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आओ मुक्तिबोध! रास्ता दिखाओ हमें..

By   /  February 28, 2020  /  No Comments

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-वीरेंदर भाटिया।।

हवाओं में ज़हर है। शब्दों में ज़हर है। खा ज़हर रहे हैं, पी ज़हर रहे हैं, सूंघ ज़हर रहे हैं, सुन ज़हर रहे हैं। क्योंकि लोग कह रहे हैं कि ज़हर को ज़हर काटता है इसलिए लोग जहर के कनस्तर लिए फिरते हैं। ज़हर का जवाब ही ज़हर समझ बैठे हैं। बहुत असमंजस की स्थिति है कि आखिर यह ज़हर वाला ज्ञान आया कहाँ से।

आईये मुक्तिबोध से पूछते हैं।

मुक्तिबोध ने हमें “संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना” का एक सूत्र दिया है। जिसका प्रयोग मानवता के संदर्भ में न के बराबर हुआ है। बौद्धिक कार्यशालाओं में समोसे के साथ इस सूत्र पर व्याख्यान होते हैं और समोसे की डकार के साथ खत्म हो जाते हैं। इस सूत्र को मानवीय समूह का साक्षी सूत्र बनाया जाये तो न सिर्फ मनुष्य की हरकत पर नजर रखी जा सकती है बल्कि धर्म, सत्ता , सन्गठन की राजनीति भी समझी जा सकती है।

सूत्र की विस्तारित विवेचना करें तो “वह ज्ञान जो संवेदना से आया है वह ज्ञानात्मक संवेदना (ज्ञान से अर्जित संवेदना) से ज्यादा कल्याणकारी होता है।”

हिन्दू और मुसलमान धर्म दोनो ही आसमानी शक्तियों के धर्म हैं। आसमानी ज्ञान ज्ञानात्मक प्रचार का मोहताज है। हमें व्याख्याता ही बताते हैं कि आसमान में स्वर्ग-नरक जन्नत-जहन्नुम आदि हैं। दोनो ही धर्मो के व्याख्याता अपने अपने धर्म का ज्ञान बाँटते हैं और अपने अपने अनुयायियों की संवेदना के तंतु छेड़ते हैं। दोनों ही धर्म के व्याख्याता और अनुयायी यह बेहतर जानते हैं कि धर्मो की हानि के नाम पर संवेदना में बह गए युवकों की लाशें बिछ-बिछ गई। धर्मों की हमेशा हानियाँ होती रही। धर्म हमेशा लड़ते रहे। धर्म कभी जीते या नही यह हमें नही बताया गया। धर्म जीते या धर्म का कभी लाभ हुआ तो हमारे घरों में क्या आया। जिनके बच्चों की लाशें बिछ गई, जिनके कमाने वाले मर गए उनके घर मुफलिसी स्थायी रूप से आ बसी, उन्हें नही सम्भाला सत्ता ने, उन्हें नही सम्भाला धर्म ने, उन्हें नही सम्भाला व्याख्याताओं ने। राष्ट्र हिन्दू हुए या मुस्लिम वहां की जनता की स्थिति बदली क्या?

क्यों नही बदला कुछ? क्योंकि ग्यानात्मक संवेदना दरअसल सम्वेदनहीनता ही है। संवेदना का मुखोटा है ये। पढ़ा लिखा मनुष्य जिसने मानवता का ज्ञान भी भरपूर अर्जित किया हुआ है, वह अक्सर ही सड़क पर पड़े मनुष्य की सहायता नही करता। सड़क पर खड़े मनुष्य को कभी लिफ्ट नही देता। ज्ञान अर्जित लोग अकसर भिड़ते हैं सड़क पर रोज, रोज गाली गलौज करते हैं। अकसर सोशल मीडिया पर मां बहन कर रहे होते हैं। ज्ञान सम्वेदनहीन भी बनाता है हमे।

ग्यानात्मक सम्वेदना दरअसल राजनीति का एक बेहतरीन टूल है।समाज संचालन का टूल है। ग्यानात्मक सम्वेदना संगठन धर्म सत्ता के लिए हमें कंडीशन करती है। यहां यह समझ लिया जाए कि ग्यानात्मक सम्वेदना अक्सर ही नक़ली सम्वेदना होती है जो काग़ज़ों पर नाचती है सिर्फ। जब तक वह ज्ञान सम्वेदना के मानवीय तंतु स्पंदित नही करता, जब तक वह ज्ञान मनुष्य बनने के लिए झकझोरता नही वह छद्म ज्ञान है। अक्सर ग्यानात्मक संवेदना बौद्धिक होने के अभिमान रचती है। समाज मे अच्छा दिखने का आभामण्डल रचती है, घर मे स्त्री का जीवन बेशक नरक किये रहें, बड़े लेखक बड़े समाजविद , बड़े नेता, बड़े धर्माधिकारी दरअसल इसी ग्यानात्मक संवेदना का मास्क लगाये हुए हैं। ग्यानात्मक सम्वेदना के पुरोधा हमेशा दूसरों के कंधे तलाशते हैं। वे ड्राइंग रूम में अपने लिए इजी जोन रचते है, नीचे वालों को हांकने के ग्रन्थ रचते है।

लेकिन

ज्ञान जब संवेदना से उपजता तब इन व्याख्याताओं की चलती नही। तब ये आपको उस तरीके से मैनेज नही कर सकते। दंगे चाहने वालों में कोई भी संवेदनात्मक ज्ञान वाला शामिल नही हो सकता। वह मनुष्य युद्ध युद्ध नही चिल्लाता जिनके घरों में युद्धों ने लाशे भेजी हैं। जिनके नीड उजाड़े हैं युद्धों ने उनकी संवेदना झंकृत हुई है बुरी तरह। उन्हें युद्धों के संदर्भ में कोई भी ग्यानात्मक संवेदना पढाईये। वह उस संवेदनात्मक ज्ञान को बौना नही कर सकती। बुल्ले शाह ने कहा है कि बुल्लेया रब दा की पावणा। एधरो पुट्टणा, औधर लाऊणा। यानी ईश्वर का क्या पाना। इधर से उखाड़ना, उधर लगाना। कूएँ की मिट्टी को जिस तरह भीतर ही भीतर समायोजित करके मीठे जल का स्रोत ढूंढा जाता है वैसे ही भीतर का इधर से जब उधर होता है तब सम्वेदनात्मक ज्ञान पैदा होता है। वे मनुष्य, वे कौम, वे स्त्रियाँ जिन्होंने युद्ध,दंगे या भेद के कष्ट सहे वे सम्वेदनात्मक ज्ञान के ज्यादा नजदीक हैं।

सिखों के गुरु आसमानी नही हैं। जमीन पर चलते फिरते कष्ट सहते, आम इन्सान के करीब खड़े गुरु हैं। सिख समाज दंगे झेलता है, लंबे राजनीतिक खेल को झेलता है, और दंगो से तौबा कर लेता है। वह दंगा पीड़ितों को बिना भेदभाव बचाता है, वह फसाद में लंगर पानी लेकर घूम रहा होता है। संवेदना से उपजे ज्ञान और ज्ञान से उपजी सम्वेदना में यह फर्क है।

वे हिन्दू, वे मुसलमान जिन्होंने दंगो में खोया है, जिनकी संवेदना पर प्रहार हुए हैं वे दंगे नही चाहते । वे तमाम लोग जिन्होंने संवेदना के ज्ञान को भीतर उतारा है वे दंगे नही चाह्ते। नही तो कबीर भले समय मे कह गए थे कि पोथी पढ़ पढ जग भयो,पँडित भयो न कोई। वेद पुराण गीता कुरान सब पढ़ लो बेशक। संवेदना की बजाय यदि कुटिलता बढ़ रही है तो हमारा पढना दो कौड़ी है ।

मैं स्त्री के पक्ष लिखता हूं। आप स्त्रीवादी कह लीजिए बेशक। स्त्रीत्व की वजह से है स्त्री का यह। यही तो है स्त्रीत्व कि वह संवेदनात्मक ज्ञान के साथ प्रकृतिक रूप से बेहद नजदीक खड़ी है। वह ज्ञान पोथियाँ ज्यादा नही पढ़ती। लेकिन वह सम्वेदनात्मक ज्ञान के नजदीक खड़ी है। क्योंकि जब भी वह सम्वेदनात्मक कष्ट में होती है उसके सम्वेदनात्मक ज्ञान तंतु उसमे मनुष्यता भर देते हैं। आजकल स्त्री धर्मो की राजनीति पढ़ने लगी है। ज्ञानात्मक सम्वेदना के रास्ते चलना चाहती है लेकिन लौट आती है वापिस क्योंकि उसकी सम्वेदना उसे एक्सट्रीम करने की इजाजत नही देती।

आजतक विश्व भर में हुए दंगों में स्त्री की भूमिका नही है। देश भर में हुए दंगों में इतिहास की नजर से देख लें बेशक। स्त्रियाँ और वे तमाम पुरुष दंगों से दूर रहे जो सम्वेदनात्मक ज्ञान के नजदीक रहे।

धर्म और अध्यात्म में मूल अंतर यही है कि धर्म ज्ञानात्मक संवेदना से मनुष्य को कंडीशन करता है और अपने हित साधता है, अध्यात्म सम्वेदनात्मक ज्ञान से मनुष्य में मनुष्यता भरता है। बुद्ध नानक ओशो सम्वेदनात्मक ज्ञान के प्रतिनिधि है। गीता और कुरान ग्यानात्मक सम्वेदना के प्रतिनिधि ग्रन्थ हैं।

आईये, ज़हर के कनस्तर कहीं जमीन में दबा दें। सबसे पहले खुद का अवलोकन करें कि हमारा ज्ञान सम्वेदनात्मक ज्ञान से कितना दूर है। यकीन मानिए जिस दिन आप सम्वेदनात्मक ज्ञान की बात करने लगेंगे, आप जहर से जहर के ज्ञान को पलट देंगे।

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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