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राजनीतिक होली..

By   /  March 9, 2020  /  No Comments

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-आरिफा एविस।।

हर साल की तरह इस बार भी माघ के बाद फाल्गुन लग चुका था. मौसम का मिज़ाज क्या बदला राजनीतिक मिजाज भी बदल गया पर अपना मिज़ाज जैसा था वैसा ही रहा बिलकुल विपक्ष की तरह. जैसे-जैसे रात छोटी हुई अपनी नींद भी बड़ी होने लगी. रात और नींद का रिश्ता भी चोली दामन जैसा ही है. मैं नेताओं की तरह बिस्तर में चीर निद्रा में लीन थी और ख्याली पुलाव नहीं ख्वाब में पुलाव देख रही थी. तभी अम्मी ने मेरे सिर से चादर हटाते हुए बड़बड़ायी, एक यह मोहतरमा हैं कि चैन की नींद सो रही हैं और हम हैं रात की नींद भी हराम हो रही है. कब से आवाज दे रही हूँ. पर तुम्हारे कानों पर जूं तक नहीं रेंगती हैं. उठो सर पर सूरज सवार हो चुका है.’

अम्मी की बात सुनकर मुझे गुस्सा आ गया, “क्या है अम्मी, आप आला कमान की तरह बीस घंटे काम करती हो तो इसमें मुझे क्या कम से कम मुझे तो सोने दो. कभी कभार तो नींद का मौका मिलता है वरना गरीब आदमी को नींद कहाँ उसकी नींद तो रोजी-रोटी के चक्कर में ही उड़न छू रहती है.’

‘अच्छा अब नेताओं की तरह बकबक न करो. जरा इस लड़के को पढ़ा दो वर्ना तुम्हारे पढ़े लिखे होने का या फायदा.’

अम्मी के पीछे छोटा भाई अमन खड़ा मुंह लटकाए खड़ा था. मैंने उसे आँखों ही आँखों में देखा और पता लगा लिया जरूर यह बार की तरह अपना स्कूल का काम करवाने आया होगा. उसे देख मुझे तरस आया ये स्कूल वाले सिर्फ कागजों में पढ़ाते असली पढ़ाई तो घर वाले ही करते हैं. अम्मी के जाते ही नेताओं की तरह उसका रंग बदल गया और बोला, ‘आपी जल्दी करो मुझे स्कूल में होली पर निबन्ध दिखाना है. और हाँ ‘हम देखेंगे’ की तरह तर्जुमा मत कर देना. निबन्ध हिंदी में ही लिखना वरना मुझ पर फ़तवा न लागू हो जाये.’

‘अजीब मुसीबत है जिस तरह नेता अपना भाषण अपने एक्सपर्ट से लिखवा वाहवाही लूटते हैं उसी तरह मेरा भाई मुझसे.’ बड़बड़ाते हुए मैंने भी आव देखा न ताव किसी युद्ध में लड़ रहे सैनिक की तरह अपनी कलम की तलवार निकाली और होली पर निबन्ध लिख मारा, न मालूम उस पर मास्टर जी कितने नंबर देंगे-

“होली”, यह विभिन्न रंगों का त्यौहार है. इसमें लफंगीरंग, हुडदंगीरंग, चेला चपाटीरंग, देशभक्ति और देशद्रोही रंग भी खूब लगाया जाता है क्योंकि बुरा न मानो होली है. बाकि कोई बुरा भी मान जाये तो कोई कर भी क्या सकता है. किसी विषय को राजनीतिक मुद्दा बनाना हो तो उसमें राजनीतिक रंग डाल दो फिर देखो रंगों के कमाल. राजनीति में भी तो कुछ ही रंगों की भरमार है ऐसा लगता है जैसे बाकी रंग राजनीति से कतराते हैं. वक्त बे वक्त इन रंगों पर दूसरे रंग चढ़ जाते हैं मानो रंग न हो रंगरेज की दुकान हो. वैसे तो दिखावट में एक रंग दूसरे का विरोधी होता है मजाल दोनों रंग आपस में मिल जाएँ पर राजनीति में रंगों का घालमेल चलता है, कोई आज स्याह है तो कल सफेद भी हो सकता है. राजनीति में होली खेलने के लिए किसी पंचांग की जरूरत नहीं होती जब चाहो होली, दीवाली मना लो. नीली , पीली, लाल, भगवा, हरा, गुलाबी, सफेद सब अपने आप में अलग और एक दूसरे से जुड़े हैं.

यूँ तो यह पर्व पारंपरिक रूप से दो दिन मनाया जाता है लेकिन अब इसकी कोई निश्चितता नहीं जिसे देखो वो अपने हिसाब से मना ले जब चाहे और जहाँ चाहे मना ले, बस बहाना चाहिए. एक बात और इन राजनीतिक पार्टियों की ईद ए गुलाबीया, धुलेंडी, धुरड्डी, धुरखेल या धूलिवंदन मनाने का कोई हिसाब किताब नहीं है कि कब तक और किस दिन मनाना है इनकी तो अपने मन की गंगा अपने मन की जमुना बहती रहती है.

कहने को होली वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला भारतीय लोगों का त्यौहार है लेकिन खूनी होली देश से लेकर विदेशों में आये दिन खेली ही जाती है जिसके लिए किसी खास मौसम की जरूरत नहीं. अब इसे मनाने के लिए किसी होलिका को जलाने की जरूरत नहीं, जिन्दा इंसानों और उनके मकानों-दुकानों को जला देने से ही काम चल जाता है. हाँ नारा जोरदार होना चाहिए. ख़ून की होली खेलने के अपने नियम है. कोई अपने घर से खेलता है कोई मंचो का इस्तेमाल करके प्यार और सद्भाव की धमकी देकर. हाँ कभी कभी इसका रंग-रूप बदल जरूर जाता है मसलन जातिगत खूनी होली, धार्मिक सौहार्द दंगे फसाद की होली, स्थानीय विशेष की होली, लोगों के उजाडन की होली… ऐसी होली किसी धर्म विशेष से नहीं जुड़ी होती, इसके लिए राजनीतिक रंग सर्वोपरि है. राजनीति से बड़ा कोई धर्म नहीं. वैसे इन दिनों नागरिकता छीनने की होली भी खेली जा रही है. विरोध करने वाले को विद्रोही का गुब्बारा फेंक दो फिर देखो फर्जी देशभक्ति होली का रंग, असली देशभक्त गोली से लेकर गाली रंग इस्तेमाल करके दुश्मन को लपेट देते हैं. अब आने वाले सालों में डिटेंशन सेंटर में भी होली मिलन समारोह होगा जहाँ नागरिक बनाम अनागरिक एक दूसरे रंग लगायेंगे इसके लिए सरकार तीन विशेष प्रकार के रंग लायी है. वैसे एक राज्य में इनमें से एक रंग का इस्तेमाल हो चुका है जो बहुत पक्का रंग है.

राजनीतिक लोग आपस में आरोप-प्रत्यारोप के गुब्बारे आये दिन फेंकते रहते हैं. संसद में जुबानी गुलाल-अबीर की बौछार भी करते रहते हैं. इनकी एक खास पहचान है रंगहीन होते हुए भी ये सभी रंगों को मिलकर काला रंग बनाते है और ये स्याह लोग सफेदपोश कहलाते है .

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  • Published: 3 months ago on March 9, 2020
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  • Last Modified: March 9, 2020 @ 8:51 pm
  • Filed Under: नज़रिया

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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