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तरह-तरह की खाल ओढ़े ऐसे और भी मासूम दिखते हमले होते ही रहेंगे देश में..

By   /  March 8, 2020  /  No Comments

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-सुनील कुमार।।
दुनिया के इतिहास में बहुत से लोग धूमकेतु की तरह आते हैं, तेजी से आते हैं, छा जाते हैं, और गायब भी हो जाते हैं। भूमंडल के धूमकेतु का तो नहीं मालूम, लेकिन धरती पर ऐसे लोग एक मकसद भी पूरा करते हैं जो कि जाहिर तौर पर उनका मकसद नहीं दिखता। हाल के बरसों के हिन्दुस्तान को देखें तो अभी दस बरस में ही अन्ना हजारे नाम के एक स्वघोषित समाजसेवी ने खादी और गांधी की खाल ओढ़कर देश की राजधानी दिल्ली में एक आंदोलन का ऐसा तूफान खड़ा किया कि लोगों को लगा कि अब बस हिन्दुस्तान से भ्रष्टाचार खत्म ही हो जाएगा। अन्ना ने बड़े-बड़े दावे किए कि किस तरह उन्होंने महाराष्ट्र में भ्रष्ट मंत्रियों को हटवा दिया, और किस तरह उनका सुझाया लोकपाल देश में भ्रष्टाचार खत्म कर देगा। उन दिनों गनीमत यही थी कि कोरोना वायरस का हमला हुआ नहीं था, वरना अन्ना हजारे लोकपाल को कोरोना का सबसे असरदार इलाज भी बता देते। उस वक्त की केन्द्र की यूपीए सरकार को विश्व इतिहास की सबसे भ्रष्ट सरकार साबित करने का एक अघोषित मकसद अन्ना ने पूरा किया, और देश में कांग्रेस-यूपीए के खिलाफ चुनाव के पहले एक माहौल खड़ा करके वे अपने गांव जाकर सो गए। तब से अब तक न किसी ने लोकपाल सुना, न भ्रष्टाचार के खिलाफ इस गांधीटोपीधारी को देखा। लोग इसके बारे में सही कहते हैं कि जब अगला चुनाव आएगा, अन्ना फिर आ खड़ा होगा, बिना मुंह से कहे, बिना पार्टी का नाम लिए, चुनाव प्रचार के लिए।

ऐसा ही एक और आंदोलनकारी आया था, लेकिन वह न खादी में था, न टोपी में था, और न सफेद कपड़ों में था। वह भगवा कपड़ों में आया, और किसी महिला के सलवार कुर्ते में गया। बाबा रामदेव भी भ्रष्टाचार के खिलाफ नारा लगाते आया, और फिर खुलकर मोदी का प्रचार करते रहा, और उसने मोदीराज आने पर डॉलर और पेट्रोल के दाम कुछ 30-35 रूपए हो जाने की घोषणा की थी, इसकी पूरी मोदीनॉमिक्स भी समझाई थी, स्विस बैंकिंग समझाते हुए उसने विदेशों से कालाधन एक साल के भीतर आ जाने की बात कही थी, जैसे ही चुनाव निपटा, मोदी सरकार आई, बाबा योग शिविरों से गायब हो गया, आंदोलनों से गायब हो गया, उसका निशाना बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर आ टिका, और उसने अपनी स्वदेशी-राष्ट्रवादी कंपनी को बाजार में एक सबसे चतुर बनिये की तरह उतारा, और अपने सामान इस्तेमाल करने को हिन्दू धर्म, भारतीय आध्यात्म, और हिन्दुस्तानी राष्ट्रवाद सबसे जोड़ दिया, और कारोबार में इतना डूब गया कि देश का डूबता रूपया, डूबती अर्थव्यवस्था, डूबते बैंक, इनमें से कुछ भी उसे दिखना बंद हो गया।

ऐसे ही एक दौर में अपने आपको दो-दो श्री आबंटित करने वाले एक रविशंकर आए, उन्होंने भी यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान छेड़ा, लेकिन जिस कर्नाटक की राजधानी में उनका आध्यात्म-महल बसा हुआ है, उसी राजधानी के भाजपा मुख्यमंत्री के भ्रष्टाचार की उनको भनक नहीं लगी। उनके अलावा बाकी पूरी दुनिया को वह भ्रष्टाचार दिखते रहा, लेकिन रविशंकर का निशाना एकलव्य की तरह सिर्फ यूपीए पर, सिर्फ कांग्रेस पर लगे रहा। वे भी जीने की कला सिखाने के नाम पर आए, उसका इस्तेमाल चुनाव में जिताने की कला के लिए किया, और एक मामूली मवाली के अंदाज में उन्होंने दिल्ली में यमुना को गंदा किया, बर्बाद किया, और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल पर थूककर चले गए। तब से अब तक कोई भ्रष्टाचार उन्हें दिखा नहीं, और देश मानो आर्ट ऑफ लिविंग में माहिर हो चुका है।

इस सिलसिले की अब तक की सबसे ताजा कड़ी दक्षिण भारत के एक सद्गुरू हैं। नाम कुछ अटपटा लग सकता है कि क्या गुरू भी सद् के अलावा कुछ और हो सकते हैं? खैर, वे अपने योग-प्राणायाम और आध्यात्म की ताकत से उन तमाम आरोपों से ऊपर उठने में कामयाब थे जो कि उन पर उनकी पत्नी की मौत या हत्या को लेकर लगे थे। उन्होंने भी बहुत महंगी विदेशी गाड़ी को बहुत महंगे विदेशी चश्मे को पहनकर देश का दौरा किया, और नदियों को बचाने के लिए एक अभियान छेड़ा। नदियों से गंदगी दूर करने, नदियों को नई जिंदगी देने का दावा किया, और आखिर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपने शिव प्रतिमा वाले विशाल समारोह में आमंत्रित करके हिन्दुस्तान के इतिहास का शायद सबसे रंगारंग मौका उन्हें दिया, और तब से अब तक नदियां अनाथ हैं, सद्गुरू धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे हैं, और अन्ना हजारे, बाबा रामदेव, श्रीश्री रविशंकर के साथ पीछे की बेंच पर बैठने जा रहे हैं।

इन सबको ठीक से याद करें, ठीक से याद रखें, तो इस विशाल लोकतंत्र में यह समझ आएगा कि ये किस वक्त आते हैं, किस हुलिए में आते हैं, किसकी खाल ओढ़कर आते हैं, किसके खिलाफ नारे लगाते हैं, और हकीकत में उसका क्या राजनीतिक-चुनावी मकसद होता है। यह समझना जरूरी इसलिए है कि तरह-तरह की खाल ओढ़े ऐसे और भी मासूम दिखते हमले होते ही रहेंगे, और जनता का जागरूक होना जरूरी है। इसको इस तरह भी समझा जा सकता है कि एक आदमी सरकारी अस्पताल से मुफ्त में मिलने वाले कंडोम का बड़ा सा बक्सा लेकर जा रहा है, जो कि बिन कहे ऐसा लगता है कि सेफ-सेक्स को बढ़ावा देने जा रहा है, लेकिन वह हकीकत में मुफ्तमिले कंडोम फुलाकर गुब्बारे बनाकर बेचने वाला है। देश के ये चारों चर्चित लोग ऐसा ही कुछ करते आए हैं।
(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय, 8 मार्च 2020)

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