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अपने को ऐसी नौबत में सोचकर कोई फैसला तो लेकर देखें..

By   /  March 16, 2020  /  No Comments

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-सुनील कुमार।
कोरोना के शिकार योरप के सबसे बदहाल देश इटली की खबर है कि वहां अस्पतालों की इलाज की ताकत चुक गई है, और पूरे देश में लोगों से घर के भीतर रहने कहा गया है। इटली का यह हाल देखते हुए ही अमरीका ने तकरीबन पूरे ही योरप से लोगों का अपने यहां आना बंद कर दिया है, और सिर्फ ब्रिटेन के लोगों को कड़ी मेडिकल जांच के बाद आने की छूट दी है। इटली एक विकसित और संपन्न देश है, इसलिए ऐसी किसी महामारी के लिए उसकी कोई बड़ी तैयारी नहीं थी। आमतौर पर संक्रामक रोग गरीब देशों में अधिक होते हैं, और तेजी से फैलते हैं, लेकिन इस बार चीन के बाद इटली की बारी है, और वह देश इलाज के इतने ही दिनों में बुरी तरह से थक और टूट चुका है।

अब खबर यह है कि वहां के अस्पतालों में मरीजों को भर्ती करने की जगह नहीं बची है, और डॉक्टरों को यह समझ नहीं आ रहा है कि किसे बचाएं किसे छोड़ें। ऐसे में इटली में सरकार की तरफ से ऐसे निर्देश जारी हुए हैं जिनमें डॉक्टरों और नर्सों से कहा गया है कि इमरजेंसी की हालत में वे यह तय करें कि किसे बचाया जा सकता है, और किसी नहीं बचाया जा सकता है। सीमित इलाज से कौन सी जिंदगी बच सकती है, और किसे महज लंबा खींचा जा सकता है। ऐसे में कहा गया है कि यह फैसला लेना होगा कि इलाज के लायक कौन हैं? डॉक्टरों पर यह दबाव है कि जिन बूढ़े लोगों को बचाना मुमकिन नहीं दिख रहा, और जिनकी जिंदगी वैसे ही कम ही बची है उन पर मेहनत न करें।

हुआ यह है कि कोरोना का असर 50 साल से ऊपर के लोगों पर अधिक हो रहा है। बच्चे और जवान, अधेड़ तक इसकी मार से बेअसर सरीखे हैं, लेकिन उम्रदराज लोग अपनी दूसरी बीमारियों के चलते इसके जल्द शिकार हो रहे हैं। बड़ी उम्र में बाकी बीमारियों की वजह से वैसे भी जटिलताएं बहुत बढ़ जाती हैं, इलाज के दौरान दबाव बहुत बढ़ जाता है, और सीमित चिकित्सा सुविधा का एक बड़ा हिस्सा बुजुर्ग मरीजों को बचाने में लगता है, उससे बहुत कम मेहनत से जवान मरीजों को बचाया जा सकता है। लोगों को यह बात हैवानियत की लग सकती है कि किसी मरते हुए मरीज को छोड़ा कैसे जाए, लेकिन यह बात कुछ उसी किस्म की है कि किसी विमान पर कुल एक पैराशूट हो, और मुसाफिर कई हों, तो गिरते विमान से किस एक को बचाया जाए? या लोग आपसी बातचीत में अपने बच्चों से ही प्यार भरी मजाक में यह जानना चाहते हैं कि वे सबसे अधिक प्यार किससे करते हैं?

कुछ ऐसे ही बात डॉक्टरों के सामने उस वक्त आ जाती है जब एक बिस्तर हो, और दस मरीज हों। एक इंजेक्शन हो, और दस मरीज हों। ऐसे में डॉक्टर करे तो क्या करे? एक ही इंजेक्शन को बांटकर दस लोगों को लगाना तो बेअसर होगा, इसलिए लगाना किसी एक को ही है। ऐसे में सबसे बुजुर्ग को बचाया जाए जिसकी कि जिंदगी थोड़ी ही बाकी है, या सबसे जवान को बचाया जाए जिसकी जिंदगी सबसे लंबी बाकी है? यह फैसला बहुत ही मुश्किल है, और हमारा अंदाज है कि दुनिया के कोई भी डॉक्टर ऐसे फैसले की नौबत में घिरना चाहते नहीं होंगे। लेकिन आज इटली में ऐसी ही नौबत आ गई है। हम तो हिन्दुस्तान जैसे देश के बारे में इलाज की ताकत चुक जाने की बात सोचते थे जहां पर सरकारी भ्रष्टाचार अस्पतालों को बेहाल करके रखता है, जहां गरीबी की वजह से संक्रमण फैलने का खतरा बहुत अधिक रहता है। लेकिन इटली के बारे में ऐसा सोचा नहीं था। फिर भी जब ऐसी नौबत आ गई है तो वहां के डॉक्टर क्या करने जा रहे हैं?

इसका जवाब इतना मुश्किल भी नहीं है अगर हम आईने में अपनी बदशक्ल देखने का हौसला जुटा सकते हैं। हिन्दुस्तान में ऐसे करोड़ों कमाऊ और नौजवान लोग हैं जिन्होंने अपने बूढ़े मां-बाप को जीते-जी मरने सरीखी हालत में छोड़ रखा है। ये लोग अपने बच्चों, अपनी अगली पीढ़ी का तो ख्याल रखते हैं, लेकिन अपनी पिछली पीढ़ी, अपने मां-बाप के जिंदा या मुर्दा रहने की जिन्हें परवाह नहीं है। ऐसे ही लोगों की वजह से वृद्धाश्रम चलते हैं, और ऐसे ही लोगों की वजह से बूढ़े मां-बाप बंद घरों में मर जाते हैं, और उनकी लाशें महीनों बाद मिलती हैं। दुनिया का रिवाज ही कुछ ऐसा है। बरसों पहले जापान की एक फिल्म आई थी जो कि वहां के अकाल के दौर पर बनी थी। उस फिल्म में जब बूढ़े लोग उत्पादक नहीं रह जाते हैं, तो सीमित अनाज के बेहतर इस्तेमाल के लिए लोग अपने बुजुर्गों को ईश्वर दिखाने के नाम पर एक पहाड़ पर ले जाते हैं, और वहां से उन्हें नीचे फेंक देते हैं। गांव के बुजुर्गों को इस बात का अहसास रहता है कि ईश्वर को देखकर कोई भी वापिस नहीं आते हैं। फिल्म में एक बूढ़ी मां, या बूढ़े बाप को पहाड़ी से नीचे फेंकने का ऐसा भयानक नजारा है जिसमें नीचे धकेलकर जब गिराया जाता है, तो वे अपने जवान लड़के के पैर पकड़कर लटके रहते हैं, और बेटा उन्हें लात मार-मारकर नीचे गिराता है। जब जिंदगी के साधन सीमित रह जाते हैं, तो लोग अपनी उस खूबी को खो बैठते हैं जिसे बोलचाल की भाषा में इंसानियत कहा जाता है। लोगों को एक दूसरी सच्ची घटना याद होगी कि एक मुसाफिर विमान एक बर्फीली पहाड़ी पर गिर जाता है, और उसके बहुत से मुसाफिर बच जाते हैं। बाद में कुछ खाने को नहीं रहता, तो वे अपने बीच के मरे हुए लोगों का गोश्त खाने लगते हैं।

इटली में जो हो रहा है वह बहुत तकलीफदेह, और बहुत हैवानियत वाला जरूर लग रहा है, लेकिन हकीकत यही है कि लोगों के पास एक रोटी हो, और आखिरी कौर के लिए मरते हुए अपने खुद के बच्चे हों, और खुद के मां-बाप हों, तो लोग बच्चों को ही बचाएंगे क्योंकि उनकी जिंदगी लंबी बाकी है। जिनको यह बात अटपटी लग रही हो, वे अपने को ऐसी नौबत में सोचकर कोई फैसला तो लेकर देखें…!
(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय, 15 मार्च 2020)

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  • Published: 3 months ago on March 16, 2020
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  • Last Modified: March 16, 2020 @ 12:34 am
  • Filed Under: संकट

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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