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पैंट उतारकर धर्म जांचने वालों के लिए ज्ञान बकौल द टेलीग्राफ..

By   /  March 12, 2020  /  No Comments

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-संजय कुमार सिंह।।

दिल्ली दंगों पर कल, ‘होली के बाद’ संसद में चर्चा हुई। जब सब कुछ हो लिया तो संसद में गृहमंत्री ने बताया कि दंगों में 52 भारतीय मरे, 526 भारतीय जख्मी हुए। उन्होंने कहा कि धर्म के आर पर उनमें भेदभाव नहीं किया जाए। अंग्रेजी अखबार द टेलीग्राफ ने इसे अमितशाह की फोटो के साथ प्रमुखता से छापा है और पूछा है कि आपने भारत को क्या बना दिया है। इसके साथ लोहे के एक बड़े से गेट की फोटो है और इसका कैप्शन है, उत्तरपूर्व दिल्ली के न्यू मुस्तफाबाद में दंगों के नुकसान के बाद लगा लोहे का गेट। दूसरी ओर, हिन्दुओं के प्रभुत्व वाले बृजपुरी में भी ऐसे ही गेट लगे हैं। इसके साथ प्रकाशित खबर में फिरोज एल विनसेन्ट ने लिखा है, गेट वाले समुदाय का मतलब अब क्या है।
इसमें बताया गया है कि दंगा प्रभावित इलाकों में सीमा सील की जा रही है और गेट लग रहे हैं। जाहिर है, मोहल्ले धार्मिक आधार पर बंट रहे हैं, धार्मिक आधार पर हुए दंगों में मरने वालों को भारतीय कहने से क्या होगा। गृहमंत्री ने कहा कि 36 घंटे में दंगों पर नियंत्रण पा लिया गया पर सच यह है कि 36 घंटे दिल्ली पुलिस कुछ नहीं कर पाई। शांति की अपील करने में प्रधानमंत्री को इससे भी ज्यादा समय लगे थे। ऐसे में डर सभी भारतीयों को है और दो धर्मों के लोग एक दूसरे से सुरक्षित होने के लिए लोहे के गेट लगवा रहे हैं और स्थिति यह है कि दंगों के बाद सिर्फ गेट बनाने और वेल्डिंग करने का काम चल रहा है।


