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क्या डॉ. अंबेडकर, आरएसएस के “नए सरदार पटेल” हैं?

By   /  April 22, 2020  /  No Comments

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-श्याम मीरा सिंह।।

“द प्रिंट” पर एक खबर छपी जिसमें लेखक ने एक बहस छेड़ी कि डॉ. अंबेडकर और आरएसएस वैचारिक स्तर समान थे। हद्द की बात ये है कि लेखक ने डॉ. अंबेडकर का एक भी विचार नहीं गिनाया जिसके आधार पर यह माना जा सके कि संघ और डॉ. अंबेडकर वैचारिक स्तर पर समान थे। जिस व्यक्ति ने ये लेख लिखा है वह “इंद्रप्रस्थ विश्व संवाद केंद्र” का सीईओ है। अंबेडकर और संघ के विचारों पर जाने से पहले आपको इस संगठन के बारे में जानना जरूरी है तब ही आप इस पूरे झूठ की जड़ में जा पाएंगे। विश्व संवाद केंद्र आरएसएस का ही एक संगठन है। जिसका काम संघ को वैचारिक स्तर पर मजबूत करना है। ये संगठन इसी प्रकार से आधे-अधूरे उद्धरण उठाता है और बहस शुरू करता है। अस्सी के दशक में जब राममंदिर प्रकरण के लिए आरएसएस को अपने पक्ष में वैचारिक तथ्य इकट्ठे करने थे, उसी दौर में ही इस संगठन की स्थापना की गई थी। ताकि राममंदिर के समर्थन में “तथ्य आधारित झूठ” फैलाए जा सकें। मंदिर मसले पर इसकी सफलता के बाद इस संगठन ने एक स्वतंत्र रूप ले लिया। तब से लेकर अबतक इस संगठन का काम संघ के समर्थन में किताबी शोध करना है। ताकि आरएसएस को वैचारिक स्तर पर मजबूत किया जा सके।

ये संगठन मीडिया और आरएसएस के बीच एक पूल का काम करता है। ये लोग आर्टिकल लिखते हैं, पुस्तकें लिखते हैं ताकि आरएसएस के पक्ष में माहौल बनाया जा सके। इनकी छोटी-छोटी पत्रिकाएं भी हर महीने निकलती हैं जो आरएसएस का स्टैंड रखती हैं। उन्हें सभी जिलों में भेजा जाता है ताकि आरएसएस के प्रचारक और उसके कार्यकर्ता नए नए शोध के बारे में जान सकें, ताकि उनके पास तर्क करने के लिए कुछ तथ्य रहें, जैसे यदि डॉ. अंबेडकर पर कोई तथ्य रखना हो तो कौन कौन से ऐसे तथ्य हैं जिनसे दलितों, वंचितों, अंबेडकर को संघ के नजदीक दिखाया जा सके।

शुरुआत में संघ ऊंची जातियों के हितों को लेकर स्पष्ट था लेकिन जैसे ही जनसंघ (भाजपा से पहले आरएसएस का राजनीतिक संगठन) आया, संघ को दलितों की याद आई। दलितों को अपने खेमे में लाने की नीति संघ के तृतीय सर संघचालक देवरस ने तेज की थी। उससे पहले संघ दलितों को लेकर उतना गंभीर नहीं था। तभी से अपनी दलित विरोधी छवि को कम करने के लिए आरएसएस अक्सर डॉ. अंबेडकर को अपने खेमे में लेने की कोशिश कर रहा है। पिछले हफ्ते 14 अप्रैल के दिन भी आरएसएस के एक संगठन “सामाजिक समरसता मंच” ने डॉ. अम्बेकडकर के जन्मदिन पर सभी कार्यकर्ताओं से अपने-अपने घरों पर “7-7” दीप जलाने का आह्वान किया था।

