Loading...
You are here:  Home  >  कोरोना टाइम्स  >  Current Article

अपनी बेहतरी के बारे में सोचे मुस्लिम समाज..

By   /  April 24, 2020  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

पिछले दिनों ‘मरकज’ से लेकर मुरादाबाद तक जो हुआ, उसने मुस्लिम समुदाय के लिए और भी मुश्किलें खड़ी कर दी हैं।  जमाती, जेहादी और जाहिल जैसे शब्द इस समुदाय के साथ इस तरह चस्पा कर दिए गए हैं, मानो कोरोना संक्रमण के लिए मुसलमान ही अकेले जिम्मेदार हों। उनके बारे में सच्ची-झूठी खबरें तो फैलाई ही जा रही हैं, जगह-जगह उन्हें शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना भी भोगना पड़ रही है। उन्हें मटियामेट करने की कोशिशें तेज हो गईं हैं। उनके रोजगार छीने जा रहे हैं। उन्हें फल-सब्जियों का ठेला लगाने से मना करने और मछली पकड़ने से रोकने के प्रसंग हाल ही में हमारे सामने आए हैं। दूसरी तरफ उनके आर्थिक बहिष्कार का अभियान भी शुरू कर दिया गया है। उनकी दुकानों से सामान न लेने की, उनके साथ कारोबारी रिश्ता न रखने की अपीलें की जा रही हैं। कुछ जगहों पर बहुसंख्यक समुदाय की पहचान के तौर पर उनके व्यापारिक प्रतिष्ठानों में भगवा झंडे भी लगते देखे गए हैं।

अल्पसंख्यक समुदाय की माली हालत खराब करने की कोशिशें पहली बार नहीं हो रही हैं। पिछले डेढ़-दो दशकों में अगर कहीं हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए और किसी स्वतंत्र जांच दल ने वहां जाकर जब वस्तुस्थिति जानने की कोशिश की तो जान का कम, माल का नुकसान ज़्यादा होना पाया गया। यह तथ्य उजागर हुआ कि अल्पसंख्यकों की दुकानों को जानबूझकर तहस-नहस कर दिया गया ताकि वे रोजी-रोटी से ही महरूम हो जाएं और बहुसंख्यक समुदाय के सामने उनका सर हमेशा झुका रहे। लेकिन अब जो तरीका अपनाया जा रहा है, उसे ‘कत्ल करते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं’ की उपमा दी जा सकती है।

बीते दिनों इंदौर में कुछ समझदार मुसलमानों ने अपने समाज के चंद लोगों की बेअक्ली और लापरवाही के लिए इश्तिहार छपवाकर अफसोस जाहिर किया और उनकी तरफ से माफी भी मांगी। वहां डॉक्टरों और दीगर सरकारी अमले से बदसलूकी करने वालों ने भी सर झुकाकर अपनी गलती मंज़ूर की। उनके इस कदम को पर्याप्त सराहना मिल पाती, उनके लिए उत्पन्न क्षमाभाव कायम रह पाता, उससे पहले मुरादाबाद की घटना हो गई। लेकिन इसके बावजूद बेवकूफियों का ये सिलसिला जारी रहा। बीमारी छिपाना, चोरी-छिपे अस्पतालों से भागना, धर्मगुरुओं की हिदायत को अनदेखा कर बंद पड़ी मस्जिदों में इकठ्ठे नमाज पढ़ने जाना- इस तरह की हरकतों ने आग में घी डालने का ही काम किया।

हिंदुस्तान के मुसलमान अच्छी तरह समझते हैं कि इस वक़्त हवा उनके खिलाफ है और शायद लम्बे समय तक ऐसी ही रहेगी। ऐसे में शायद ही कोई दलील, कोई बहस उनकी मदद कर पाए, क्योंकि उनकी हर बात का जवाब पहले से तैयार है, भले ही वह कितना ही गलत या आधारहीन क्यों न हो। हाल ही में एक वीडियो के जरिए वरिष्ठ पत्रकार सबा नकवी भौमिक ने मुसलमानों को निशाना बनाए जाने पर ऐतराज जताया, तो उसका जवाब किसी हिन्दूवादी ने नहीं, पाकिस्तान से निष्कासित एक मानवाधिकार कार्यकर्ता आरफि अजाकिया ने दिया। हालांकि उसके जवाब में बहुत सारी जानकारियां या तो गलत थीं या आधी-अधूरी।

अजाकिया ने प्रचार की लालसा में ऐसा किया या किसी के इशारे पर, यह तो पता नहीं। लेकिन तय मानिए कि आने वाले समय में ऐसे और जवाब किसी जादूगर की टोपी से निकलने वाले खरगोश की तरह सामने आते रहेंगे। आप एक झूठ से निपट न पाएंगे कि दूसरा आपके सामने खड़ा होगा और बहुत मुमकिन है कि वह आपके ही किसी भाई-बिरादर की शक्ल में हो, जिसे मौका-ए-वारदात पर मौजूद गवाह की तरह पेश करने के लिए मीडिया भी मुस्तैद होगा और वह भी पूरी बेशर्मी, पूरी ढिठाई के साथ। अभी-अभी बांद्रा और पालघर के मामले में हम इसकी बानगी देख चुके हैं।

इस बात की गहरी छानबीन होनी चाहिए कि इंदौर हो या मुरादाबाद, वहां अफवाहें किसने और कैसे फैलाईं। इसके लिए जो भी दोषी पाया जाए, उसे कड़ी सजा मिले। दण्ड उन्हें भी मिले जिन्होंने अफवाहों को सच मानकर आपा खो दिया और अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली। लेकिन भारत के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समाज के लिए यह निहायत जरूरी है कि वह भविष्य में अफवाहों, झूठ और नफरत का जवाब देने के लिए अपने आपको तैयार करे। यह जवाब बड़ी लकीर खींच कर ही दिया जा सकता है।

मुस्लिम समुदाय का एक बड़ा हिस्सा आज भी कठमुल्लेपन की गिरफ़्त में है। इससे बाहर निकलना उसकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। बेशक मूर्खता और अंधविश्वास बहुसंख्यक समाज में भी कम नहीं है, लेकिन यह समय उसकी मिसालें देने का नहीं है, उससे होड़ लगाने का तो बिलकुल भी नहीं। सरकारी योजनाएं अपनी जगह हैं, मुस्लिम समुदाय को अशिक्षा और गरीबी से जूझ रहे अपने लोगों की बेहतरी के लिए उनसे परे जाकर भी सोचना चाहिए और कुछ ठोस कदम तुरंत उठाना चाहिए। वह ऐसा करेगा तो अपना ही नहीं, देश का भी भला करेगा। आखिर, हिन्दुस्तान को गंगा की जितनी जरूरत है, उतनी ही जमुना की भी।

(देशबन्धु)

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

Manisa escort Tekirdağ escort Isparta escort Afyon escort Çanakkale escort Trabzon escort Van escort Yalova escort Kastamonu escort Kırklareli escort Burdur escort Aksaray escort Kars escort Manavgat escort Adıyaman escort Şanlıurfa escort Adana escort Adapazarı escort Afşin escort Adana mutlu son

You might also like...

महात्रासदी में बदलती महामारी..

Read More →
Eyyübiye escort Fatsa escort Kargı escort Karayazı escort Ereğli escort Şarkışla escort Gölyaka escort Pazar escort Kadirli escort Gediz escort Mazıdağı escort Erçiş escort Çınarcık escort Bornova escort Belek escort Ceyhan escort Kutahya mutlu son
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
WhatsApp chat
%d bloggers like this: