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अंकित शर्मा के मामले में एक और दिलचस्प तथ्य..

By   /  March 14, 2020  /  No Comments

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-संजय कुमार सिंह।।


दिल्ली दंगे के समय मारे गए इंटेलीजेंस ब्यूरो के कर्मचारी, अंकित शर्मा के भाई के हवाले से वाल स्ट्रीट जरनल ने लिखा था कि उसकी हत्या एक भीड़ ने की जो बहुसंख्यक समुदाय से जुड़ा है। बाद में भाई ने कहा कि उसने कभी वाल स्ट्रीट जरनल से बात ही नहीं की। इस मामले में द प्रिंट की खबर है कि अंकित शर्मा की हत्या निशाना बनाकर की गई लगती है और दंगे के दौरान हुए जख्मों से नहीं हुई लगती है। न्यूज लॉन्ड्री की एक खबर के अनुसार अंकित शर्मा की हत्या की खबर रीपबलिक टीवी, टाइम्स नाऊ, ज़ी न्यूज, आजतक, सीएनएन न्यूज 18, न्यूज नेशनल और इंडिया टीवी पर एक्सक्लूसिव खबर के रूप में प्रसारित हुई है। पर मीडिया रिपोर्ट में झोल हैं। हालांकि, इसमें यह भी कहा गया है कि यह असामान्य नहीं है। इसके मुताबिक, 5 मार्च के टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर के मुताबिक यह टार्गेटेड किलिंग का मामला लगता है। न्यूज 18 की रिपोर्ट के अनुसार, स्थानीय लोगों ने दावा किया कि अंकित शर्मा की मौत पत्थर लगने से हुई हो सकती है।
अंकित के पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट मीडिया को लीक किए जाने के बाद भी हत्या से संबंधित खबरों में गड़बड़ी जारी रही। न्यूज लॉन्ड्री ने 5 मार्च की अपनी खबर में वाल स्ट्रीट जरनल की खबर का उल्लेख किया है और कहा है कि इसपर विवाद शुरू हो गया कि अंकित के भाई अंकुर ने कहा था कि, (अंग्रेजी से अनुवाद) भीड़ पत्थर, सरिया, चाकू और तलवार से युक्त थी और जय श्रीरााम का नारा लगा रही थी। अखबार ने अंकुर से फोन पर बात की थी। अंकुर ने कहा था, उन सबों ने निवासियों पर पत्थर और ईंट बरसाने शुरू किए जो सहायता के लिए अंकित के पास आए …. बाद में उसका शव एक गड्डे में मिला। बाद में अंकित ने यह बयान देने से इनकार कर दिया। परिवार ने अखबार के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। प्रसार भारती ने ट्वीट किया (अनुवाद) कि अंकुर ने प्रसार भारती न्यूज सर्विस से कहा कि उसने वाल स्ट्रीट जरनल को कभी ऐसा कोई बयान नहीं दिया है और यह भी कि यह उसके भाई और परिवार को बदनाम करने की साजिश थी।
न्यूज लॉन्ड्री ने लिखा है कि प्रसार भारती और प्रसार भारती न्यूज सर्विस ( मैंने यह नाम पहली बार सुना / पढ़ा है) पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में है और न्यूज लॉन्ड्री की रिपोर्ट में बताया जा चुका है कि यह गलत सूचना फैलाती है। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिन्सा के बाद जनवरी में भी इसने ऐसा किया था। इसके बाद अब आपको बताऊं कि इस संबंध में आज द टेलीग्राफ की इस खबर में क्या कहा गया है। इस खबर का शीर्षक, ”पत्रकार को वापस भेजने के अभियान से पल्ला झाड़ने की मारा-मारी” अपने आप में स्पष्ट है। इसमें बताया गया है कि शुक्रवार को नरेन्द्र मोदी सरकार द वाल स्ट्रीट जरनल के वरिष्ठ पत्रकार को दिल्ली दंगे की खबर से संबंधित एक निजी शिकायत पर वापस भेजने के प्रभाव का आकलन कर रही थी। बाद में उसने इससे कदम खींच लिए। और इसे एक रूटीन मामला कह कर पल्ला झाड़ लिया। मामला सार्वजनिक तब हुआ जब प्रसार भारती ने एक ट्वीट किया जिसे बाद में डिलीट कर दिया गया। ट्वीट इस प्रकार था (अनुवाद), विदेश मंत्रालय ने आज अमेरिका स्थिति भारतीय दूतावास से यह पता लगाने के लिए कहा कि वाल स्ट्रीट जरनल के दक्षिण एशिया डिप्टी ब्यूरो चीफ एरिक बेलमैन को भारत विरोधी व्यवहार के लिए तुरंत भारत से डिपोर्ट करने के आग्रह पर विचार करे।
इसपर ठीक से विवाद होने से पहले ही विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा, किसी व्यक्ति ने सरकार के ऑनलाइन ग्रीवांस रीड्रेसल प्लैटफॉर्म पर श्री एरिक बेलमैन के खिलाफ शिकायत की थी। बाद में इसे संबंधित कार्यालय के लिए एक मानक प्रक्रिया के अनुसार रूटीन मामला बता दिया गया। डिपोर्टेशन के बारे में हमने ऐसा कोई निर्णय नहीं लिया है। भारत से इमरजेंसी के दौरान पत्रकारों को डीपोर्ट किया गया था पर अब इसका संबंध चीन और पाकिस्तान जैसे देशों से है। डिपोर्टेशन से संबंधित आग्रह की चर्चा करते हुए भारतीय विेदेश मंत्रालय ने दिल्ली दंगे के कवरेज की कोई बात नहीं की। बेलमैन ने शुक्रवार को इसपर कोई टिप्पणी नहीं की। उनका ट्वीटर अकाउंट शांत है। अखबार ने लिखा है कि ऐसे मामले आम तौर पर विदेश मंत्रालय में अंडर सेक्रेट्री (कौनसुलर) पासपोर्ट और वीजा डिविजन द्वारा देखे जाते हैं। प्रसार भारती ने इस मामले को भारतीय दूतावास को क्यों भेजा यह स्पष्ट नहीं है। डिपोर्टेशन का यह मामला उसी दिन उठा जिस दिन आईपीएस एसोसिएशन ने दिल्ली दंगे में एक आलेख के लिए न्यूयॉर्क टाइम्स की निन्दा की। सवाल यह उठता है कि गृहमंत्री ने कहा है कि दिल्ली दंगे सुनियोजित थे तो उसकी रिपोर्टिंग में गड़बड़ी कौन करा रहा है। और एक खास किस्म की रिपोर्टिंग से किसे परेशानी है?

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About the author

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।

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