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ये वक्त भी गुजर जाएगा..

By   /  March 25, 2020  /  No Comments

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कोरोना के संक्रमण को रोकने के लिए दुनिया भर के देश अपने-अपने स्तरों पर कोशिश कर रहे हैं। यातायात के साधनों पर प्रतिबंध लगाने से लेकर शहर बंद और कर्फ्यू जैसे उपाय किए जा रहे हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि जनता अब तक इस बीमारी की गंभीरता को समझ नहीं पाई है। इसलिए सरकार की अपीलों की अनदेखी, नियमों की नाफरमानी कर खुद की और दूसरों की जान को खतरे में डालने का सिलसिला जारी है।  

इसके साथ नीम-हकीम किस्म के लोग सोशल मीडिया पर एक्टिव हो गए हैं, जो कोरोना के इलाज से लेकर अंधविश्वास फैलाने में लगे हुए हैं। इस रविवार को भारत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जनता कर्फ्यू का आह्वान किया था, साथ ही शाम 5 बजे ताली और थाली बजाकर कोरोना से बचाव में लगे लोगों का आभार प्रदर्शन करने कहा था। मोदीजी की बातों का व्यापक असर होता है, यह देश ने रविवार को देख लिया, लेकिन साथ ही यह भी देख लिया कि उनके बहुत से अनुयायी हर बात को किस तरह अंधविश्वास और धर्मांधता से जोड़ते हैं।

आभार प्रदर्शन ध्वनि चिकित्सा के भ्रामक दावों में बदल गया। साथ ही कई अन्य भ्रांतियां भी फैलाई गईं। एक ट्वीट अमिताभ बच्चन का भी आया, जो खुद इस वक्त एकांतवास पर हैं। उन्होंने लिखा था- एक राय दी गई कि 22 मार्च को शाम पांच बजे ‘अमावस्या’ के दिन वायरस बैक्टीरिया की बुरी ताकतें अपने चरम पर होती हैं। शंख बजाने से होने वाले कंपन से वायरस का प्रभाव कम हो जाता है या नष्ट हो जाता है, क्योंकि चांद नए ‘नक्षत्र’ रेवती की ओर जाता है।

22 मार्च को अमावस्या थी ही नहीं, न ही वायरस का उससे कोई वैज्ञानिक संबंध अभी सामने आया है। इस तरह की पोस्ट करने पर महानायक ट्रोल हुए तो बाद में उन्होंने इसे डिलीट कर दिया। इसी तरह रविवार को 5 बजे बहुतों ने ताली-थाली बजाने के साथ सप्तम सुर में गायत्री मंत्र भी सुनाया। कई शहरों में लोगों ने एक साथ आकर ताली-थाली बजाई, भीड़ इकट्ठा होने से वायरस फैलने का खतरा पहले से कहीं अधिक बढ़ गया।

पीलीभीत में तो डीएम और एसपी ने भीड़ के साथ घंटा-शंख बजा कर जुलूस निकाला। लगा ही नहीं कि हम किसी गंभीर संकट से निपटने की कोशिश कर रहे हैं। एकदम उत्सव जैसा माहौल बन गया, जिसके परिणाम दुखद हो सकते हैं। अपनी बात का यूं गलत अर्थ निकलते देख मोदीजी भी परेशान हो गए। लिहाजा उन्हें फिर अपील करनी पड़ी कि लोग नियमों को गंभीरता से लें। इसके साथ उन्होंने 4 दिन में दूसरी बार देश को संबोधित करने का फैसला लिया ताकि जनता को कोरोना की गंभीरता का अहसास करवा सकें। इधर धर्मगुरुओं ने भी श्रद्धालुओं से घर पर ही ईश्वर भक्ति करने की अपील की है। लेकिन यह अपील पहले ही होती तो हालात बेहतर होते।

अयोध्या में रामनवमी से पहले श्रीराम जन्मभूमि ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास ने अपील  की है कि मठों-मंदिरों में भीड़ न जुटने दें, वहीं दिल्ली की जामा मस्जिद को 31 मार्च तक बंद रखा गया है। इमाम सैयद अहमद बुखारी ने कहा कि अजान तो होगी, लेकिन लोग नमाज घर पर ही पढ़ें। कोरोना के मद्देनजर शाहीन बाग भी आज खाली करवा ही लिया गया। लेकिन यह काम आपसी समझदारी से पहले ही हो जाता तो बेहतर था। मुद्दों की लड़ाई लड़ने के लिए इंसानों का जीवित रहना जरूरी है, यह बात जनता का एक वर्ग जानकर भी नहीं समझ रहा है। लापरवाही के मामले अकेले भारत में नहीं हैं।

आस्ट्रेलिया में समुद्र किनारे बहुत से लोग धूप स्नान और खेलकूद के लिए पहुंच गए, जिन पर पुलिस को सख्ती दिखानी पड़ी। बीते शनिवार वहां दर्शकों के बिना तीन फुटबाल मैचों का आयोजन भी हुआ। इसी तरह कोरोना से बेतरह प्रभावित ईरान में शिया धर्म गुरुओं ने 16 मार्च को मशहद में इमाम रजा और क्योम में फातिमा मासूमा की दरगाह बंद करने का फैसला किया। और यह खबर जैसे ही सरकारी टेलीविजन पर आई, विरोध प्रदर्शन भड़क गए। उसी रात गुस्साई भीड़ मशहद और क्योम स्थित दरगाहों में जबरन घुस गई। अब नौबत ऐसी आ गई है कि ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्ला खामेनेई ने फतवा जारी करते हुए देश में  ‘गैर जरूरी’ आवागमन पर प्रतिबन्ध लगा दिया है।

ईरानी पुलिस ने भी फारसी नव वर्ष ‘नवरोज’ के पहले होने वाले समारोहों और आग पर चलने के परम्परागत उत्सवों पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। सरकार और धर्मगुरुओं की इन अपीलों का मर्म लोगों को समझना चाहिए, साथ ही कोरोना के इलाज को लेकर बताए जा रहे नुस्खों की बजाय केवल विशेषज्ञों की राय सुननी चाहिए। समय कठिन है, पर यह वक्त भी गुजर जाएगा।

(देशबन्धु में आज का संपादकीय)

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  • Published: 1 week ago on March 25, 2020
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  • Last Modified: March 25, 2020 @ 9:24 am
  • Filed Under: नज़रिया

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