Loading...
You are here:  Home  >  कोरोना टाइम्स  >  Current Article

मुसीबत के वक्त कुछ बर्बादी तो होगी लेकिन मदद जरूरी..

By   /  April 24, 2020  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

-सुनील कुमार।।
कुछ भला करने में कई बार हाथ भी जलते हैं। इन दिनों हिंदुस्तान में लॉकडाउन के चलते करोड़ों मजदूर जगह-जगह फंसे हुए हैं, और लोग उनके खाने-पीने के इंतजाम में मदद भी कर रहे हैं। किसी दूसरे शहर में फंसे हुए अपने प्रदेश के मजदूरों के लिए दूर से फोन पर खुद और सरकार की मदद से भी कुछ लोग लगे हुए हैं। उन्होंने मदद करवाई, और फिर यह शिकायत सुनने मिली कि जिन लोगों के नाम मिले हैं, उनमें से बहुत सारे तो बरसों से उन्हीं शहरों के बाशिंदे हो गए हैं, वहीं मजदूरी करते हैं, और मुफ्त में राहत मिलते देख उन्होंने भी अपना नाम लिखा दिया था। सुनकर बुरा भी लगता है, लेकिन हकीकत यही है, इस देश में लोगों को राह चलते किसी त्यौहार के दिन कई भंडारे खुले दिखते हैं, तो मोटरसाइकिल खड़ी करके कई जगह प्रसाद के नाम पर खाना खा लेते हैं। ऐसे में आज मजदूरी बंद है, दुकानें बंद हैं, तो कुछ पुराने बसे लोग भी राशन ले रहे होंगे।

कितने ऐसे लोग हैं जो मुफ्त लेना नहीं चाहते? अखबार मालिक रियायती जमीन चाहते हैं, पत्रकारों में से बहुत से हैं जो एक से ज्यादा रियायती जमीन-मकान भी ले लेते हैं, मन्त्री और विधायक अपने मकान के बाद भी सरकारी मकान लेते हैं, फिर रियायती जमीन और रियायती मकान खरीद भी लेते हैं। करोड़पति बुजुर्ग भी रेल टिकट पर रियायत चाहते हैं। बहुत से संपन्न लोग ऐसे भी हैं जो कि बूढ़े स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मां-बाप को सूटकेस-बैग की तरह लेकर चलते हैं। सरकार ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को एक सहायक लेकर चलने की छूट दी है, तो औलाद उन्हें साथ में टांगकर भी चलती है। गरीब मजदूर मुफ्त का राशन पाकर भी कितना दौलतमंद हो जायेगा? हफ्ते भर का राशन नहीं खरीदना पड़ेगा। लेकिन उसका तो काम भी महीनों का छिना हुआ है। इसलिए उसकी नीयत पर अधिक हमला बोलना ठीक नहीं।

यह तो वह देश है जिसमें आपातकाल में मीसाबंदी रहे लोगों के कुनबे छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में मीसा-पेंशन बंद होने के खिलाफ अदालत से फैसला लाते हैं, फिर चाहे संपन्न लोगों को उसकी जरूरत ही ना हो। मुफ्त का माल किसको बुरा लगता है? हिंदुस्तान में तो ट्रेन से बर्थ का रैग्जीन काटकर लाकर लोग उसका थैला बना लेते हैं, ट्रेन के पखाने से जंजीर लगा स्टील का मग्गा चुरा लेते हैं, होटलों में रखे सामानों को मुफ्त का मानकर सब कुछ भरकर लाने की फेर में रहते हैं। ऐसे देश में फंसे हुए बेरोजगार मजदूर के सामने यह दिक्कत भी है कि दुकानें खुली नहीं हैं, काम बंद है, मजदूरी बंद है, इसलिए भी कुछ सामान जुटाकर रखने की नीयत हो सकती है।
गरीब की नीयत जरूर डोलती होगी, लेकिन पैसेवालों की ना डोलती हो ऐसा भी नहीं। इसलिए आज के इस भयानक संकट के बीच भी लालची गरीबों को अनदेखा करके सभी गरीबों की मदद करनी होगी। और यह मदद कोई बहुत बड़ी नहीं है, यह थोड़े से अनाज की ही है, जो कि देश की सरकारों के लिए गोदामों से बाहर उफनकर एक दिक्कत भी बना हुआ है। छत्तीसगढ़ में जब राशन कार्ड बन रहे थे, और गरीबी के पैमाने तय नहीं हो पा रहे थे, तब उस वक़्त की भाजपा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में उसके सलाहकारों के कहे हुए यह मान लिया था जो भी गरीब, जिस भी लिस्ट में गरीबी की रेखा के नीचे आ रहे हों, उन्हें गरीब मानकर राशन दिया जाये। आज की नौबत वही है, जो अपने को भूखा कहे, उसके खाने का इंतजाम करना है। 100 में से चाहे 50 गरीब ना हों, लेकिन उनके चक्कर में बचे 50 भूखे-गरीब ना छूट जाएँ। संकट के वक्त ऐसी बर्बादी होती ही है, कुछ लोग ट्रक भरकर अनाज गायब करते हैं, कुछ लोग बिना जरूरत 5 किलो ले लेते हैं। बर्बादी रोकने के लिए राहत नहीं रोकी जा सकती।

(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय 24 अप्रैल 2020)

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

Manisa escort Tekirdağ escort Isparta escort Afyon escort Çanakkale escort Trabzon escort Van escort Yalova escort Kastamonu escort Kırklareli escort Burdur escort Aksaray escort Kars escort Manavgat escort Adıyaman escort Şanlıurfa escort Adana escort Adapazarı escort Afşin escort Adana mutlu son

You might also like...

ट्रेन के मजदूरों को बिना पानी मार डालने की सोच कोई अधिक हिंसक नहीं है..

Read More →
Eyyübiye escort Fatsa escort Kargı escort Karayazı escort Ereğli escort Şarkışla escort Gölyaka escort Pazar escort Kadirli escort Gediz escort Mazıdağı escort Erçiş escort Çınarcık escort Bornova escort Belek escort Ceyhan escort Kutahya mutlu son
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
WhatsApp chat
%d bloggers like this: