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कोरोना संकट से लिए जाने वाले सबक..

By   /  February 20, 2020  /  No Comments

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देशबन्धु में आज का संपादकीय

चीन में फैले कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया को एक तरह से स्वास्थ्य के साथ आर्थिक संकट में भी डाल दिया है। चीन लंबे समय तक दुनिया से कटा हुआ देश था लेकिन पिछले 40-50 वर्षों से उसने दुनिया के साथ घुलना-मिलना शुरू कर दिया था। कम्युनिस्ट शासन होने के बावजूद आंशिक तौर पर ही सही, चीन ने दुनिया के लिए अपने दरवाजे खोल दिये थे। जैसे-जैसे वह सैन्य के अलावा उद्योग और व्यापार में महाशक्ति बनता गया, उसका मेल-जोल और व्यवसायिक संबंध दुनिया भर के देशों से बढ़ने लगे। उद्योगों के मामले में चीन ने दुनिया से अपना लोहा मनवाया है। इलेक्ट्रॉनिक, घरेलू वस्तुएं, कपड़े, अनेक तरह के औजार, खिलौने, दवा और कुछ हद तक वाहनों के व्यवसायों पर उसका वर्चस्व है। मोबाइल, एलईडी, फ्रिज, टीवी जैसे क्षेत्रों में भी उसकी बड़ी धाक है। पीसीबी (प्रिंटेड सर्किट बोर्ड) का वह सिरमौर है। 

ऐसा देश जब किसी संक्रमण की बीमारी से ग्रस्त होता है तो सारी दुनिया को सकते में आ जाना लाजिमी है। वे दिन गए जब न कोई चीन जाता था और न ही चीन के लोग अपने देश से बाहर निकलना चाहते थे। अब चीन के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे चौबीसों घंटे दुनिया भर के लोगों को अपनी जमीन पर उतारते हैं और वहां से लोगों को दूसरे देशों में उड़ाकर ले जाते हैं। पिछले कुछ समय से कोरोना वायरस के चलते चीन में बड़ी संख्या में लोग मारे जा चुके हैं तो हजारों की संख्या में नागरिक संक्रमित हैं।

जब तक चीन और दुनिया सावधान होती, विभिन्न व्यक्तियों और वस्तुओं के आयात-निर्यात के माध्यम से वायरस दुनिया भर में फैल चुका है।  जहां स्वास्थ्य सुविधाएं अच्छी हैं और संक्रमण को रोकने की मशीनरी भी चुस्त है, ऐसे विकसित और समृद्ध देश तो तत्काल हरकत में आ गए और उन्होंने अपने नागरिकों को वहां से निकाल लिया तथा आने वालों की कड़ी जांच-पड़ताल कर संक्रमण को और फैलने से रोक लिया है। असली खतरा तो विकासशील और अविकसित देशों के नागरिकों को है जहां स्वास्थ्य सेवाएं लचर हैं तथा संक्रमण को रोकने की प्रणाली कमजोर है। ऐसे देशों की अर्थव्यवस्था इतनी सक्षम नहीं होती कि वे अचानक आई महामारियों से फौरी तौर पर निपट सकें। 

यही खतरा भारत में भी आ धमका है। पिछले कुछ वर्षों से हमारी उदार नीति के कारण चीन समेत दुनिया भर से हमारा भी व्यवसायिक संबंध बढ़ा है। चीन भारत का न केवल पड़ोसी मुल्क है बल्कि उसके साथ हमारा खरबों रुपयों का आयात-निर्यात का बिल होता है। चीन से सैकड़ों तरह की वस्तुएं भारत पहुंच रही हैं जिनमें प्रमुख रूप से मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं व उपकरण, कृषि के औजार और हजारों तरह के खिलौने हैं। आशंका है कि इनके और चीन से आने-जाने वाले वहां के व हमारे नागरिकों के जरिए वायरस भारत में फैल सकता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि मई-जून की गर्मी के पूर्व इस वायरस से मुक्ति संभव नहीं है क्योंकि ठंड का मौसम इस बीमारी के जीवाणुओं के लिए बेहद अनुकूल होता है जिसमें वे पनपते और बढ़ते जाते हैं। 

