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ऐसी खबरें पढ़ने के लिए अखबार मंगाते रहिए..

By   /  March 30, 2020  /  No Comments

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-संजय कुमार सिंह।।


दैनिक जागरण में आज पहले पन्ने पर छपी इस खबर को देखिए – अखबारों की सप्लाई चेन के सभी सामान की ढुलाई पर छूट। कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार प्रचार के लिए अखबारों को बंद से मुक्त रखे हुए है और अखबार काम की खबरें तो छापते नहीं यह बताने में लगे हैं कि उन्हें पढ़ने से कोरोना नहीं होगा। यह नहीं बताते कि उनके कर्मचारी (जिन्हें बहुत मामूली वेतन मिलता है, शायद की किसी का मेडिकल बीमा हो और किसी अनहोनी की स्थिति में मामूली राहत भी मिलती हो) को भी कोरोना का डर है। और यह डर सिर्फ कर्मचारी के लिए नहीं है अगर उन्हें होगा तो फैलता रहेगा और इसे खत्म करना टलता रहेगा। अखबार ने लिखा है कि सरकार ने अखबारों के काम आने वाले सामानों की पूरी सप्लाई चेन को छूट दे दी है।
दूसरी ओर, घर में बंद आदमी जिसके पास खरीद कर खाने का पैसा है वह जिन्दा रहे उससे संबंधित सप्लाई चेन बंद है। जिसके पास पैसे और सुविधाएं नहीं हैं उनकी को कोई बात ही नहीं है। अस्पतालों के ओपीडी तक बंद कर दिए गए हैं। खबर बताती है कि अब तक सिर्फ आवश्यक वस्तुओं की ढुलाई को अनुमति दी गई थी। पर सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को लिए जारी किए गए पत्र में केंद्रीय गृह सचिव अजय भल्ला ने कहा है कि प्रिंट मीडिया वितरण व प्रसारण से जुड़े सभी चेन इसमें आते हैं। यानी इंक, प्लेट्स, न्यूजप्रिंट से लेकर कर्मयोगी तक इसकी श्रेणी में आएंगे। पिछले दिनों में यूं तो कई आवश्यक वस्तुओं की ढुलाई का निर्देश था। प्रिंट मीडिया भी आवश्यक सेवा मे शामिल है लेकिन इससे जुड़ी कई सामग्रियों की ढुलाई में मुश्किलें आ रही थी। यहां तक कि हाकर्स को अनुमति मिलने में परेशानी होने के कारण वितरण में मुश्किलें थी।
अखबार यह भी बता रहा है कि सरकार के साथ विशेषज्ञों की ओर से बार-बार कहा जा रहा है कि अखबार सुरक्षित हैं। पर खाने की चीजें घर पहुंच जाएं यह कैसे असुरिक्षित है या क्यों जरूरी नहीं है – ऐसी कोई खबर इस अखबार में पहले पन्ने पर तो नहीं है। दूसरी ओर, सरकार यह भी सुनिश्चित करने में लगी हुई है कि बैंकों की सभी शाखाएं खुली रहें और शाखाएं ही नहीं बीसीज (बिजनेस कोऑर्डिनेटर) भी काम पर रहें। कहने की जरूरत नहीं है कि बैंकों को पूरी तरह खोल कर रखने की जरूरत नहीं है और इस बंदी में ना सभी बैंक कर्मचारियों के लिए रोज बैंक आना-जाना संभव है और ना ही यह सुरक्षित है। पर सरकार ने इसे सुनिश्चित करने का आदेश दिया था। इस पर मैं एक पोस्ट पहले लिख चुका हूं।
राशन के सामान और खाने पीने की चीजें लॉक डाउन की सफलता के लिए तो जरूरी ही हैं बहुत सारे लोगों की जीवनशैली के कारण जरूरी और सुविधाजनक भी है। लॉकडाउन की घोषणा वाले दिन किसी भी ममले में कोई स्पष्टीकरण नहीं था। अगले दिन देश भर में पुलिस वालों ने जिस ढंग से लोगों की पिटाई की उसका नतीजा यह हुआ कि डिलीवरी सर्विस पूरी तरह बंद है। गाजियाबाद में कहा जा रहा है कि डिलीवरी चल रही है पर असल में कोई डिलीवर कराने को तैयार नहीं है। अभी समय नहीं है से लेकर आपका सामान नहीं है और इतने कम सामान की डिलीवरी नहीं होगी जैसे बहानों के साथ डिलीवरी असल में नहीं हो रही है। सामान्य तो किसी सूरत में नहीं है। नतीजतन न चाहते हुए भी लोगों को घर से निकलना पड़ रहा है और पूरा परिवार संक्रमण के खतरे में है।
कहने की जरूरत नहीं है कि डिलीवरी चलती रहती तो कुछ लोगों को काम मिलता और हमारे-आपके जैसे बहुत सारे लोग सुरक्षित रहते। जो हमारी सेवा कर रहे हैं या करेंगे उनके लिए हमलोग थाली-ताली बजा ही चुके हैं सरकार ने 50 लाख का बीमा करा ही दिया है। आम लोगों को खतरे से बचना ही है। न्यूनतम टेस्ट 4500 रुपए का है। कमेंट बॉक्स में सीएनबीसी 18 की एक खबर का लिंक है। इसके अनुसार (हिन्दी में कहीं कोई खबर मिली नहीं) गृहमंत्रालय ने फूड (भोजन या खाद्य पदर्थों की) डिलीवरी को आवश्यक सेवा के रूप में रेखांकित किया है उसके बावजूद तमिलनाडु, गुजरात, पंजाब और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों (किसी पार्टी की सरकार है और उसे कितना या कैसा समर्थन है सब अलग होने के बावजूद) ने कह दिया है कि स्विगी और जोमैटो जैसी ऐप्प आधारित सेवाओं को 21 दिन की बंदी के दौरान काम करने नहीं दिया जाएगा। दूसरी ओर, महाराष्ट्र और कर्नाटक में लॉक डाउन के दौरान खाद्य पदार्थों की डिलीवरी की अनुमति है। कर्नाटक में रेस्त्रां से खाना मंगाने पर प्रतिबंध है। हालांकि उन्हें सिर्फ डिलीवरी की अनुमति दी जा सकती थी। मुझे पता नहीं वास्तविक स्थिति क्या है।

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About the author

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।

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