/काले धन पर बाबा रामदेव की सिफारिशें नहीं मानेगी सरकार, अन्ना ने कहा कोई बात नहीं

काले धन पर बाबा रामदेव की सिफारिशें नहीं मानेगी सरकार, अन्ना ने कहा कोई बात नहीं

-सतीश चंद्र मिश्रा।।

केंद्र सरकार ने रामदेव को मनाने के लिए केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) के अध्यक्ष की अगुआई में जो उच्चस्तरीय समिति गठित की थी उसने  23 सितम्बर को हुई अपनी बैठक में स्पष्ट कर दिया कि समिति योग गुरु के एक भी प्रमुख सुझाव पर अमल करने नहीं जा रही है। बैठक में यह भी स्पष्ट किया गया कि काले धन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित नहीं किया जा सकता तथा समिति काले धन की समस्या से निपटने के लिए कोई नया कानून बनाने के भी खिलाफ है. आश्चर्यजनक रूप से अन्ना हजारे और टीम अन्ना ने इस समाचार पर गांधी जी के तीन बंदरों की तरह का रुख अपनाया। इस से पूर्व बीते 21 सितम्बर को प्रधान मंत्री को लिखे गए अपने पत्र में अन्ना हजारे ने लोकपाल पर सरकार के आश्वासन की तारीफ करते हुए लिखा था, ”भ्रष्टाचार की रोकथाम की दिशा में यह एक अच्छी पहल है।”

इसी पत्र में राजीव गांधी की तारीफ में कसीदे पढ़ते हुए अन्ना ने बार-बार राजीव गांधी के स्थानीय स्वशासन के काम की तारीफ की है। उन्होंने लिखा है कि राजीव के प्रयासों से ही संविधान में 73वें और 74वें संशोधन के जरिए ग्राम सभा और शहरी निकायों को अहमियत मिली। भू अधिग्रहण के संबंध मे उन्होंने ग्राम सभाओं को अधिक शक्ति देने को कहा है। इस बार उन्होंने जन लोकपाल बिल के किसी खास प्रावधान या इसकी समय सीमा को ले कर कुछ भी नहीं लिखा है। बल्कि कहा है कि बार-बार आंदोलन से उन्हें कोई खुशी नहीं होती। इससे जनता के प्रति सरकार की अनास्था और अनादर की भावना का संदेश जाता है। ध्यान रहे कि इस से पहले खुद को भ्रष्टाचार के खिलाफ सर्वकालीन सर्वश्रेष्ठ योद्धा मानने वाले अन्ना हजारे मुक्त कंठ से इंदिरा गांधी की जबर्दस्त प्रशंसा के गीत गा चुके हैं.

पहले इंदिरा फिर राजीव और अब कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार की प्रशंसा, विशेषकर भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष के संदर्भ में, अन्ना द्वारा दिए जा रहे राजनीतिक संकेतों-संदेशों का चमकता हुआ दर्पण है. अन्ना हजारे इस से पूर्व अडवाणी की रथयात्रा, मोदी के अनशन तथा भाजपा की मंशा पर तल्ख़ तेवरों के साथ अपने तीखे प्रश्नों के जोरदार हमले कर चुके हैं.

12 सितम्बर को सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से नरेन्द्र मोदी विरोधियों के मुंह पर पड़े जोरदार थप्पड़ के तत्काल पश्चात् 13 सितम्बर को अन्ना हजारे की सक्रियता अचानक ही गतिमान  हो गयी थी. IBN7 के राजदीप सरदेसाई के साथ बातचीत में अन्ना हजारे ने स्पष्ट किया था कि कांग्रेस यदि भ्रष्टाचार में ग्रेजुएट है तो भाजपा ने पी.एच.डी. कर रखी है. अन्ना का यह निशाना 2014 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रख कर साधा गया था. क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के उपरोक्त निर्णय के पश्चात् 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के भाजपा के प्रत्याशी के रूप में नरेन्द्र मोदी के उभरने की प्रबल संभावनाओं को बल मिला था. अतः अन्ना हजारे को ऎसी किसी भी सम्भावना पर प्रहार तो करना ही था.