पिछले करीब डेढ़-दो माह से इस संक्रमण के भय से अनेक वस्तुओं का आयात कम हुआ है जिसके कारण उनका भारत में व्यवसाय करने वाले लोगों की आय में भी कमी हुई है क्योंकि कोई भी जान पर खेलकर कारोबार नहीं करना चाहेगा। संक्रमण का प्रभाव हमारे व्यवसाय पर इतना जबरदस्त पड़ा है कि केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को बयान देना पड़ा कि घरेलू उद्योगों पर इसके असर से निपटने के लिए सरकार जल्दी ही उपायों का ऐलान करने जा रही है। उद्योग प्रतिनिधियों के साथ समीक्षा बैठक करने के बाद निर्मला सीतारमण ने यह भी बताया कि इस विषय पर संबंधित मंत्रालयों के सचिवों के साथ बैठक होगी तथा उपाय योजना को लागू किया जाएगा। 

देर-सबेर कोरोना वायरस अन्य महामारियों की तरह अंतत: बिदा तो हो जाएगा लेकिन वह भारत जैसे देश के लिए कुछ सबक भी छोडक़र जाएगा। पिछले कुछ वर्षों में चीन पर हमारी व्यवसायिक और औद्योगिक निर्भरता विदेशी पूंजी के लालच में काफी ज्यादा बढ़ी है। हमारे अपने व्यवसायों और उद्योगों की उपेक्षा कर भारत बड़े पैमाने पर वे वस्तुएं चीन से आयात कर रहा है, जो सहज ही हमारे यहां बनाए जा सकते हैं। सच तो यह है कि चीन ने भारत का निर्माण ढांचा लगभग पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। हमारी बहुत सारी इकाइयां चीनी वस्तुओं का मुकाबला करने में अक्षम रही हैं और वे बंद हो गई हैं। चीन की कंपनियां भारत आकर अनेक बड़ी परियोजनाओं के ठेके लेने में सफल हो जाती हैं।

भारत का कभी बेहद चर्चित स्वदेशी आंदोलन अब दफन हो गया है। साम्यवाद से नफरत करने वाली भारतीय जनता पार्टी, जो कभी चीन को लाल आंखें दिखाने और विदेशी पूंजी के खिलाफ बातें करती थी, अपने इन 6 वर्षों के कार्यकाल में चीन का भारत में व्यवसाय बढ़ाने की बड़ी जिम्मेदार है। उसने हमारी व्यवसायिक और औद्योगिक आत्मनिर्भरता की प्रणाली को ही खत्म कर दिया है। इस दौरान चीन ने भारत के अनेक नए व्यवसायिक क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति बढ़ाई है जबकि इसके मुकाबले हमारा चीन को निर्यात काफी कम रहा है।

विडंबना यह भी है कि दुनिया में भारत ड्रग्स एवं फर्मास्यूटिकल उद्योग के मामले में एक बड़ा खिलाड़ी है। 2021 तक वह लगभग 1200 बिलियन डॉलर कीमत के ड्रग्स का निर्यात करने की स्थिति में होगा जो उसकी 5.8 फीसदी विकास दर होगी। फर्मास्यूटिकल्स में भारत की करीब 24 हजार इकाइयां दवा उत्पादन करती हैं। जेनेरिक यानी सस्ती दवाइयों के विश्व उत्पादन का करीब 20 प्रतिशत भारत में होता है। लेकिन हम अपने ही लोगों को सस्ती और प्रभावशाली दवाइयां नहीं दे पाते क्योंकि हमारे दवा उद्योग का फोकस रिसर्च पर कम व्यवसाय पर ज्यादा है।

इस कोरोना महामारी से भारत दो सबक ले सकता है- चीन पर ही नहीं, किसी भी देश पर हमारी व्यवसायिक निर्भरता कम हो तथा सभी मामलों में हम आत्मनिर्भर बनें; और दवाओं पर हम शोध व विकास पर उतना ही ध्यान दें जितना उसके कारोबार पर देते हैं।

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  • Published: 1 month ago on February 20, 2020
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  • Last Modified: February 20, 2020 @ 9:38 am
  • Filed Under: देश

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