ये कोई पहला लेख या भाषण नहीं है जिसमें संघ ने डॉ. अंबेडकर पर दावा किया हो, आप एकबार “संघ और डॉ. अंबेडकर” नाम से या “RSS and Dr. ambedkar” नाम से गूगल पर सर्च करेंगे तो ऐसे अनगिनत आर्टिकल्स आपको मिल जाएंगे जो इस झूठ को धीरे-धीरे लोगों के मन में डालने का काम कर रहे हैं कि आरएसएस और डॉ. अंबेडकर तो वैचारिक स्तर पर समान थे।

इससे पहले कि संघ सरदार पटेल की तरह अंबेडकर के विचारों को बड़ी बड़ी मूर्तियां बनाकर दफना दे उससे पहले ही डा. अंबेडकर के मोटा-माटी विचार जान लेना बेहद जरूरी है।अब जानते हैं कि क्या सच में डॉ. अंबेडकर और संघ वैचारिक स्तर पर समान थे?

  1. 14 मई, 1951 के दिन अम्बेकडकर ने संसद में कहा “May I mention of the RSS and Akali Dal? Some of them are very dangerous associations”
    इसका हिंदी में सादा सा अनुवाद बताऊं तो डॉ. अंबेडकर ने कहा कि आरएसएस एक बेहद खतरनाक संगठन है।
    अम्बेककर का ये कथन आपको Dr Babasaheb Ambedkar: Writings and Speeches, Vol. 15 और Parliamentary Debates, Vol. 11, Part Two, 14 May 1951 में मिल जाएगा।
  2. आरएसएस का एकमात्र सबसे बड़ा लक्ष्य क्या है? “हिन्दू राष्ट्र” !! लेकिन क्या आप जानते हैं हिन्दुराष्ट्र पर डा. अंबेडकर के विचार क्या थे ? डॉक्टर आंबेडकर ने 1937 में अपनी एक पुस्तक “annihilation of caste” में धर्म आधारित राष्ट्र की मांग पर देश के नागरिकों को आगाह करते हुए लिखा था—

“अगर हिंदू राष्ट्र बन जाता है तो बेशक इस देश के लिए एक भारी ख़तरा उत्पन्न हो जाएगा. हिंदू कुछ भी कहें, पर हिंदुत्व स्वतंत्रता, बराबरी और भाईचारे के लिए एक ख़तरा है. इस आधार पर लोकतंत्र के अनुपयुक्त है. हिंदू राज को हर क़ीमत पर रोका जाना चाहिए.”

  1. आरएसएस एक झूठ फैलाता है कि डॉ. अंबेडकर
    ने दत्तोपंत ठेंगड़े को अपने संगठन “Scheduled Caste Federation” का सचिव बनाया था। दत्तोपंत ठेंगड़े जोकि आरएसएस के प्रचारक थे। द प्रिंट में लिखे इस आर्टिकल में भी लेखक ने इसी झूठ को दोहराया है। लेकिन डॉ. अंबेडकर वांग्मय के वॉल्यूम 17 के सम्पादक हरि नरके ने लिखा है कि “केवल SC कास्ट से सम्बंध रखने वाले लोग ही Scheduled Caste Federation के मेम्बर बन सकते थे। जबकि दत्तोपंत ठेंगड़े SC नहीं थे। ऐसे में SC कम्युनिटी के एक बड़े संगठन का सचिव बनाए जाने की बात एकदम हास्यास्पद है। ये एकदम झूठ है कि दत्तोपंत ठेंगड़े अंबेडकर के बनाए इस संगठन के सचिव थे।
  2. आरएसएस के अध्यक्ष को सरसंघचालक कहा जाता है, अब तक आरएसएस के 7 सरसंघचालक हुए हैं पहले हेडगेवार थे, वर्तमान में मोहन भागवत हैं। ऐसे ही संघ के दूसरे सरसंघचालक हुए “गोलवलकर” उनकी एक किताब थी “वंच ऑफ थॉट्स”। इन्हीं गोलवलकर ने मनुस्मृति लिखने वाले मनु के लिए लिखा है “मनु मानव इतिहास में सबसे पहले सर्वश्रेष्ठ बुद्धिमान और महान क़ानूनविद थे”। लेकिन इन्हीं मनु द्वारा लिखित मनुस्मृति को डॉ. अंबेडकर ने दलितों के लिए सबसे घातक बताया था। इतना ही नहीं डॉ. अंबेडकर ने इसके प्रतिरोध स्वरूप मनुस्मृति की सार्वजनिक रूप से प्रतियां भी
    जलाईं थीं!