अन्ना का यह कुटिल राजनीतिक प्रयास इतने पर ही नहीं थमा था. उसी बातचीत में उन्होंने यह भी कहा कि वह किसी गैर कांग्रेसी-गैर भाजपा दल का समर्थन करेंगे. बातचीत में अन्ना ने मनमोहन सिंह को सीधा-साधा ईमानदार व्यक्ति बताया तथा ये भी कहा कि देश को आज इंदिरा गाँधी सरीखी “गरीब-नवाज़” नेता की आवश्यकता है. ज़रा इसके निहितार्थ समझिए एवं गंभीरता से विचार करिए कि अन्ना हजारे को यह कहते समय क्यों और कैसे यह याद नहीं रहा कि इंदिरा गाँधी ने ही दशकों पहले भ्रष्टाचार को वैश्विक चलन बताते हुए इसको कोई मुद्दा मानने से ही इनकार कर दिया था तथा भ्रष्टाचार का वह निकृष्ट इतिहास रचा था जिसकी पतित पराकाष्ठा “आपातकाल” के रूप में फलीभूत हुई थी.

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा गांधी को चुनावी भ्रष्टाचार का दोषी घोषित किया था. लेकिन अन्ना हजारे का शायद ऎसी कटु सच्चाइयों वाले कलंकित इतिहास से कोई लेनादेना नहीं है. हजारे की ऐसी घोषणाओं का सीधा अर्थ यह है कि उनके नेतृत्व में टीम अन्ना केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस गठबंधन सरकार के विरोधी मतों को देश भर में तितर-बितर कर उनकी बन्दरबांट करवाने के लिए कमर कस रही है. उसकी यह रणनीति मुख्य विपक्षी दल भाजपा को हाशिये पर पहुँचाने का अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य करेगी. टीम अन्ना ऐसा करके किसकी राह आसान करेगी यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है. आश्चर्यजनक एवं हास्यस्पद तथ्य यह है कि यही अन्ना और उनकी टीम कुछ दिनों पहले तक देश की जनता की चुनावी अदालत का सामना करने से मुंह चुराती नज़र आ रही थी. इसके लिए यह लोग भांति-भांति के फूहड़ तर्क दे रहे थे.

यहाँ तक कि देश के मतदाताओं पर एक शराब की बोतल और कुछ रुपयों में बिक जाने का घृणित आरोप सार्वजनिक रूप से निहायत निर्लज्जता के साथ लगा रहे थे. अतः केवल कुछ दिनों में ही देश में ऐसा कौन सा महान राजनीतिक-सामाजिक परिवर्तन हुआ देख लिया है इस अन्ना गुट ने? जो अन्ना खुद के चुनाव लड़ने पर देश के मतदाता को केवल  एक शराब की बोतल और कुछ रुपयों में बिक जाने वाला बता उसे लांक्षित-अपमानित करने का दुष्कृत्य कर अपनी जमानत तक गंवा देने की बात कर रहे थे वही अन्ना हजारे अब पूरे देश में केवल अपने सन्देश के द्वारा ईमानदार नेताओं की एक पूरी फौज तैयार कर देने का दम्भी दावा जोर-शोर से कर रहे हैं. खुद अन्ना के अनुसार जो मतदाता पिछले 64 सालों से केवल एक शराब की बोतल और कुछ रुपयों में बिकता चला आ रहा था, उसमें अचानक अनायास ऐसा हिमालयी परिवर्तन हजारे या उनकी टीम को किस आधार पर होता दिखा है ?

आगे पढ़ें.. जब अपने मंच पर चार-पांच ईमानदार नहीं जमा कर पाए अन्ना तो भ्रष्टाचार से क्या खाक लड़ेंगे?

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.