Loading...
You are here:  Home  >  दुनियां  >  देश  >  Current Article

बेहतर की उम्मीद में मजदूरों को लाल सलाम..

By   /  May 1, 2020  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

-विष्णु नागर।।

वैसे तो आर्थिक उदारीकरण के बाद से ही मजदूर दिवस का अर्थ खत्म कर दिया गया है मगर आज का मई दिवस सबसे भयानक समय में आया है।भविष्य में यह संभावनाएं लेकर भी शायद आए मगर अभी तो मजदूरों पर भयानकतम बीत रही है।लाकडाउन के बाद शायद लाखों मजदूर शहरों से गाँवों की तरफ चले गए।कुछ बचे, कुछ रास्ते में भूख -प्यास, धूप-थकान से मर गए।गाँव पहुंच कर मरने की घटनाएँ भी हैं।गोवा, दिल्ली, महाराष्ट्र आदि से आज भी न जाने कितने घर जाने के लिए तड़प रहे हैं।इधर भूख है,उधर सरकारों की उन्हें मदद पहुँचाने में नाकामयाबी है।इसे नाकामयाबी कहना भी गलत है,यह मजदूरों के प्रति दशकों से पनप रही उदासीनता का ही प्रतिबिंब है।उधर कुछ स्वयंसेवी संगठनों और व्यक्तियों ने उनकी उदारतापूर्वक मदद न की हौती तो भूख का साम्राज्य और व्यापक होता।अभी भी बहुत से करुण दृश्य हैं।दो लोगों का खाना सात लोग खा रहे हैं,जिनमें बच्चे भी हैं। अपने बच्चों को भूखा रखकर कौन माँ बाप खा सकते हैं?लाजिमी तौर पर वे भूखे मरते होंगे।ऐसे भी दृश्य हैं,जब घंटों खाने की लाइन खड़े रहने के बाद माँ को कुछ नहीं मिला और शाम को मिलने की संभावना भी नहीं।खबर ऐसी भी आई है फेसबुक मित्रों के जरिए कि दिल्ली में यमुना पुश्ते के पास तंबुओं में रह रहे मजदूर नदी तैर कर दूसरी तरफ गुरूद्वारे खाना खाने जाते हैं।इसमें एक मजदूर डूब कर मर चुका है।

भूख-प्यास के इस पक्ष के अलावा मेहनतकश से भिखारी बना दिए गए मजदूर भावनात्मक यंत्रणा से भी गुजर रहे हैं।उन्हें किसी भी कीमत पर घर जाना है और अभी भी इसकी कोई साफ सूरत नजर नहीं आती।अभी गोवा में फँसे मजदूरों की भूख और यंत्रणा की कहानी पढ़ी।वे इतने हताश हैं कि कुछ कहने लगे हैं,चलते हैं सड़क पर और मर जाते हैं कोरोना से।कम से कम हमारी गिनती उन लोगों में तो होगी, जो कोरोना से मरे हैं।इन मजदूरों ने हजारों किलोमीटर दूर दो पैसे कमाने के लिए आकर अच्छी तरह देख लिया है कि मुसीबत में उनका कोई नहीं है।न मालिक, न मकान मालिक,न दूकानदार, न सरकार, न शहर और न पूरी तरह समाज ही।कई मालिकों ने तो कचरे की तरह बुहार कर फेंक देने में एक दिन की भी देरी नहीं की।ऐसे निर्मम समाज के लिए गालियाँ, लात घूंसे खाकर क्यों और किसलिए वे खटें ?कई कहने लगे हैं,जो हो,अब नहीं आएँगे।शहरों का आधार खिसक गया है,जिसे किसी ने सम्मान नहीं दिया।व्यवस्था गलतफहमी में रही कि पूँजी से सबकुछ अपनी शर्तों पर खरीदा जा सकता है।नहीं श्रीमन अब शायद और नहीं।कम से कम इन परिस्थितियों, इन शर्तों, इन खतरों,इस निर्ममता के बीच और नहीं।

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email
  • Published: 4 weeks ago on May 1, 2020
  • By:
  • Last Modified: May 1, 2020 @ 4:15 pm
  • Filed Under: देश

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

Manisa escort Tekirdağ escort Isparta escort Afyon escort Çanakkale escort Trabzon escort Van escort Yalova escort Kastamonu escort Kırklareli escort Burdur escort Aksaray escort Kars escort Manavgat escort Adıyaman escort Şanlıurfa escort Adana escort Adapazarı escort Afşin escort Adana mutlu son

You might also like...

विशाखापत्तनम में नाच रही है मौत..

Read More →
Eyyübiye escort Fatsa escort Kargı escort Karayazı escort Ereğli escort Şarkışla escort Gölyaka escort Pazar escort Kadirli escort Gediz escort Mazıdağı escort Erçiş escort Çınarcık escort Bornova escort Belek escort Ceyhan escort Kutahya mutlu son
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
WhatsApp chat
%d bloggers like this: