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प्यार की कोई परिभाषा नहीं होती, ये तो मानव स्वभाव में शामिल है – मटुक नाथ

By   /  September 28, 2011  /  4 Comments

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प्यार की परिभाषा न ही पूछें तो अच्छा ! परिभाषा बुरी शिक्षा की देन है। विद्यार्थियों को परिभाषा में उलझा कर उसके स्वाद से वंचित रखने का यह खतरनाक षड्यंत्र है। पुस्तकें प्रेम की परिभाषाओं से पटी पड़ी हैं, पर समाज में प्रेम नहीं है। प्रेम की परिभाषा है, प्रेम नहीं है। पुस्तकों में प्रजातंत्र की परिभाषाएँ हैं, देश में सच्चा प्रजातंत्र नहीं है। शिक्षा की परिभाषाएँ हैं, लेकिन देश में सच्ची शिक्षा नहीं है। देश के युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि कैसे उनके जीवन में प्रेम की रसधार बहे, कैसे देश को मुट्ठी भर स्वार्थी वर्चस्वधारी शोषकों-शासकों से मुक्ति दिलायी जाय, कैसे ऐसी शिक्षा प्रणाली लायी जाय जिसमें ‘सा विद्या या विमुक्तये’ की परिभाषा साकार हो !

कोल्हू के बैल की तरह जिस लीक पर युवाओं को गोल-गोल घुमाया जा रहा है, जहाँ गति ही गति है, प्रगति कहीं नहीं है, उस लीक से मैं उन्हें बाहर खींचना चाहूँगा। आप प्रेम की परिभाषा नहीं खोजें, प्रेम खोजें। रसगुल्ले की परिभाषा की माँग न करें, रसगुल्ले का जुगाड़ करें। रसगुल्ले की परिभाषा से कहीं उसका स्वाद जाना जाता है ? वह तो मुँह में डालने पर ही जाना जा सकेगा। मेरा जोर स्वाद पर है, परिभाषा पर कतई नहीं। प्रेम का स्वाद चखते ही आदमी का रूपांतरण हो जाता है। साधारण लोक से वह असाधारण लोक में प्रवेश कर जाता है, जहाँ सुख और दुख की किस्में अलग हैं और जो हर हालत में प्राप्त करने योग्य हैं। प्रेम की परिभाषा जानने से आदमी के भीतर कोई बदलाव नहीं आता, कोई सुख नहीं उतरता।

समाज में प्यार की बयार बहाने के लिए एक प्रयोग मैंने करना चाहा था। जब मैं 2009 में संसदीय चुनाव लड़ने के लिए पटना साहिब से खड़ा हुआ था तो अपने घोषणा पत्र में कई महत्वपूर्ण मुद्दों के साथ एक ‘लवर्स पार्क’ बनाने का इरादा व्यक्त किया था, लेकिन सत्ताधारियों को जनता का यह स्वर्ग पसंद नहीं था और उन्होंने जबरन अपनी ताकत का सहारा लेकर मेरा नामांकन रद्द करवा दिया। नामांकन रद्द करना उनके वश मंे था, मेरे सपनों को रद्द करना किसी के वश में नहीं है, वह अभी भी पल रहा है। अब तो ऐसे सक्षम साथियों का सहारा मिलने जा रहा है जिसमें यह सपना साकार होकर रहेगा। कम से कम एक हजार एकड़ भूमि में एक ऐसा ‘प्रेमपुरम’ बनेगा जिसमें दस हजार प्रेमी एक साथ एक प्रेम परिवार की तरह रहेंगे, जहाँ धरती पर प्रेम का स्वर्ग उतारने के लिए दिव्य प्रयोग होंगे।

प्रेम तो मनुष्य का स्वभाव है, वह तो अपने आप उत्पन्न होता है, सिर्फ उसके मार्ग की बाधाओं को हटाना पड़ता है। सबसे बड़ी बाधा है वह पुराना संस्कार जो अज्ञानतावश प्रेम से भयभीत है। इस जबर्दस्त संस्कार ने असमय ही युवाओं को बूढ़ा बना दिया है। भले ही उसका शरीर जवान हो, उसकी आत्मा बूढ़ी हो गयी है। जवान शरीर में जब बूढ़ी आत्मा को देखता हूँ , तो कराह उठता हूँ। हा विधाता, इस युवा को किस पाप का दंड दे रहे हो ! ‘प्रेमपुरम’ के आप भी भागीदार बनंे और इसकी स्थापना के लिए देश के किसी भी हिस्से में एक हजार एकड़ जमीन ढ़़ूँढ़ें और मिल जाय तो खबर करेंं। वहाँ प्रेम से जीने का स्वाद मिलना शुरू होगा। यह स्वाद ही प्यार को समाज में स्थान दिलाने में सहारा बनेगा।

कुछ साल पहले मीडिया ने जोर शोर से प्रचारित किया था कि मैंने प्रेम की नयी परिभाषा गढ़ी है। दरअसल मैंने कोई परिभाषा नहीं गढ़ी, सिर्फ प्रेम को जीने का दुस्साहस किया। यह साहस जरूर नया था। प्रेम के लिए सर्वस्व दाँव पर लगा दिया। तन-मन-धन और प्रतिष्ठा दाँव पर रखने में जो अनूठापन था, वह नया था। संभवतः इसी के आधार पर कहा गया कि मैंने प्रेम की नयी परिभाषा दी।

एक दूसरा कारण भी समझ में आता है। मेरा प्रेम समाज में प्रचलित मानदंड से ऊपर उठा दिखा होगा। समाज के अशिक्षित, अशिक्षित और अविकसित समूह की मान्यता है- एक विवाहित आदमी दूसरी स्त्री से क्यों प्रेम करेगा भाई ? घर में पत्नी है, बच्चा है, उनसे प्यार करो ! और यह कोई अवस्था है प्यार करने की !! वह भी किसी और से नहीं, अपनी ही छात्रा से !!! धिक्कार है !!!! लेकिन इतनी ही बात होती तो मीडिया के प्रबुद्ध जन नहीं कहते कि मैंने प्रेम की नयी परिभाषा गढ़ी है, क्योंकि इस तरह के प्रेम के घनेरों उदाहरण समाज में हैं, पहले भी थे, आगे भी रहेंगे। तो इसमें नया क्या है ? नया है इसको सही ठहराना, इसको स्वधर्म कहना- ‘स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः’। प्रेम स्वधर्म है, मेरा परम धर्म है, इसका उद्घोष पूरे आत्मबल के साथ, पूरी सच्चाई के साथ करना और इसके लिए संपूर्ण सत्ता से टकरा जाना। इसके पहले इस श्रेणी के प्रेमी अपराध भाव से, हीन भाव से ग्रसित रहते थे। बहुत कुछ छिपाते भी थे, कुछ झूठ बोलते थे और आशा रखते थे कि इस छोटी-सी गलती को समाज माफ कर दे। लेकिन मैंने देखा कि मैं सही हूँ , रूढ़िवादी मान्यताएँ गलत हैं और उन मान्यताओं के सामने मैंने न तो घुटने टेके, न समझौता किया बल्कि पूरी ऊर्जा से उन्हें ललकार दिया। इस अनोखी ललकार में प्रबुद्ध लोगों को एक नयी ताजगी दिखी, घुटन से बाहर निकलने का रास्ता सूझा और उन्हें लगा कि यह तो प्रेम की नयी परिभाषा है !

दुनिया के अनेक भक्तों, प्रेमियों और कवियों ने प्रेम की असंख्य श्रेष्ठ परिभाषाएँ दी हैं। प्रेम की कोई परिभाषा छूटी नहीं। अब उनमें कुछ नया नहीं जोड़ा जा सकता। सिर्फ प्रेमपूर्ण ढंग से जिया जा सकता है। अगर हमने प्रेमपूर्ण ढंग से जीना सीख लिया तो दुनिया को एक नयी परिभाषा दे दी। शायद इसी को कहा गया होगा कि मैंने प्रेम की नयी परिभाषा दी ! हकीकत है कि मैं प्रेम की परिभाषा जानता ही नहीं- ‘दिल-विल प्यार-व्यार, मैं क्या जानूँ रे, जानूँ तो जानू बस इतना कि मैं तुझे अपना जानू रे ’। दूसरा जब दूसरा न रह जाय, अपना हो जाय तो प्यार है। प्यार दूरी पाट देता है, दो को मिलाकर एक कर देता है। यह प्यार पूरा विकास पाये तो पूरी दुनिया एक हो जाती है। ऋषि ने जब कहा- सोऽहम्- अर्थात् मैं वही हूँ , तो यह प्यार का ही उद्घोष है। जो तुम हो, वही मैं हूँ । जो मैं हूँ , वही तुम हो, इसका बोध ही प्यार है। इसी अवस्था में धरती से शोषण और भ्रष्टाचार पूर्णतः हट सकता है, अन्यथा नहीं।

लेकिन आपने प्रेम की परिभाषा पूछी है तो उसका एक अन्य कारण समझ में आ रहा है। प्रेम की परिभाषा जानने के पीछे संभवतः एक कारण यह हो सकता है कि प्रेमी आश्वस्त होना चाहते हैं कि जो वे अनुभव कर रहे हैं किसी स्त्री के साथ, वह क्या है- महज आकर्षण है ? वासना है ? मोह है ? आसक्ति है ? प्रेम है ? क्या है ? कैसे मैं समझूँ कि मुझे प्यार हो गया। अगर ऐसा भाव उठे तो इसे मन की जल्पना समझ कर ज्यादा तरजीह न दें। सिर्फ प्रेम में डूबें। प्रेम जब प्रथम प्रथम जगता है तो वह आकर्षण ही होता है, मोह या आसक्ति से गुजरते हुए अगर सही ढंग से आदमी यात्रा करे, तो उसका प्रेम निर्मल हो सकता है। अपने प्रेम को जाँचने के लिए प्रेम की परिभाषा जानना जरूरी नहीं है। सिर्फ एक कसौटी मैं दे रहा हूँ। अगर आपका प्यार दुख ले आये तो समझिये गलत है, अगर उत्तरोत्तर आनंद में बढ़ोतरी होती जाय तो सही है। हर कर्म की कसौटी आनंद ही है।

प्रेम की परिभाषा जानने से प्रेम नहीं निकलता, परन्तु प्रेम जानने से परिभाषा जरूर निकलती है। आप प्रेम शुरू करें। आपका प्रेम ही परिभाषा को जन्म दे देगा। दूसरों के द्वारा दी गयी प्रेम की परिभाषा के चक्कर में न पड़ें।

(मटुक नाथ पटना विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं और अपनी शिष्या जूली से विवाहेत्तर संबंध रखने फिर उन्हीं के साथ रहने के कारण खासे चर्चित रहे हैं। कुछ लोग उन्हें स्वच्छंद प्रेम का मसीहा भी कहते हैं। यह लेख उन्होंने अपने फेसबुक पर लिखा है। वहीं से साभार लेकर प्रकाशित।)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

4 Comments

  1. wish u all the best.

  2. golden paswan says:

    मटुक नाथ जी….प्यार की जो परिभाषा आपने स्थापित की है वह युगों युगों तक एक अनूठा उदाहरण रहेगा …….आपने जो भी किया वह गलियों और कूचों मे होता रहा है और होता रहेगा ….पर आपने उसे परिभाषित करने का तो साहित्यिक सर्कस किया वह आप ही कर सकते हैं…………….हर जगह के अपने – अपने मर्यादा होती है …अब आप ही बताइए ……हो सकता है अंडा खाना अच्छी बात हो …ताकत मिलती है ..पर इसे मंदिर मे खाना क्यों मना है.? ……अगर आप चोरी छिपे मंदिर मे अंडा खाना चाहते हैं तो खाइए ..पर यह तर्क मत दीजिए कि चुकी अंडा तो खाना ही है …और वैसे भी अंडा खाने से ताकत मिलती है तो मंदिर मे भी खाया जाया …….समय से आगे मत भागिए आप जितना आधुनिक बनना चाहते है उतने तो ……इस सभ्यता के जनक पश्चिमी देश भी नहीं होंगे…….. .मै आपके इस लेख को गलत ठहराने के लिए एक ग्रन्थ लिख सकता हूँ …………आखिर मे इतना कहना चाहूँगा ……अपनी मानसिक दुर्बलता को अपनी ताकत बताकर जो आप सिद्ध करना चाहते है …वह तर्क आप किसी बुतखाने या किसी चकला घर मे वाहवाही बटोर देगी पर सभ्य समाज आज भी आपको एक ….मानसिक दुर्बल …..हवशी बुड्ढा ही कहेगा …….वैसे …….बहुत लिखने को मन कर रहा है ……क्या आप मुझे अपनी बेटी को पढाने का मौका देंगे …….??

  3. AJAY KUMAR says:

    मीडिया दरबार एक निर्भीक अबम निष्पक्ष पत्रिका के रूप में बहुत जल्द ही पाठको के सामने आ जाएगी
    इसकी भाषा सैली उत्क्रिस्ट अबम सराहनीय है .

    धन्यवाद

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