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निजी-पारिवारिक हिंसा और सरकार का जिम्मा..

By   /  March 19, 2020  /  No Comments

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-सुनील कुमार।।


पिछले कुछ दिनों में हमारे आसपास सौ-दो सौ किलोमीटर के दायरे में ही इतनी आत्महत्याएं हुई हैं कि समझ नहीं पड़ रहा कि हो क्या रहा है। सबसे भयानक तो दो नाबालिग बहनों की आत्महत्या थी जिन्होंने एक साथ फांसी लगाई, और यह चि_ी छोड़कर गई हैं कि उनका मामा उन दोनों से लगातार बलात्कार करता था जिससे वे थक गई थीं। अब मामा गिरफ्तार है, और दो भांजियां जा चुकी हैं। ठीक ऐसा ही एक मामला कल फिर सामने आया है जिसमें एक मामा अपनी छह बरस की भांजी की हत्या करके उसकी लाश से बलात्कार करते रहा। यह मामला आत्महत्या का तो नहीं है, लेकिन परिवार के भीतर की ऐसी हिंसा की वजह से हम उसका यहां पर जिक्र कर रहे हैं। एक बालिग-नाबालिग प्रेमीजोड़े ने दो दिन पहले एक साथ खुदकुशी कर ली क्योंकि घरवाले उन्हें शादी नहीं करने दे रहे थे। एक अपाहिज बुजुर्ग महिला की जलकर मौत की खबर है जिसे आत्महत्या बताया जा रहा है। इसके अलावा भी कई दूसरे मामले अखबारों में छपे हैं जिनमें आत्महत्या, और परिवार के भीतर ही नाबालिगों के देह शोषण की बातें सामने आई हैं।

आत्महत्या या परिवार के भीतर हिंसा-रेप, ये सब निजी जिंदगी की हिंसा की घटनाएं हैं जो कि चाहे अपने खिलाफ हों, चाहे परिवार के दूसरे लोगों के खिलाफ हों। यह तकलीफदेह इसलिए ही है कि इसे सरकार तो दूर, समाज भी तभी जान पाता है जब ऐसी हिंसा हो चुकी रहती है। इसे या तो व्यक्ति खुद रोक सकते हैं, अपने भीतर की हिंसा पर काबू करके, अपने तनाव को किसी करीबी के साथ बांटकर, या फिर परिवार के दूसरे लोग ऐसी हिंसा घटा सकते हैं, अगर उनकी जानकारी में ये बातें आती हैं। परिवार के भीतर बलात्कार अगर लंबे समय तक चलता है, तो यह मुमकिन नहीं रहता कि वह परिवार में किसी की भी जानकारी में न आए। आमतौर पर लोग इसे घर के भीतर ही दबा देना चाहते हैं ताकि पुलिस और कोर्ट-कचहरी जाकर बदनामी न झेलनी पड़े, परिवार न टूटे। लेकिन इसका जाहिर तौर पर पहला नतीजा यह होता है कि बलात्कार के शिकार बच्चे मुंह खोलने का हौसला खो बैठते हैं, और बलात्कारी का हौसला बढ़ जाता है कि परिवार ने इस बात को मान लिया है। हौसलों का यह खाई सरीखा फासला इस हिंसा को और बढ़ाते चलता है, और बलात्कारी एक बच्चे तक सीमित नहीं रह जाता।

हिन्दुस्तानी समाज अपने बच्चों के साथ घर के भीतर होने वाली हिंसा की रोकथाम में सबसे नाकाबिल समाजों में से एक है। बदनामी का डर, परिवार के कमाऊ सदस्य या मुखिया को जेल से बचाने का लालच अधिकतर परिवारों में बलात्कार को छुपाने की वजह बन जाता है। ये मामले हत्या या आत्महत्या, या बहुत कम मामलों में बलात्कार की रिपोर्ट से सामने आते हैं, और सामाजिक क्षेत्र के जानकार यह मानते हैं कि ये बहुत ही कम संख्या और अनुपात में रिपोर्ट होते हैं। आज जो लोग किसी दूसरी वजह से भी आत्महत्या कर रहे हैं, उनमें भी ऐसे लोग हो सकते हैं जिनका अपना बचपन इस तरह के यौनशोषण का शिकार रहा हो, और वे एक आत्मविश्वासविहीन, दबी-कुचली मानसिकता के साथ बड़े होते हैं, और किसी किस्म की हिंसा को बर्दाश्त करने के लायक नहीं रहते। लेकिन चूंकि सरकारी रिकॉर्ड आंकड़ों पर दर्ज होता है, इसलिए जिन्होंने रिपोर्ट नहीं लिखाई या आत्महत्या नहीं की, उनका समाज को पता ही नहीं चलता।

आज जितनी बड़ी संख्या में निजी और पारिवारिक हिंसा हो रही है, उस पर तुरंत फिक्र करने की जरूरत है। लोगों को बड़ी संख्या में पारिवारिक-परामर्श चाहिए जिसके लिए इस बात में शिक्षित परामर्शदाताओं की जरूरत है। दिक्कत यह है कि सरकारी स्वास्थ्य ढांचे में परामर्शदाताओं की बहुत ही छोटी सी संख्या है जो कि बुनियादी तौर पर मानसिक चिकित्सकों की है। सरकार को बिना देर किए अपने प्रदेश के विश्वविद्यालयों में मानसिक और मनोवैज्ञानिक परामर्श के पाठ्यक्रम शुरू करने चाहिए ताकि लोगों को मानसिक चिकित्सा से पहले मानसिक परामर्श भी हासिल हो सके। सरकार को यह बात भी याद रखनी चाहिए कि आज निजी और पारिवारिक हिंसा के जो मामले दिख रहे हैं, हो सकता है कि उनकी वजहें एक पीढ़ी पहले पैदा हुई हों, और आज जो वजहें परिवारों में पैदा हो रही हैं, हो सकता है कि उनके विस्फोटक नतीजे एक पीढ़ी बाद जाकर सामने आएं। चूंकि व्यक्तित्व को निराशा से भरने या हिंसा से भरने का काम बहुत लंबे समय बाद असर दिखाता है, इसलिए पांचसाला सरकारें उसकी अधिक फिक्र नहीं करती हैं, लेकिन यह नौबत बदलना चाहिए जो कि पेशेवर परामर्शदाताओं से ही बदल सकती है।
(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय, 19 मार्च 2020)

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  • Published: 2 weeks ago on March 19, 2020
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  • Last Modified: March 19, 2020 @ 6:54 pm
  • Filed Under: नज़रिया

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