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जो मोदी से भी न डरे वे अब कोरोना से डरना सीख रहे..

By   /  March 23, 2020  /  No Comments

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-विष्णु नागर।।

हम बहुत कुछ सीख रहे हैं। आप कहेंगे कि सरकार की आलोचना कर रहे हैं, नहीं भाई , मैं तो अपनी भी आलोचना नहीं कर रहा हूँ। मैं तो कह रहा हूँ, पहले हम जो सीख रहे थे, उसे हम और तेजी से सीख रहे हैं बल्कि बहुत कुछ नया भी सीख रहे हैं। सामान्य स्थितियों में हम यह सीख नहीं पाते।हमें यह सिखाना आसान नहीं था।

जैसे डरना अब हम अच्छी तरह सीख रहे हैं बल्कि सीख चुके हैं। जो मोदी सरकार से डरना सीख नहीं पाए थे, वे कोरोना के बहाने अब डरना सीख गए हैं। पहले मोदीभक्त निर्भीक थे, अब वे भी डरना सीख रहे हैं। जिन्हें मोदी बख्श रहे थे,उन्हें कोरोना भी बख्श दे, यह जरूरी नहीं। वह हिंदू-मुसलमान, मोदी समर्थक-मोदी विरोधी में फर्क करना नहीं जानता। शुक्र है कि कोई तो है, जो यह फर्क करना नहीं जानता-भले ही वह कोरोना जैसी महामारी हो!

धीरे- धीरे और काफी हद तक हम छूआछूत से दूर जा चुके थे। अब कोरोना के रूप में छुआछूत फिर से लौट आई है। किसी की छुई जगह और चीज को छूने से हम डरने लगे हैं।अगर उसे किसी गरीब, किसी नौकर ने छुआ है तो उससे और उसकी छुई चीज से हम बहुत ज्यादा छुआछूत बरतने लगे हैं। हम परिवार में रहकर भी एक दूसरे से दूर- दूर सीख रहे हैं। हम एकदूसरे से दूर- दूर चलने लगे हैं। कभी ब्राह्मण ‘अछूत’ की छाया से भी दूर रहते थे। छाया पड़ जाए तो अपवित्र हो जाते थे। अब अपेक्षाकृत संपन्न तबका ब्राह्मण ही नहीं, ब्राह्मणवादी हो गया है। अच्छा यह है कि मैं आपके लिए अछूत हूँ,आप मेरे लिए मगर यह भी सच है कि हम सबके लिए वे अछूत हैं,जो सचमुच कभी अछूत माने जाते थे।

लोकतंत्र आने के बाद हम (राजा) सरकार की अनुशासित प्रजा नहीं रह गए थे। अब हम अतिअनुशासित प्रजा बनते जा रहे हैं। कोरोना के भय ने हमें ऐसी प्रजा में तब्दील कर दिया है-आटोमेटिकली। हम इस स्थिति में नहीं रह गए हैं कि किसी भी तरह की असहमति जताएँ। कोरोना से पहले भी यह स्थिति आ रही थी मगर कुछ खतरे उठाकर हम लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर विरोध कर सकते थे, करते थे मगर कोरोना के आगे कौनसा लोकतंत्र? कौनसे मूल्य? सारे मूल्य एक अज्ञात खतरे से बचाने में समाहित हो चुके हैं। हम अब अचानक इतने अनुशासित हो गए हैं कि राजा कहता है, शाम पाँच बजे इस स्थिति में भी हमारी सेवा करनेवालों का आभार प्रकट करने के लिए बरतन पीटो,घंटी बजाओ तो आभार प्रकट करने के लिए नहीं, सच यह है कि आदर्श अनुशासित प्रजा( नागरिक ) दिखने के लिए हम बरतन पीटने लगते हैं।यह नये किस्म का लोकतंत्र है, न्यू इंडिया है।

तर्क यह होगा कि क्या आज की स्थिति में ऐसा करना जरूरी नहीं है? क्या यह अकेले भारत में ही हो रहा है?क्या हमसब अपनी, अपने परिवार की, अपने देश की जनता की जान को खतरे में डालें?मैं अभी इस बारे में कुछ नहीं कह रहा।बस यह सोचें कि कहीं हम उस तरह का भारत तो बनाने में नहीं लग गए हैं,जो हम अभी तक नहीं थे? क्या इस बहाने कहीं हमारी यह परीक्षा तो नहीं ली जा रही कि आज इस नाम पर,कल किसी और नाम पर हम शासक की इच्छानुकूल चलनेवाले बनने को कितने अधिक या कम तैयार हैं ? हम सब यानी हम सब। धर्म, जाति,विचारधारा से परे। इसलिए असली खतरा दूरगामी है। इसे अधिकतर लोग आज समझना नहीं चाहेंगे, यह अलग बात है। उनके लिए मेरी ओर से शुभकामनाएं।

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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