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शाहीन बाग बातचीत: केन्द्र सरकार का काम कर रहा सुप्रीम कोर्ट..

By   /  February 23, 2020  /  No Comments

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-सुनील कुमार।।

दिल्ली में नागरिकता के मुद्दे पर महीनों से चले आ रहे शाहीन बाग आंदोलन को लेकर अब मिलीजुली खबरें आ रही हैं। सत्तर दिनों से इस आंदोलन के सामने की सड़क बंद थी, और नागरिकों के जत्थे ने इस तरह सड़क-बंदी का विरोध भी किया था। लेकिन यह सड़कबंदी किसने की, इसे लेकर आज एक अलग खबर आई है। सुप्रीम कोर्ट ने यह रास्ता खुलवाने की याचिका पर तीन वार्ताकार नियुक्त किए थे जिन्हें शाहीन बाग आंदोलनकारियों से बात करने भेजा गया था। चार दिनों से यह बातचीत चल ही रही थी कि अब खबर आई है कि इन तीनों वकीलों ने मौके पर जाकर लोगों से बात की, और अब अदालत में एक हलफनामा दायर किया है। एक वकील की तरफ से दायर इस हलफनामे में कहा गया है कि प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से चल रहा है, पुलिस ने पांच जगहों पर सड़क रोकी है, अगर यह रोक हटा दी जाती तो सामान्य ट्रैफिक चलते रहता। हलफनामे में कहा है कि पुलिस ने बेवजह रास्ता बंद किया जिसकी वजह से लोगों को परेशानी हुई। अब कल सुप्रीम कोर्ट में इस पर आगे सुनवाई होगी। लेकिन कल तक आने वाली खबरें ऐसा बता रही थीं कि मानो रास्ता आंदोलनकारियों ने बंद किया है।

सच इन दोनों में से कोई भी हो, या इनके बीच का हो, यह समझने की जरूरत है कि आंदोलनकारियों से बातचीत करने के लिए सुप्रीम कोर्ट को वार्ताकार नियुक्त करने पड़े, और भेजना पड़ा। दूसरी तरफ दो महीने से ज्यादा से चल रहे इस आंदोलन ने देश के किसी भी दूसरे आंदोलन के मुकाबले अधिक जगह खबरों में पाई, और यह आंदोलन देश में न सिर्फ मुस्लिम महिला आंदोलन के रूप में, बल्कि एक महिला आंदोलन के रूप में बहुत मजबूती से दर्ज हुआ है। आज देश के दर्जनों शहरों में नागरिकता के मुद्दे पर चल रहे धरनास्थल को शाहीन बाग नाम दिया जा चुका है, और दिल्ली के विधानसभा चुनाव में अगर इस आंदोलन का कोई असर हुआ है, तो वह सीधे-सीधे केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा के खिलाफ ही हुआ है। यहां पर न तो अभी हम नागरिकता के मुद्दे पर बात करना चाहते, न ही इस आंदोलन पर। सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता या वार्ता की पहल पर बात करना जरूरी है।

शाहीन बाग का आंदोलन पूरी तरह से राजनीतिक आंदोलन था, और दिल्ली चुनाव के पहले और दिल्ली चुनाव के बाद भी केन्द्र सरकार की ओर से, या केन्द्र में सत्तारूढ़ गठबंधन की किसी भी पार्टी की ओर से आंदोलनकारियों से बातचीत की कोई पहल नहीं की गई। बल्कि केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने सार्वजनिक रूप से यह बयान दिया था कि वे नागरिकता संशोधन अधिनियम पर किसी से भी बातचीत के लिए तैयार हैं और उनका दफ्तर तीन दिन के भीतर इसके लिए समय देगा। लेकिन जब आंदोलनकारियों ने उनसे मिलने का समय मांगा, आंदोलन से परे के कुछ लोगों ने समय मांगा तो उन्हें कोई जवाब भी नहीं मिला। दूसरी तरफ अमित शाह और नरेन्द्र मोदी एक के बाद एक कई बड़ी सभाओं में यह घोषणा करते रहे कि नागरिकता संशोधन के मुद्दे पर कोई वापिसी नहीं होगी। हो सकता है कि दिल्ली चुनाव के पहले इसका एक चुनावी इस्तेमाल रहा हो, लेकिन प्रधानमंत्री ने तो चुनाव के बाद भी इस बात को दुहराया। अब इस किस्म की कड़ी घोषणाओं के साथ ही बातचीत की संभावना कम हो जाती है।

यह समझने की जरूरत है कि लोकतंत्र में बातचीत की संभावनाओं को कभी भी खत्म नहीं होने देना चाहिए। आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी असम के बोडो आंदोलनकारियों के साथ जिस समझौते की घोषणा करते हैं, वह आंदोलन चौथाई सदी से चल रहा था, उसमें बड़ी संख्या में मौतें हुई थीं, लेकिन जो भी समाधान निकला वह बातचीत से ही निकला। और अपने ही देश के लोगों से क्यों, दुश्मन समझे जाने वाले पड़ोसी देश पाकिस्तान के साथ तो आजादी से लेकर अब तक बातचीत चल ही रही है, कई मौकों पर चीन से बात हुई, कई मौकों पर श्रीलंका से। देश के भीतर नक्सलियों से बात हुई, पंजाब में आतंक के दौर में बातचीत हुई, और उसी से कोई रास्ता निकला। ऐसे में दिल्ली में रहते हुए केन्द्र सरकार ने शाहीन बाग आंदोलन को लेकर जिस तरह की अरूचि दिखाई थी, वह लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं थी। अब सुप्रीम कोर्ट के वार्ताकार अगर यह पा रहे हैं कि आंदोलनकारियों ने सड़क बंद नहीं की है, बल्कि सड़क केन्द्र सरकार के मातहत काम करने वाली दिल्ली पुलिस ने बंद की है, तो इससे दिल्ली से दूर बसे लोगों के मन में बनी हुई तस्वीर बदलती है। जो पहल सुप्रीम कोर्ट ने की, वह पहल केन्द्र सरकार को करनी चाहिए थी, एनडीए में शामिल किसी राजनीतिक दल को करनी चाहिए थी, या केन्द्र सरकार के विश्वासपात्र किसी सामाजिक कार्यकर्ता को करनी चाहिए थी। सुप्रीम कोर्ट की पहल देश की राजनीतिक सत्ता की नाकामयाबी का एक सुबूत भी है कि जो काम सरकार को करना था वह काम अब अदालत कर रही है। किसी देश या प्रदेश की सरकार को किसी मुद्दे को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बनाना चाहिए। लोकतंत्र में लोग सरकार से बातचीत के लिए तैयार हों, यही सरकार की कामयाबी होती है, यही लोकतंत्र के लिए जरूरी भी होता है। सुप्रीम कोर्ट की दखल से हो सकता है कि इस धरनास्थल के सामने की सड़क खुल जाए, लेकिन आंदोलन अभी बाकी है, नागरिकता का मुद्दा पूरे देश में बाकी है। केन्द्र सरकार को अपना रूख लचीला रखना चाहिए, और सभी तबकों से बातचीत जारी रखनी चाहिए। लोकतंत्र में संसद या विधानसभा में बाहुबल से बना दिए गए कानून उतने सम्मान के नहीं होते जितने कि आम राय तैयार करके एक व्यापक बहुमत, व्यापक सहमति से बनाए हुए कानून रहते हैं।

(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय, 23 फरवरी 2020)

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  • Published: 1 month ago on February 23, 2020
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  • Last Modified: February 23, 2020 @ 4:21 pm
  • Filed Under: देश

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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