Loading...
You are here:  Home  >  मीडिया  >  नज़रिया  >  Current Article

यह अँधेरी सुरंग अंदाज से कुछ अधिक ही लम्बी रहेगी..

By   /  March 29, 2020  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

-सुनील कुमार।।

दिल्ली से गावों की ओर लौटते मजदूरों की तो तस्वीरें पल-पल में आ रहीं हैं, वे दिल दहला रही हैं, लेकिन पिछले दो दिनों से उनके बारे में लिखने के बाद आज फिर उसी पर लिखना ठीक नहीं, अब से कुछ देर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बोलने वाले हैं, तो आज उन्हीं को बोल लेने दिया जाये इस पर। हम अपनी बारी कल इस्तेमाल करेंगे। लेकिन आज एक और बात पर सोचने की जरूरत है। करने की तो कोई गुंजाईश अभी कई हफ्ते है नहीं, लेकिन सोचने के लिए तो वक्त ही वक्त है।

जब कभी कोरोना-लॉकडाउन खत्म होता है, और उसके बाद जितने भी लोग बचे रहते हैं, उनके सामने आगे की पहाड़ सी जिंदगी खड़ी रहेगी। और बाजार पर कर्ज का पहाड़ भी खड़ा रहेगा। कारोबार ठप्प रहेगा, ग्राहक बचेंगे नहीं, और ऐसी हालत में निजी क्षेत्र की नौकरियां भी नहीं बचेंगी। कारखाने क्या बनाएंगे जब बाजार में खरीददार ही नहीं होंगे? यह नौबत जल्द खत्म नहीं होगी। फिर हिन्दुतान तो वैसे भी बहुत बुरी आर्थिक मंदी से गुजर रहा था। मंदी को लेकर अर्थशास्त्रियों की परिभाषाएं जो भी कहती हों, रोज की जरूरतों के अलावा बाकी सभी सामानों के ग्राहक घर बैठ गए थे। जिनके पास भ्रष्टाचार की, दो नंबर की कमाई थी, महज वे ही लोग बाजार में महंगी खरीददारी कर रहे थे। हो सकता है कि भ्रष्टाचार जारी रहे और ऐसी कुछ खरीददारी जारी भी रहे, लेकिन उससे अर्थव्यस्था नहीं चलती।

हकीकत यह दिख रही है कि कोरोना से जो लोग चल बसेंगे, वे तो सारी तकलीफों से आजाद हो चुके रहेंगे, लेकिन जो बचे रहेंगे, उनकी जिंदगी बहुत मुश्किल होगी। आज इस मुद्दे पर लिखने की जरूरत इसीलिए लग रही है कि सीमित कमाई वाले तमाम लोगों को यह सोचना चाहिए कि कमाई घटी तो वे कैसे जियेंगे, नौकरी छूटी तो वे कैसे जियेंगे? कोरोना का खतरा और कोरोना की दहशत अपनी जगह है, लेकिन लॉकडाउन में खाली बैठे इस पर भी सोचना बहुत जरूरी है। लोगों को, खासकर मेहनत और ईमानदारी की कमाई पर जिंदा लोगों को अपने खर्च घाटे और कमाई बढऩे के बारे में तुरंत कुछ करना होगा। सकरी तनख्वाह पाने वाले लोग तो फिर भी अछूते रह सकते हैं, लेकिन निजी क्षेत्र के कामगार, असंगठित मजदूर, और बेरोजगार तो कुचल जाने का खतरा रखते हैं। आज हिंदुस्तान में जिस किसी गरीब कामगार के पास थोड़ी-बहुत भी बचत होगी वह अगले हफ्तों में खत्म हो चुकी रहेगी। आसपास अगर मोठे ब्याज पर भी कर्ज मिलेगा, तो भी लोग कर्ज तले दब जायेंगे। फिर उसके बाद का वक्त बेरोजगारी का रहेगा, जिसमें कर्ज लौटने की भी कोई गुंजाइश नहीं रहेगी। आज जो लोग गावों के लिए निकल पड़े हैं, वे जल्द काम पर न लौट पाएंगे, न उनके लिए काम बचा ही रहेगा।

जहाँ तक कारोबार की बात है, तो हर क्षेत्र में सबसे नीचे के धंधे बंद होंगे। सबसे कामयाब के बचने की संभावना अधिक होगी, लेकिन कमजोर, नाकामयाब, कर्ज से लदे धंधे बंद होंगे। कड़वी जुबान में कहें तो जिस तरह जंगल में सबसे ताकतवर के जि़ंदा रहने की संभावना सबसे अधिक होती है, कारोबार में भी वही होने का पूरा ख़तरा दिख रहा है। ऐसी हालत में जो कामगार सबसे अच्छे हैं, उनका रोजगार बना रह सकता है, लेकिन बाकी? उनको बेहतर होने के बारे में सोचना चाहिए, पहला मौका मिलते ही उनको अपना हुनर बेहतर करना चाहिए। मंदी वाले बाजार में औसत के खरीददार नहीं होते।

देश में नोटबंदी से आई तबाही जीएसटी के बुरे अमल से और आगे बढ़ी, फिर मंदी, देश में बेवजह आंदोलन खड़े करने की नौबत न्योता देकर लाई गई, नागरिकता को मुद्दा बनाकर देश की सोच को जख्मी और हिंसक बनाया गया, और अब आखिर में कोरोना आ गया, जिस पर लॉकडाउन इस बदइंतजामी का किया गया कि देश के लोगों का लोकतंत्र पर से भरोसा उठ जाये तो भी हैरानी नहीं होगी। लेकिन उस पर फिर कभी, जल्द ही।

(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय, 29 मार्च)

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email
  • Published: 2 months ago on March 29, 2020
  • By:
  • Last Modified: March 29, 2020 @ 7:39 pm
  • Filed Under: नज़रिया

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

Manisa escort Tekirdağ escort Isparta escort Afyon escort Çanakkale escort Trabzon escort Van escort Yalova escort Kastamonu escort Kırklareli escort Burdur escort Aksaray escort Kars escort Manavgat escort Adıyaman escort Şanlıurfa escort Adana escort Adapazarı escort Afşin escort Adana mutlu son

You might also like...

भारत एक देश है कोई कबीलाई समुदाय नहीं..

Read More →
Eyyübiye escort Fatsa escort Kargı escort Karayazı escort Ereğli escort Şarkışla escort Gölyaka escort Pazar escort Kadirli escort Gediz escort Mazıdağı escort Erçiş escort Çınarcık escort Bornova escort Belek escort Ceyhan escort Kutahya mutlu son
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
WhatsApp chat
%d bloggers like this: