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कोविड-19:सर्वाधिक सक्षम तरीके से लड़ने की आवश्यकता..

By   /  May 8, 2020  /  No Comments

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-अंशुमान।।

कोरोना वायरस संकट के मद्देनजर वर्तमान परिस्थितियों से हरसंभव अधिकाधिक सक्षम मुकाबले की सख्त जरूरत है। सभ्यता विकास की ऐतिहासिक प्रक्रिया में मानव जाति ने राजसत्ता का निर्माण उन लोगों का देखभाल करने के लिए किया जिनकी वजह से यह वजूद में आया। हीगल के शब्दों में– राज्य धरती पर ईश्वर का प्रयाण है।

जैसे जैसे सामाजिक क्षेत्र में लोकतांत्रिक मूल्य बढे हैं, वैसे वैसे राज्य सत्ता से अलग-अलग नागरिक समूहों द्वारा सहायता प्रदान करने की मांग बढ़ी है, ताकि उनकी जरूरतें पूरी की जा सके।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने “विश्वव्यापी स्वास्थ्य विस्तार” (UHC) को ऐसे साधन के रूप में परिभाषित किया है जो सभी लोगों और समूहों को प्रोत्साहक, निरोधक, रोगनाशक, चंगाई और प्रशामक एवं पर्याप्त प्रभावी गुणवत्ता युक्त स्वास्थ्य सेवा अपनी जरूरत के मुताबिक उपयोग करने हेतु सक्षम बनाता है। तथा यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि इन सेवाओं के उपयोग से उपयोगकर्ता पर वित्तीय दबाव ना आए। इसमें तीन उद्देश्य अंतर्निहित है: पहुंच, एक समान गुणवत्ता और वित्तीय जोखिम सुरक्षा में समानता।

कोविड-19 का कोई संरचनात्मक संक्रमण स्वरूप नहीं है और यह वायरस हर एक को समान रूप से प्रभावित कर रहा है जो इसके संपर्क में आते हैं। लोगों की आवश्यकताओं को समरूप करने की जरूरत है, विकास की ऐतिहासिक प्रक्रिया ने समाज में विभिन्न तरह की असमानताएं पैदा की है। सो राजसत्ता का यह दायित्व है कि लोगों को न्यूनतम सुविधाएं मुहैया करवाए ताकि वे जिंदा रह सकें और जीवन यापन कर सकें।
विश्व बैंक के हाल के आंकड़ों के हिसाब से भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का करीब 3.6% स्वास्थ्य सेवा पर खर्च करता है जिसमें से वर्तमान सरकार का व्यय 1.7% है। स्वास्थ्य सेवा पर खर्च का वैश्विक औसत सकल घरेलू उत्पाद का करीब 10.02 प्रतिशत है। जनता द्वारा पूरे वैश्विक व्यय का 60% स्वास्थ्य पर खर्च किया जाता है और यह सन 2000 से 2017 के बीच प्रतिवर्ष 4.3% की दर से बढ़ा है। हाल के वर्षो में इस बढ़ोतरी की दर धीमी रही है। साल 2000 से 2010 में 4.9% से 2010 से 2017 में 3.4%।( विश्व स्वास्थ्य संगठन)

स्वास्थ्य सेवा पर भारत का व्यय 2000 में 4% से घटकर वर्तमान में 3.66% रह गया है, अर्थात राज्य के वित्त पोषण में कमी आई है। राज्य द्वारा वित्तीय पोषण में कमी की वजह से सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाएं बदतर हुई हैं।फंड के कमी की वजह से सार्वजनिक क्षेत्र बेहतर सुविधाएं जुटाने और नूतन अनुसंधान कर पाने में अक्षम हैं। सार्वजनिक क्षेत्र को निजी क्षेत्र के स्वास्थ्य सेवाओं से भी कड़े मुकाबले का सामना करना पड़ता है, जहाँ प्रचुर मात्रा में राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पूंजी लगा होता है।

हाल के वर्षों में चिकित्सा क्षेत्र के निजीकरण की प्रक्रिया द्वारा भारत में स्वास्थ्य सुविधाएं अत्यधिक मँहगी हुई हैं। इन अत्यधिक मँहगी स्वास्थ्य सुविधाओं का उपयोग उन लोगों के बूते के बाहर है, जो अर्थव्यवस्था के निचले पायदान पर हैं। आॅकील मेंबे
अपनी संकल्पना नैक्रो पॉलिटिक्स में जिंदा लाशों के बारे में बात करते हैं, कैसे “जीवन नियंत्रण का समकालिक रूप मौत की सत्ता तक” कुछ लोगों को जीवन और मृत्यु के बीच में रहने के लिए मजबूर कर देता है।

रोग से संबंधित मामला भारत में पूरे विश्व का 20% है, जिनमें से अधिकांश रोग निवारण करने योग्य हैं। स्वास्थ्य भारत में राज्य सूची में है। यद्यपि केंद्र प्रायोजित योजना, जैसे राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन आदि द्वारा केंद्र भी स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करता है।कुल लागत का 80% व्यय राज्यों द्वारा किया जाता है। 14वें वित्त आयोग की सिफारिशें स्वास्थ्य सेवाओं पर व्यय हेतु राज्यों को और ज्यादा वित्तीय प्रावधान देने का सुझाव देती है।

वर्तमान परिदृश्य में जैसा कि हम देख सकते हैं, इस विश्वव्यापी महामारी से लड़ने के लिए राज्य जिम्मेवारी ले रहे हैं। इस वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए कि अलग अलग राज्य भिन्न-भिन्न तरह से इस परिस्थिति के मुकाबले को तैयार हैं, राज्यों की विभिन्न आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु केंद्र द्वारा तुरंत राज्यों को धनराशि उपलब्ध कराना चाहिए। शहरों में और विकसित जगहों पर यूं तो प्रशंसनीय स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हैं, फिर भी शहर और गांव, महानगर और छोटे शहर के बीच अभी भी खाई है, जिसे भरने की जरूरत है।

यद्यपि नीति आयोग का गठन सहकारी संघवाद की दिशा में एक सकारात्मक कदम है, जो और ज्यादा संघीय हस्तांतरण प्रदान करेगा। इस आपातकालीन स्थिति को संभालने हेतु केंद्र को और बड़े पैमाने पर आगे आना होगा। केंद्रीय बैंक द्वारा हाल के दिनों में राज्यों के नीति दर की सीमा को घटाने और WMA(Way and Means Advance)की सीमा को बढ़ाने के उपायों द्वारा यद्यपि केंद्र ने राहत प्रदान करने की कोशिश की है, पर यह दोनों अल्पकालिक समाधान हैं।
हालांकि राज्य राजकोषीय उधार में बढ़ोतरी की मांग कर रहे हैं। वर्तमान वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए एफआरबीएम की सीमा, जो कि वर्तमान में सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) का 3% है, को बढ़ाना होगा। उदाहरण के तौर पर केरल के वित्त मंत्री इसे 3% से बढ़ाकर 5% करने की मांग कर रहे हैं। उनके अनुसार WMA में 60% की बढ़ोतरी देखने में एक बड़ी राशि लगती है, लेकिन वास्तविकता यह है कि वर्तमान परिदृश्य के परिपेक्ष्य में यह पर्याप्त नहीं है।
वित्तीय कमी के कारण जांच हेतु जरूरी साजो-सामान की भी कमी है। अतः भारत में जांच का स्तर नीचे है। इससे बाद के दिनों में वायरस आशंकित लोगों की संख्या तेजी से बढ़ेगी जिससे कि इस बीमारी से मरने वालों की संख्या में दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि होगी। स्वास्थ्य कर्मियों के लिए जरूरी रक्षात्मक उपकरणों की भी कमी है, जिसके कारण स्वास्थ्य सेवा के अंदर मरने वालों की संख्या बढ़ी है।
प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना द्वारा (PMJAY)
जांच और इलाज की सुविधा, इसके तहत आने वाले लाभुकों को मुफ्त प्रदान करने से वंचित तबके को थोड़ी राहत मिली है। प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना 2011 के सामाजिक-आर्थिक एवं जातिय जनगणना के आंकड़ों पर आधारित है। आशंका के अनुरूप इसमें अनेक प्रकार की विसंगतियां हैं, जो कि त्याज्य गलतियों के लिए एक बहुत बड़ी रिक्तता पैदा करके, लक्षित कार्य हेतु त्रुटिपूर्ण हो सकती है। आपात स्थिति के समय शासन तंत्र को इनके तरफ भी ध्यान देना चाहिए।

उन क्षेत्रों के तरफ भी ध्यान देने की जरूरत है जो प्रवासी मजदूरों के लौटने के कारण भविष्य में सर्वाधिक रूप से प्रभावित हो सकते हैं। किसी इलाके में बेहतर सुविधा प्राप्त न होने के कारण उसकी तलाश में वहां से कहीं और जाना होता है और इस तरह प्रवास की प्रक्रिया घटित होती है। प्रवासी मजदूरों के उनके घरों में लौटने के बाद इन क्षेत्रों जैसे कि बिहार,झारखंड, उड़ीसा और पूर्वोत्तर भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में इस रोग के व्यापक संक्रमण की संभावना है। इन क्षेत्रों के अविकसित होने की वजह से यहां पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं है।

जैसा कि नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी ने सुझाया है, उत्पादन के निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों को जोड़कर एक अमूर्त मशीन बनाने की तुरंत आवश्यकता है, जो कि मानव जाति के भलाई के लिए कार्य कर सके। निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के अस्पताल, स्वास्थ्य-तंत्र, खरीद और सेवा वितरण प्रणाली इन सभी को जोड़कर लाभ कमाने की जगह मानव जाति के अवलंबन हेतु कार्य करना है।

कोविड-19 से लड़ने में चाइना मॉडल या केरला मॉडल पर विचार किया जा सकता है। यहां सभी संसाधनों के एकत्रीकरण द्वारा बुनियादी जन सेवाओं और आधारभूत संरचनाओं को सुविधा प्रदान किया गया है।

क्षेत्र और समय की जरूरत के मुताबिक लोगों के विभिन्न आवश्यकताओं से निपटने हेतु वित्तीय उपायों की भी जरूरत है। तृणमूल स्तर पर विभिन्न समस्याओं के समाधान हेतु प्रजातांत्रिक विकेंद्रीकरण को एक उपाय के रूप में लिया जा सकता है। व्यक्तियों के रोग पहचान और उन्हें उत्पादन, खरीद और पुनःवितरण के बुनियादी स्तर तक निरोग करवाना, बेहतर तरीके से काम करेगा, यदि हम केंद्रीकरण और विकेंद्रीकरण के कारकों को समयारूप समरेखित करते हैं।

बेरोजगार, दैनिक मजदूर, विद्यार्थी, कामगार, मध्यम वर्ग और पूंजीपति वर्ग की जरूरतों को अलग-अलग और न्यायसंगत तरीके से लिया जा सकता है। राज्य की तरफ से जरूरत के मुताबिक संसाधनों के आवंटन की अत्यंत आवश्यकता है। अपने सामाजिक-आर्थिक या राजनीतिक हैसियत की वजह से लोकतंत्र में कोई भी छूटना नहीं चाहिए, क्योंकि तंत्र का हर एक अवयव तंत्र को चलाए मान रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

जैसा कि स्लावोज जिजेक कहते हैं– संकट का सामना करने के बाद मानव जाति का अपने उसी पूर्व स्थिति में लौटना बेहद असंभव है। नई परिस्थितियों का पैदा होना अपरिहार्य है । जरूरत इस बात की है कि नई परिस्थितियां ऐसी बनाई जाए जो कि लोगों के भिन्न-भिन्न मांगों को पूरा करने में सहयोग कर सकें।

अति उत्तम विचार और परिकल्पनाओं के साथ आगे आने की जरूरत है। और इस विश्वव्यापी महामारी से मुकाबला करने के लिए एक लोक नीति बनाने पर अपना ध्यान केंद्रित करना है, ताकि हम एक बेहतर भविष्य का निर्माण कर सकें।

(अंशुमान – पेशे से इंजीनियर हैं और राजनीति विज्ञान में दिल्ली विश्वविद्यालय से एम ए कर रहे हैं, विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में हिंदी और अंग्रेजी में लिखते हैं।)

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