अब आरएसएस तय करे कि गोलवलकर गलत थे कि डॉ. अंबेडकर गलत थे? आखिर आरएसएस इन दोनों में से किसकी निंदा करेगी?

5.सबको याद होगा अंबेडकर जब कानून मंत्री थे उन्होंने हिन्दू महिलाओं को न्याय दिलाने के “हिन्दू कोड बिल” पेश किया था। उस समय सदन के हिन्दू कट्टरपंथी समूहों ने इसका कड़ा विरोध किया था। ये विरोध सदन से सड़क पर आकर इतना अधिक फैल गया कि इसके लिए एक “एंटी हिन्दू कोड कमेटी” बनी,।जिसमें हिन्दू शंकराचार्यों से लेकर हिन्दू कट्टरपंथी नेता शामिल थे। बताया जाता है इसके पीछे आरएसएस ही काम कर रहा था। अपनी किताब India after Gandhi में famous historian Ramchandra Guha लिखते हैं “डॉ. अंबेडकर के खिलाफ इस पूरे राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ ने इस आंदोलन को समर्थन दिया। 11 दिसंबर 1949 को दिल्‍ली के रामलीला ग्राउंड पर आरएसएस ने एक जनसभा रखी। यहां कई वक्‍ताओं ने बारी बारी से अंबेडकर के बिल की आलोचना की। एक ने तो इसे हिंदू समाज पर एटम बम करार दिया। अगले दिन, कुछ आरएसएस वर्करों ने असेंबली की इमारतों के सामने प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने पीएम और डॉक्‍टर अंबेडकर के पुतले जलाए”

  1. अंबेडकर और आरएसएस की वैचारिक समानता का प्रोपेगेंडा जाति के सवाल पर आते ही नँगा हो जाता है। अंबेडकर अपनी किताब “Annihilation of caste” में लिखते हैं कि जाति का जन्म होता है धर्म से, और धर्म अपनी वैद्यता लेता है शास्त्रों से, यदि जाति को खत्म करना है तो शास्त्रों को खत्म करना पड़ेगा, वेदों और पुराणों को खत्म करना पड़ेगा।

क्या आरएसएस अंबेडकर के इस विचार को मानते हुए पुराणों और वेदों को मनाने से इनकार करता है? मुझे मालूम है आरएसएस ऐसा कभी नहीं करने वाला।

7.आरएसएस!…. जोकि वेदों की सत्ता स्थापित करना चाहता है, डॉ. अंबेडकर जोकि वेदों और पुराणों को ही खत्म करना चाहते हैं। आरएसएस जोकि हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करना चाहता है, डॉ. अंबेडकर जोकि “हिन्दू राष्ट्र” को एक त्रासदी मानकर किसी भी हाल में इसे रोकना चाहते हैं। आखिर इन दोनों में कहां पर आकर वैचारिक समानता हो सकती है?? जबाव है कहीं नहीं, कभी भी नहीं।

लेकिन मैं आपको यकीन दिला रहा हूँ यदि आपने, आपके बच्चों ने, इतिहास नहीं पढ़ा, लाइब्रेरी नहीं गए, किताबें नहीं खंगाली तो एकदिन आरएसएस इस बात को साबित कर देगा कि डॉ. अंबेडकर और आरएसएस दोनों एक ही उद्देश्य के लिए काम कर रहे थे।

इससे पहले कि आरएसएस डॉ. अंबेडकर को अपना “नया सरदार पटेल” बना दे उससे पहले आपके लिए ये लेख लिख रहा हूँ। डॉ. अंबेडकर और आरएसएस के बारे में लोगों को बताना आपका काम है। मेरा काम यहां खत्म होता है….

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