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इंसानियत को जिंदा रखने का मौका..

By   /  March 26, 2020  /  No Comments

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कोरोना के फैलाव को रोकने के लिए मंगलवार रात 8 बजे प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि अब 21 दिन की ताला बंदी होगी। कोरोना संक्रमण स्टेज 2 से स्टेज 3 तक न पहुंचे, इसलिए जरूरी है कि लोग घरों पर ही रहें, बाहर न निकलें, दूसरों के संपर्क में न आएं। मुमकिन है 15 अप्रैल तक इस ताला बंदी के कुछ सकारात्मक परिणाम देखने मिलें। लेकिन मोदीजी यह घोषणा दिन में भी किसी वक्त कर सकते थे, रात 8 बजे का ही वक्त उन्होंने क्यों चुना, यह समझ से परे है।

बहरहाल, उनकी घोषणा से जो पहले से घरों पर हैं, संपन्न हैं, जिनके पास महीने-दो महीने का राशन है, उन्हें तो कोई खास फर्क नहीं पड़ रहा, बस वे अपनी बोरियत का राग कुछ और लंबा अलापेंगे। समय कैसे काटें, इस बारे में फोन पर चर्चा करते रहेंगे। लेकिन गरीब तबके को कोरोना के साथ-साथ रोजी-रोटी की मार का भी रोना है। रोजगार की तलाश में बाहर गए लोगों को अब अपने-अपने घरों तक पहुंचने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।  ट्रेनें बंद हैं, सड़कों पर गाड़ियों की आवाजाही न के बराबर है, ऐसे में अपने घर तक पहुंचना कठिन होता जा रहा है। और बाहर वे कहां रहें, कहां खाएं, यह बड़ी समस्या उनके सामने हैं।

खासकर मजदूर तबके के लोगों के लिए यह बड़ी समस्या है, क्योंकि अमूमन उनका कोई एक ठिकाना नहीं होता, वे एक निर्माण स्थल से दूसरे निर्माण स्थल तक अपना बसेरा बदलते रहते हैं। जितने दिन बंद रहेगा, उतने दिन उन्हें काम नहीं मिलेगा, और आगे क्या होगा, अभी कुछ कहा नहीं जा सकता। आम जनता तो इस वक्त खुद असहाय है। समाजसेवी भी इस वक्त बाहर निकलकर समाज की सेवा नहीं कर सकते। इसलिए सरकार को, स्थानीय जनप्रतिनिधियों को अविलंब गरीब तबके के लोगों, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों, बेघर, लाचार लोगों की मदद के लिए काम करना चाहिए। ताकि ये कोरोना से बचकर भूखे न मारे जाएं। 

वीडियो साभार NDTV

महा बंद के इस कठिन समय में आर्थिक मोर्चे पर भी कई चुनौतियां पेश आएंगी। देश में पहले से ऑटोमोबाइल सेक्टर, रियल स्टेट, लघु उद्योग समेत असंगठित क्षेत्र में सुस्ती छाई हुई थी। बैंक एनपीए की समस्या से अब तक निपट रहे हैं। और अब स्वास्थ्य आपदा ने अर्थव्यवस्था का पहिया जाम कर दिया है। ना तो कहीं उत्पादन है और ना मांग, लोग घरों में हैं और दुकानों पर ताले लगे हैं। ऐसे में जीडीपी के और गिरने की आशंका जतलाई जा रही है। बेरोजगारी का संकट भी और बढ़ेगा। जिस तबके ने नोटबंदी के बाद सबसे ज्यादा मार खाई, वही तबका आज फिर संशय में है कि अब उसे रोजगार कैसे मिलेगा। प्रधानमंत्री ने सलाह तो दी है कि नुकसान के कारण व्यापारी छोटे कर्मचारियों की छंटनी न करें। पहले यह अपील भी की गई है कि बंद के दौरान वेतन न काटा जाए। लेकिन इस अपील पर कितना अमल होता है, कोई कह नहीं सकता।

दुनिया में इस वक्त फिर मंदी की आहट सुनी जा रही है।  इसका सामना करने का सबसे सही तरीका यही होगा कि जो सबसे कमजोर हैं, सबसे पहले उन्हें सहारा दिया जाए। कई देशों ने राहत कोष बनाकर अरबों का फंड उसमें रखा है। भारत सरकार को भी ऐसा ही कदम तुरंत उठाना चाहिए। देश के धनकुबेरों के लिए भी यही मौका है जब वे उस देश व समाज के लिए कुछ कर सकते हैं, जिसने उन्हें संपन्न बनाया है।  इस महामारी ने इंसान की जान को खतरे में डाला है, लेकिन इंसानियत को जिंदा रखने का मौका भी दिया है, जिसका फायदा हमें उठाना चाहिए।

(देशबन्धु में आज का संपादकीय)

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  • Published: 1 week ago on March 26, 2020
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  • Last Modified: March 26, 2020 @ 3:20 pm
  • Filed Under: नज़रिया

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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