/“आना-आना” के लिए दौड़ रहे हैं अन्ना आंदोलन में सेवा करने आए कट्टर “समर्थक”

“आना-आना” के लिए दौड़ रहे हैं अन्ना आंदोलन में सेवा करने आए कट्टर “समर्थक”

-शिवनाथ झा।।

दिल्ली के रामलीला मैदान में समाजसेवी अन्ना हजारे के साथ ‘कन्धे-से-कन्धा’ मिलाकर दिन-रात लड़ने वाले, भोजन-पानी, बिछावन, बिजली, लाउड-स्पीकर, पंखा, एयर-कंडीशंड गाड़ी-सवारी, पान-बीड़ी-सिगरेट और कभी-कभी “मदिरा” की आपूर्ति में लगे भारत के विभिन्न राज्यों के इवेंट मैनेजमेंट संस्थाओं का धैर्य टूट रहा है। अब वे सभी उसी स्वर से दुहरा रहे हैं, “भैया, बहुत हुई गांधीगिरी, अब लाल-लाल कागज पर छपे गाँधी जी के दर्शन करा दो, बहुत नुकसान हो गया है, भरपाई करना है।”

प्राप्त जानकारी के अनुसार दिल्ली के रामलीला मैदान में समाजसेवी अन्ना हजारे और उनके टीम द्वारा भ्रष्टाचार विरोध और जिस जन लोकपाल विधेयक को लाने के लिए लगभग 15 दिनों का आन्दोलन चला था, इस कार्य में “सेवा अर्पित” करने वाले इवेंट मेनेजमेंट संस्थाएं अपनी-अपनी बकाया राशि के तुरंत भुगतान के लिए जोरदार कोशिश कर रहे है। इस कार्य के लिए पूरे देश से बहुत सारी इवेंट मैनेजमेंट कम्पनियां लगी थी।

सूत्रों का कहना है कि कुछ समाजसेवी संस्थाएं, जो अन्ना टीम मेम्बरानों या उनके द्वारा समर्थित या संचालित स्वयंसेवी संस्थाओं की करीबी थीं, उन्हें अधिकांश राशि का भुगतान कर दिया गया है, लेकिन दुर्भाग्यवश, जो संस्थाएं, दिल्ली के बाहर से आकर, अन्ना के आन्दोलन में सहयोग दिया और इवेंट मैनेजमेंट अधिकारियों के कहने पर काफी राशि सुविधा मुहैय्या कराने में लगा दिए, उन्हें लगातार दौड़ाया और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है। इवेंट कर्मी आरोप लगा रहे हैं कि टीम अन्ना के लोग करोड़ों का चंदा खुद पचा गए हैं और अब उन्हें धमका रहे हैं।

इन संस्थानों की सबसे बड़ी दुविधा ये है कि इन्हें अनुबंधित करते वक्त कागजी कार्रवाई न के बराबर हुई थी। उस वक्त तो इन्हें समाजसेवी का चोगा ओढा दिया गया था और अब वे खुल कर अदालत या मीडिया के पास अपनी शिकायत भी नहीं ले जा सकते। सूत्रों का कहना है कि टीम अन्ना इस बात को अच्छी तरह समझती है कि वे खुद-ब-खुद तंग होकर अपने-अपने शहरों में वापस चले जायेगें। बताया जाता है कि टीम अन्ना एवं मैनेजमेंट संस्थाओं द्वारा महाराष्ट्र , गुजरात, आन्ध्र प्रदेश के अतिरिक्त उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, दिल्ली के स्वयंसेवी संस्थाओं को सेवा-सुविधा मुहैया कराने का भार सौपा गया था, जबकि देश के मीडिया में इस बात को लगातार दुहराया गया था कि “यह सभी स्वयंसेवी संस्थाएं खुद इस आन्दोलन में अन्ना की मदद कर रही हैं।”

लखनऊ की एक ऐसी ही संस्था के “हताश” सदस्य ने नाम न खोलने की शर्त पर बताया कि “आन्दोलन के समय तो सभी हाथ-पैर पकड़ रहे थे, अब तो पकड़ में ही नहीं आ रहे हैं। सबों ने “आश्वासन” दिया था कि अच्छा व्यवसाय होगा, अच्छा कमाएंगे, अपनी जमा पूंजी, बैंकों से उधार लेकर अन्ना के आन्दोलन में कोई तकलीफ ना हों, कोशिश किया। अब तो “आना-आना” केलिए “मोहताज हो रहा हूँ”। यह मैं नहीं, वे सभी कह रहे हैं जिन्हें “सेवा उपलब्ध कराने के लिए कहा तो गया था, अब पैसे के लिए दर-दर भटक रहे हैं।”

“अन्ना के लोग” अब दिखते ही नहीं। पहले मैडम जी, केजरीवाल साहेब के अलावा कई लोग फोन करते थे – जल्दी जल्दी सामान उपलब्ध कराओ। अब तो हमेशा “शहर से बाहर हैं” यही सुनता हूँ। फोन की घंटी भी थक कर बंद हों जाती है, हमारी तरह। पहले एक ही घंटी में “हेल्लो” की आवाज आ जाती थी।

सूत्रों का कहना है कि इस आन्दोलन के दौरान लगभग बीस से अधिक बड़ी “इवेंट-मैनेजमेंट संस्थाओं” को इसका कार्य-भार सौंपा गया था। इनमे से कुछ संस्थाएं अन्ना के टीम-मेम्बरान की भी बताई जाती हैं। सूत्र ने तो यहाँ तक दावा करते हैं कि “परिवर्तन” नाम से संचालित संस्था में अन्ना के टीम के एक सदस्य का अहम् भूमिका है और शायद इसका “स्वामित्व” भी उन्ही के पास है। सूत्रों का मानना है कि “वैसे पूरे आन्दोलन के दौरान सेवा-सुविधा उपलब्ध कराने पर आये कुल खर्च राशि का अंदाजा लगाना कठिन है, फिर भी यह राशि कई एक करोड़ में होगी। आज “भुगतान” नहीं होने के कारण दर्जनों संस्थाएं “सड़क नाप रही हैं”।

इस आंदोलन को आगे बढ़ाने और खर्चों के लिए पैसा जुटाने के लिए दिल्ली के रामलीला मैदान के अतिरिक्त पूरे देश में जहाँ-जहाँ अन्ना समर्थक आन्दोलन कर रहे थे वही शिविर में “दान पात्र” भी बनाये गए थे जहाँ लोगों ने जी खोल-कर धन दान किया था। दिल्ली के रामलीला मैदान में बनाए गए दान शिविर पर असंख्य लोगों की लंबी कतार लगी थी। बच्चे हों या बुजुर्ग, अमीर हो या गरीब सभी अपनी क्षमता के अनुरूप इस आंदोलन के लिए दान दिया था। मीडिया में इस बात का भी जिक्र किया गया था कि “अन्ना के समर्थक अपने घरों से खाना बनाकर दिल्ली और देश के अन्य प्रान्तों में अन्ना के समर्थकों को बांट रहे थे। यह भी कहा गया था कि धनी व्यापारी ट्रक में भरकर खाने-पीने की चीजें बांट रहे थे। मजदूर अपनी इच्छा से मैदान की साफ-सफाई में जुटे रहे। लेकिन सच तो यह है कि सभी व्यवस्थाएं “इवेंट मेनेजमेंट” द्वारा कराई गई थीं जो आज अन्ना और उनके लोगों से सेवा उपलब्ध कराने की कीमत मांग रहे है।”

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.