मुख्य शीर्षक तो जो है सो है पर मुद्दे की बात यह है कि दंगों का असर कोलकाता में खतना पर पड़ रहा है। अखबार ने फरवरी 2002 की अहमदाबाद की घटना का जिक्र किया है – हथियारबंद दंगाइयों ने एक पत्रकार का नाम गलत सुना और उसकी धार्मिक पहचान जांचना चाहते थे। दिल्ली के उस पत्रकार से कहा गया कि अपनी पैंट उतारे और यह देखने के बाद उसे जाने दिया गया कि उसका खतना नहीं हुआ था। इसके साथ अखबार ने फरवरी 2020 की दिल्ली की घटना का उल्लेख किया है और बताया है कि हिन्दी के एक समाचार पोर्टल के पत्रकार पर दंगा प्रभावित मौजपुर में हमला किया गया और पैंट उतारने के लिए मजबूर किया गया ताकि यह जांचा जा सके कि उसका खतना हुआ है कि नहीं। मौजपुर के दंगाइयों ने एक फोटो पत्रकार को छोड़ने से पहले उसके धर्म की पुष्टि के लिए पैंट उतारने की धमकी दी थी।
इन दोनों घटनाओं का जिक्र करने के बाद अखबार ने लिखा है कि अहमदाबाद और दिल्ली की सड़कों पर जो अवर्णनीय दुष्टता हुई उसका असर इतवार को कोलकाता के एक बाल रोग चिकित्सक के केबिन में हुआ। खबर के अनुसार दो बच्चों में चिकित्सीय कारणों से खतना करने की आवश्यकता थी जो धार्मिक आधार पर खतना नहीं कराते हैं। इसकी दो प्रक्रिया है एक खतना से अलग है और दूसरा खतना ही है। एक में त्वचा बची रह जाती है दूसरी में उसे हटाना पड़ता है। एक बच्चे में दूसरी प्रक्रिया संभव थी पर एक का खतना ही किया जाना था। डॉक्टर ने जब महिला को बताया कि उसके बच्चे का खतना ही करना होगा। यहां कृपया नोट करें कि डॉक्टर ने अपने अंदाज में बताया होगा और अंग्रेजी अखबार में चिकित्सीय शब्दावली का प्रयोग किया गया है। मैं उसी बात को समझने के लिए साधारण भाषा में लिख रहा हूं। इसलिए मामूली अंतर हो सकता है। मूल बात यही है कि चिकित्सीय कारणों से जिस बच्चे का खतना किया जाना था पर धार्मिक कारणों से उसके लिए यह जरूरी नहीं था। उसकी मां परेशान हो गई। चिकित्सक का कहना है कि चिकित्सीय हस्तक्षेप के मामलों में सामाजिक राजीनीतिक संकट आड़े आ रहा है।
अखबार ने लिखा है कि अकेले कोलकाता में मेडिकल कारणों से हर महीने करीब 2000 से ज्यादा लोगों को खतना किया जाता है। यह संख्या न्यूनतम है ज्यादा भी हो सकती है और यह स्थिति कोलकाता में है तो देश भर में कितनी होगी और खतना के बाद की स्थिति कितने गैर चिकित्सक जानते होंगे या जो लोग यह दावा करते हैं कि वे इसी से धर्म तय करेंगे वे कितने एक्सपर्ट हैं – यह अलग मुद्दा है। अखबार ने लिखा है कि इतवार की घटना अकेली नहीं है। फिमोसिस की सर्जरी करने वाले एक और चिकित्सक ने अपना नाम जाहिर न करने की शर्त पर बताया कि गुजरे कुछ हफ्तों में कतिपय अभिभावकों ने यह गुजारिश की है कि चिकित्सीय कारणों से की जाने वाली सर्जरी में लिंग की त्वचा को बने रहने दिया जाए। हमलोग अपने व्हाट्ऐप्प समूह में इस प्रवृत्ति पर चिन्ता के साथ चर्चा कर रहे हैं। कोई दो दशक पहले कोलकाता में इस तरह की सर्जरी की शुरुआत करने वाले चिकित्सक उदय शंकर चटर्जी ने कहा, मैंने जब इस प्रक्रिया की शुरुआत की थी तो यह चिकित्सीय कारणों से था। दिल्ली दंगों के संदर्भ में इस प्रक्रिया को नया आयाम मिला है।
कोलकाता के एक नागरिक के बेटे को कुछ साल पहले सर्जरी की इस प्रक्रिया से गुजरना पड़ा था। यह गुजरात दंगों के बाद की बात है पर तब मेरे दिमाग में यह नहीं आया कि वहां कुछ बदमाशों ने जो कुछ किया उसका असर यहां कोलकाता में मेरे बेटे पर भी पड़ सकता है। उस समय तो मेरी एकमात्र चिन्ता बेटे के स्वास्थ्य की थी। चिकित्सकों ने जब इसकी जरूरत बताई तो मैं मान गया। अब मैं सोच रहा हूं कि हमारे देश को क्या हुआ है। ….. समाजशास्त्री सुरजीत सी मुखोपाध्याय ने कहा, …. अभिभावक जानते हैं कि खून के प्यासे दंगाइयों पर वैज्ञानिक स्पष्टीकरण का कोई लाभ नहीं होगा। इसलिए वे अपने बच्चों को सुरक्षित रखना चाहते हैं। जो लोग बहुसंख्यक अल्पसंख्यक के आदी नहीं हैं वे डर से बहुसंख्यकों के साथ हो जाते हैं। यह तकरीबन वैसा ही है जैसा हजारों जर्मन ने किया और नाजियों के प्रति समर्थन जताया। लोकतंत्र पर डर हावी हो गया है और सामाजिक मान्यताओं को सोचे समझे तरीके से नष्ट किया जा रहा है। हमें एक ऐसे समय में ढकेला जा रहा है जिसे हम समझते थे कि बहुत पहले पीछे छोड़ आए हैं। मनोवैज्ञानिक मोहर माला चटर्जी ने कहा कि अभिभावकों की ऐसी चिन्ता से पता चलता है कि डर कितना गहरा है। बच्चे हों या बड़े इस चिकित्सीय प्रक्रिया को लेकर उनके दिमाग में हमेशा नकारात्मक भावना रहेगी।

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About the author

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।

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