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शताब्दी में समोसे की मानहानि..

By   /  March 18, 2020  /  No Comments

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-मुकेश नेमा।।

अब कोई जीभ का मारा हर बार ,बार बार ,लगातार समोसा कैसे खा सकता है ! भोपाल नई दिल्ली शताब्दी मे चढ़िये ! ये दोपहर तीन बजे हबीबगंज से दिल्ली के लिये रवाना होती है ! आप चढ़ते है ,अपनी सीट तलाशते है ,सामान को सीट के ऊपर लगे रैक पर ठिकाने लगाते है इतने भर मे लाल शर्ट और काली पेंट पहने ,एक उकताया सा बंदा नाश्ते की ट्रे लेकर हाज़िर हो जाता है !
इस ट्रे को खूब पहचानता हूँ मै ! सालों से ,जब से शताब्दी चली है तबसे ,शताब्दियों से ,शायद ईसा पूर्व से ही इसमे मौजूद आईटम्स मे राई रत्ती भर भी बदलाव नही हुआ है ! इसमें होता है सफ़ेद काग़ज़ मे लिपटा एक ठंडा ,पिद्दी सा समोसा , जो समोसा कम समोसे की मानहानि ज्यादा है ! ये सम़ोसा केवल इसलिये है क्योंकि ये एक तिकोनी चीज़ है जिसमें ठंडे ,फीके आलू भरे हुये है ! शताब्दी के इस समोसे को देखकर आप कन्फ़्यूज हो सकते हैं कि यदि यह समोसा है तो आप जिसे अब तक समोसा समझ कर खा रहे थे वो क्या है और यदि वो समोसा है तो आपकी ट्रे में मौजूद इस अजीब सी चीज़ को समोसा क्यों कहा जा रहा है !
जब आप इस तथाकथित समोसे को पेपर की तह से बाहर निकालते है तो जान पाते है कि आपने जो चीज बरामद की है वो समोसा नही सफ़ेद काग़जी कफ़न मे लिपटी समोसे की लाश भर है ! रेल्वे वाले इतना भर चाहते है कि आप इसे बिना रोये पीटे ,पूरी इज्जत के साथ अपने पेट के क़ब्रगाह मे दफ़्न कर ले !
इस ट्रै में ,मेले में भटकी ,कच्ची उम्र की देहाती लड़कियों सी शरमाती दो कच्ची ब्रैड स्लाइस भी मौजूद होती है ! इनके पीछे नाक बहाते ,घबराये बच्चे जैसा एक सॉस पैकेट भी झांकता मिलता है आपको ! आप इन्हे देखकर बड़ी देर तक यह तय ही नहीं कर पाते कि इनका भोग लगाये या दिलासा देते हुये इनके बाप के घर छोड़ आयें !
अब इस ट्रे मे मौजूद एयरटाईट पैकेट्स पर आयें , पहले मे आप बहुत सारी हवा के बीच तैरते चार छह डरे सहमे ,कुपोषित से बादाम पाते है ! इन्हें देखते ही मन होता है कि इन्हें गोद में उठा कर नज़दीकी आंगनवाड़ी में भर्ती कर आया जाये ! दूसरे पैकेट में मीठे गुड में डूबे गिनती के पॉपकार्नो से मुलाक़ात होती है आपकी ! अब भला पॉपकार्न भी कोई मीठा करने की चीज है ! इसे मीठा करने की किसे और क्यो सूझी ये मै अब तक पता कर नही सका हूँ !
हाँ चाय का एक कप और दूध पत्ती के पैकेट भी होते है इस ट्रे मे ! गरम पानी का एक थर्मस भी साथ होता है इन सभी को आपस मे मिलाने के आप लाख जतन कर ले ,कोई भी फ़ार्मूला अपना लें ,चाहें तो वंदेमातरम भी गा लें ,पर इनमे एकता नहीं आ पाती ! ये आपस मे मिल-जुलकर भी वह चीज नही बन पाते जिसे चाय माना जा सके !
कुल मिलाकर शताब्दी वाले इसे नाश्ता कहते है ! और इसे ही नाश्ता समझते है ! ऐसा वो क्यो समझते है और क्यों कहते है खुदा जाने ! आमतौर पर नाश्ता छोटी मोटी भूख मिटाने के लिये होता है ! पर शताब्दी एक्सप्रेस इसे आपकी भूख को ज़हर देने के लिये इस्तेमाल करती है !
यदि उनमें से कोई मुझे पढ़ रहा हो तो मै इतना भर कहना चाहता हूँ कि लगातार आते आते ये समोसा भी शरमाने लगा है अब तो ! मै चाहता हूँ इस समोसे से ही शरमाना सीख लें आप ! लगातार बौने होते जा रहे इस समोसे को रिटायर करें ,पेंशन दे उसे और इस ट्रे मे कुछ ऐसा नया भर्ती करे जिसे पेट मे जगह देना सफ़र करने वालो को ठीक लगे !
समोसा ही नाश्ता नही होता उसके अलावा भी इस देश के खान पान मे ऐसा बहुत कुछ है जिसे आप बतौर नाश्ता इस्तेमाल कर सकते है ! ऐसा करने मे आपकी गाँठ से ज्यादा कुछ ख़र्च हो ऐसा भी नही ! हो सकता है चार पैसे बच ही जायें ,पर ऐसा करने के लिये आपको अपना दिमाग इस्तेमाल करना पडेगा ! पर लाख टके का सवाल यह है क्या आप ऐसा करना चाहेंगे !

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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