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दिल्ली दंगे की रिपोर्टिंग के लिए दक्षिण के दो चैनल दो दिन बंद..

By   /  March 7, 2020  /  No Comments

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..और आज यह खबर हिन्दी अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं मिलेगी, मैं जो अखबार देखता हूं उनमें अमर उजाला में यह खबर पहले पन्ने पर नौ लाइन में दो लाइन के शीर्षक के साथ है..

-संजय कुमार सिंह।।


केंद्र सरकार ने दिल्ली दंगे की रिपोर्टिंग के कारण दक्षिण भारत के दो टेलीविजन चैनल को 48 घंटे (दो दिन के लिए बंद) कर दिया है। इनमें एक चैनल एशियानेट न्यूज भाजपा के राज्यसभा सांसद राजीव चंद्रशेखर का है। हिन्दी अखबबारों में आज यह खबर पहले चैनल पर नहीं मिलेगी। इसपर उनका बहाना यह हो सकता है कि दक्षिण भाषी चैनल का दो दिन बंद होना हिन्दी भाषी पाठकों के लिए किस काम की। पर यह मामला भाषा से जुड़ा नहीं केंद्र सरकार से जुड़ा है। दिल्ली दंगे की रिपोर्टिंग से जुड़ा है। अगर हिन्दी अखबारों ने कायदे की रिपोर्टिंग की होती तो यह प्रतिबंध उनपर लगता या नहीं लगता, दक्षिण भारत के इन चैनलों को सरकारी कार्रवाई का शिकार नहीं होना पड़ता।


आइए, देखें खबर क्या है। पर खबर टेलीग्राफ में है तो पहले शीर्षक का मजा लीजिए। यह Thou shalt not kill से बनाया गया है। इसका मतलब है आप किसी की जान नहीं लेंगे या हत्या नहीं करेंगे। यह एक नैतिक आदेशात्मक सीख है जो तोराह में कहा गया है। यह हिब्रू बाइबिल के पहले पांच पुस्तकों में से एक है। हिब्रू बाइबिल के तीन प्रभागों में से एक को यूनिट के रूप में माना जाता है। यह बाइबिल के 10 संदेशों में एक है। कहने की जरूरत नहीं है कि हत्या नहीं करेंगे का आदेश गैरकानूनी हत्या के संदर्भ में है जिससे आपको खून करने का अपराधबोध हो सकता है। यहां इस शीर्षक का मतलब यही हुआ कि सरकार ने मोटामोटी इन चैनलों से कहा है कि आप दंगाइयों की पोल नहीं खोलेंगे। चूंकि यह बात सीधे नहीं कही गई है पर कार्रवाई इसीलिए की गई है तो इसका मतलब हुआ कि आपको इस सीख (आदेश) को याद रखना चाहिए था (जो बाइबिल में है इसलिए सबको मानना चाहिए)।
अनिता जोशुआ और केएम राकेश की बाईलाइन वाली इस खबर में लिखा है कि चैनल के खिलाफ यह कार्रवाई रिपोर्टिंग में किसी गड़बड़ी को स्थापित किए बगैर की गई है और यह कार्रवाई सांप्रदायिक तनाव से निपटने से संबंधित नियमों के तहत की गई है। इसलिए शीर्षक जो कहता है वह असल में कहा नहीं गया है। समझने की चीज है। दक्षिण भारत के जिन दो चैनलों के खिलाफ कार्रवाई की गई है उनमें एक एशियानेट न्यूज का स्वामित्व भाजपा के राज्यसभा संदेश राजीव चंद्रशेखर का है। अखबार ने लिखा है …. पर इसके संपादक पेशेवर पत्रकार हैं। दूसरे चैनल का नाम मीडिया वन टीवी है और दोनों का प्रसारण शुक्रवार शाम 7:30 बजे से 48 घंटे के लिए रोक दिया गया है। दोनों को इस सप्ताह के शुरू में नोटिस जारी किया गया था।
दोनों पर पूजा स्थलों पर हमले की खबर को हाईलाइट करने, एक खास समुदाय का पक्ष लेने और पुलिस की निष्क्रियता का आरोप लगाने के आरोप हैं। इसके अलावा, एशियानेट को यह रिपोर्ट करने के लिए दोषी ठहराया गया है कि, दिल्ली में दंगे जारी हैं और मरने वालों की संख्या 10 हो गई है। यह भी कि, दंगाई एक दूसरे पर गोलियां चला रहे थे और यह कि दंगाई लोगों से उनका धर्म पूछकर हमला कर रहे थे। इस संबंध में अखबार ने लिखा है कि दंगे में मरने वालों की संख्या अब आधिकारिक तौर पर 44 है। द टेलीग्राफ ने कम से कम एक पत्रकार का विवरण छापा था जिसने कहा था कि दंगाइयों ने उसका धर्म जानने के लिए उससे पैन्ट खोलने के लिए कहा था।
मीडिया वन के खिलाफ अतिरिक्त आरोप हैं, यह दिल्ली पुलिस और आरएसएस के खिलाफ लगता है और आरएसएस पर सवाल उठाता है और यह भी कि सीएए के समर्थकों की बर्बरता पर फोकस करता है। मंत्रालय के आदेश में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि दोनों में से किसी भी चैनल की रिपोर्टिंग तथ्यात्मक रूप से गलत थी। इसकी बजाय इसमें तर्क दिया गया है कि कवरेज केबल टेलीविजन नेटवर्क नियम 1994 के नियम 6 (1) (सी) का उल्लंघन करता है जो कहता है कि, कोई भी ऐसा कार्यक्रम प्रसारित नहीं किया जाना चाहिए …. जिसमें धर्म या समुदायों पर हमला शामिल हो …. और नियम 6 (1) (ई) जो कहता है कि, कोई भी ऐसा कार्यक्रम प्रसारित नहीं किया जाना चाहिए …. जो हिंसा को बढ़ावा दे सकता है …. ।
दोनों चैनल ने अपने कवरेज का बचाव किया है और कहा है कि उसकी रिपोर्ट रिपोर्टर्स ने जो देखा और चश्मदीदों ने जो बताया उसपर आधारित है। उन्होंने कहा है कि दोनों समुदाय के पीड़ितों से बात करने के बाद भाईचारे और शांति की अपील से जुड़ी खबरें की हैं। मीडिया वन ने कारण बताओ नोटिस के अपने जवाब में इस तथ्य को रेखांकित किया है कि भारत के संविधान की धारा 19 (1) (ए) जिसे धारा 15 (2) के साथ पढ़ा जाता है, के तहत मीडिया का यह दायित्व है कि कायदे से जांच करे और सही खबरें सत्यता के साथ रिपोर्ट करे। चैनल ने जोर देकर कहा है कि नियम 6 बुनियादी अधिकार है। आरएसएस की आलोचना से किस नियम या कानून का उल्लंघन होता है यह स्पष्ट नहीं है।
एशियानेट न्यूज के दिल्ली संवाददाता पीआर सुनील का नाम मंत्रालय के आदेश में गलत लिखा था। उन्होंने द टेलीग्राफ से कहा, मैंने वही रिपोर्ट दी जो मैंने देखा। मैंने उसे रिपोर्ट में कहीं भी मुस्लिम का उल्लेख नहीं किया है। पर मैंने यह जरूर कहा है कि केंद्र चाहता तो हिंसा रुक सकती थी। मंत्रालय के नोटिस में उल्लिखित एक अखबार के पत्रकार, हसन्नुल बन्ना ने कहा कि उन्होंने चैनल से वही कहा जो खुद देखा और मैं मीडिया वन के लिए रिपोर्ट नहीं कर रहा था। चैनल ने जब मुझसे संपर्क किया जो जो मैंने देखा वह बता दिया। एक बिल्डिंग की छत से कोई भीड़ पर गोली चला रहा था। मैंने नहीं कहा कि किसने गोली चलाई क्योंकि मुझे पता नहीं है। उन्होंने कहा, इसपर सरकार से इस तरह की प्रतिक्रिया बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
द टेलीग्राफ की मूल खबर अंग्रेजी में पढ़ना चाहें तो लिंक नीचे कमेंट बॉक्स में है।

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About the author

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।

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