तीन घंटे ही रुकते हैं ऑफिस में..जबकि ड्यूटी 6 घंटे की है..
तो अपना जवाब था-रामपाल जी, अगर मैं अपना काम तीन घंटे में कर लेता हूँ तो क्या बाकी तीन घंटे ऑफिस में रुक कर आपके खिलाफ साज़िशें करूं..

रामपाल जी मुस्कुरा दिए..तो यह माहौल हुआ करता था तब अखबार में..बल्कि, कुछ समय बाद तो खबरें बनाने के साथ साथ अपना गायन भी शुरू हो गया..और अपना दावा है कि आगे के जितने वर्ष नभाटा लखनऊ में अपन ने गाना गाते हुए ख़बरें बनायीं या अखबार निकाला, कभी कोई गलती नहीं गई और न अखबार में कोई गड़बड़ी हुई, न ही किसी सीनियर ने कोई शिकायत की..न संपादक को कोई आपत्ति हुई..

1986 में अपने यहां श्रमिक यूनियन बनी…उन दिनों श्रमिक यूनियन का होना मैनेजमेंट की मनमानियों पर अंकुश लगाता था..यूनियन में पदाधिकारी न होने के बावजूद मैं काफी सक्रिय था..एकाध की नौकरी भी बचवाई.. फिर एक काफी बड़ा मामला हो गया.. डालीबाग ऑफिस की बदहाली की कई बार दिल्ली शिकायत की गई लेकिन कुछ नहीं हुआ..आखिरकार यूनियन ने हड़ताल कर दी..15 दिन दोनों अख़बार नहीं निकले..प्रदेश की श्रममंत्री ने बीच बचाव कर समझौता कराया और काम शुरू हुआ..

लेकिन जब हालात में कोई सुधार नहीं हुआ तो यूनियन की सहमति से हम कुछ लोगों ने गो स्लो कर दिया और नभाटा बहुत लेट छपा, लेट ही नहीं छपा बल्कि आठ की बजाय मात्र चार पन्नों का छपा.. खुद संपादक ने खबरें बनाने का काम किया था उस दिन..इसकी सूचना पटना में नवभारत टाइम्स के शुभारंभ उत्सव में शामिल राजेन्द्र माथुर को भेजी गई..सब छोड़छाड़ वो फ्लाइट से शाम को लखनऊ ऑफिस पहुंचे.. और वहां उन्हें पता चल गया कि इस गो स्लो के पीछे मैं हूँ..यह उनकी महानता थी कि उन्होंने मैनेजमेंट से मुझे निकालने को नहीं कहा..उनकी सारी हताशा इस बात को लेकर थी कि यूनियन ने नहीं, बल्कि एक व्यक्ति ने ऐसा कैसे कर दिया..उन्होंने एकांत में मुझसे बात की, मेरे कुछ तर्क थे, वो कुछ नहीं बोले और दिल्ली लौट गए..

प्रदेश में वीरवहादुर सिंह मुख्यमंत्री थे और ठाकुर रामपाल सिंह की ठकुराई उनकी खाली म्यान में समा चुकी थी..तो कुल मिला कर उनकी इसी ठकुराई से मुकाबला था उस गो स्लो का, जिसने उनकी कुर्सी छीन ली और कट्टर हिंदुत्व की रामनौमी ओढ़े नंदकिशोर त्रिखा संपादक बना कर लखनऊ भेजे गए..

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

Manisa escort Tekirdağ escort Isparta escort Afyon escort Çanakkale escort Trabzon escort Van escort Yalova escort Kastamonu escort Kırklareli escort Burdur escort Aksaray escort Kars escort Manavgat escort Adıyaman escort Şanlıurfa escort Adana escort Adapazarı escort Afşin escort Adana mutlu son

You might also like...

सुजस प्रकाशन की आड़ में हेराफेरी..

Read More →
Eyyübiye escort Fatsa escort Kargı escort Karayazı escort Ereğli escort Şarkışla escort Gölyaka escort Pazar escort Kadirli escort Gediz escort Mazıdağı escort Erçiş escort Çınarcık escort Bornova escort Belek escort Ceyhan escort Kutahya mutlu son
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
WhatsApp chat
%d bloggers like this: