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किस किस को चाहिए वैलेंटाइन.?

By   /  February 14, 2020  /  No Comments

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-मुकेश नेमा।।

तीसरी सदी की बात है ! रोम में तब के राजा क्लॉडियस को लगा कि शादी करने से पुरूषों की अकल और ताक़त दोनों ख़त्म हो जाते है ! ऐसा राजा को क्यों लगा ये बात आजतक साफ़ नहीं है ! हो सकता है ये राजा के निजी अनुभव रहे हों ! जो भी हो पर उन दिनों राजा को कुछ लग जाना ही क़ानून था ! फ़रमान जारी हुआ और फौजियो और सरकारी अफ़सरों के लिये शादी करना ग़ैरक़ानूनी हो गया ! इस राजा से पूरी तरह असहमत होना आज भी मुश्किल है ! बहुत से शादीशुदा बंदों को देखकर आज भी यह ख़्याल आता है कि वो राजा ग़लत नहीं था ! खैर आप सच्ची कहें या ग़लत कहे ,हर बात की खाल निकालने वाले लोग हर ज़माने में मौजूद रहे ही है ! तब भी थे ! वैलेंटाइन नाम एक पादरी ने इस क़ानून की ख़िलाफ़त की ! पादरी यानी हमारे यहाँ शादी करवाने वाले ब्राह्मण ! शादी ब्याह बंद हो जाने में उनका भी नुक़सान था !
वैलेंटाइन खुद शादीशुदा नहीं थे ! शादी के फ़ायदे नुक़सान उन्हें मालूम नहीं थे ! इस मामले में राजा से कम जानते थे ! पर अपनी रोज़ी रोटी की ख़ातिर उन्होंने सरकारी बंदो की शादियाँ करवाना शुरू कर दी ! ज़ाहिर है राजा को बुरा लगा और वैलेंटाइन चौदह फ़रवरी के दिन सूली चढ़ा दिये गये !
वैलेंटाइन ने जाते जाते जेलर को तपाने के ख़्याल से उसकी लड़की को एक लव लैटर लिखा ! देने को कुछ और था नहीं इसलिये अपनी आँखें दे गये उसे ! पर इस संत ने असली परोपकार किया चॉकलेट , टैडी , गुलाब बेचने वालों के अलावा आर्चीज पर ! ये कंपनी ऐसे प्रेमियो की मदद करती है जिनके हाथ लव लेटर लिखने में तंग है ! और इसके बदले उनसे लाखों डॉलर झटक लेती है !
जो लड़कियाँ अब तक सो कर नहीं उठी है उन्हें मेरी यह सलाह है कि वो आज के दिन सुबह सुबह गिलहरी को देखने से बचें ! ऐसा होने का यह मतलब है कि आपको किसी मख्खीचूस बंदे की गृहस्थी सँभालना पड़ेगी ! बेहतर होगा कि अपने घर मे मौजूद एक्वोरियम के पास आँखें खोलें ! उसमें मौजूद सुनहरी मछलियाँ आपको अमीर और दिलदार पति मुहैया करवा सकती है !
लड़कों को चाहिये कि वो आज से अपने काम धाम में मन लगायें ! इस साप्ताहिक प्रेम समारोह के ख़त्म होने तक यदि वो ख़ाली हाथ है तो यह मान लें कि लड़कियाँ उनसे ज़्यादा समझदार है और बुद्धिहीन बॉडी बिल्डर के बजाय मल्टीनेशनल कंपनी के चश्माधारी बाबू से ज़्यादा इन्प्रैस होती है !
ख़ैर ! हिंदुस्तानियों के लिये तो आज का दिन इसलिये प्रेम दिवस है क्योंकि ना पहले हुई थी ना आगे कभी होगीं जैसी मधुबाला आज ही के दिन पैदा हुई थी ! इसलिये मेरी भगवान से यही कामना है आज के दिन सारे भालुओं को अपने अपने हिस्से का शहद नसीब हो ! बाबूत्व को प्राप्त हो वो ! बाबू से बाबूराव हो जायें ! भले ही ये उन्हें उनकी अक्ल और ताक़त की क़ीमत पर मिले पर मिले ज़रूर !
मेरी दुआयें हमेशा उनके साथ हैं ! आमीन !

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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