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1857 के महान प्रवासी पलायन की पुनरावृत्ति

By   /  May 11, 2020  /  No Comments

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-अनिल शुक्ल।।

2020 के मई महीने में भारतीय प्रवासी श्रमिकों का पलायन इतिहास की न तो पहली बानगी है न अंतिम। यह घटना बताती है कि पहले भी धरती तब-तब कांपी है जब-जब किसान पुत्रों ने पलायन किया है। 10 मई 1857 के दिन का इतवार होना महज़ इत्तफ़ाक़ हो लेकिन मेरठ में ‘सन्डे इज़ हॉलिडे’ का जश्न मानते तमाम अंग्रेज़ अफसरों और सिपाहियों को मौत की नींद सुलाकर ‘3 कैवेलरी’ के भारतीय बाग़ियों के फौजी जत्थों का मुग़ल बादशाह बहादुरशाह ज़फर को अपना फौजी सलाम देनी की ख़ातिर देर शाम दिल्ली के लिए कूच कर डालना इत्तफ़ाक़ नहीं था। उत्तर भारत की विभिन्न देसी रियासतों की ग्रामीण पृष्ठभूमि से निकल कर दूर दराज़ तैनात ‘कम्पनी बहादुर’ की इस या उस फौज में दाखिल होने वाले इन धरती पुत्रों का दिल्ली तक का 45-46 मील का यह पलायन बेशक आगे चलकर नाकामयाब साबित हुआ हो लेकिन इतिहास गवाह है कि इसी असफल पलायन ने अगले 90 सालों तक चलने वाले भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम का दिशा निर्धारण किया।
बग़ावत, दुःख और मजबूरी, भारत में पलायन की अपनी परंपरा और इतिहास है। हर बार इससे बड़े पैमाने पर कृषि जोतों की तबाही हुई है और हर बार रियासत की मालगुजारी को ज़बरदस्त चूना लगा है। सन 1857 का कृषक संतानों का पलायन भी इतिहास की पहली घटना नहीं था। उत्तर और दक्षिण भारत में 1870 से अकाल और सूखे ने चारों ओर अपनी विभीषिका से देशवासियों को ध्वस्त कर डाला लेकिन इसका सिलसिला 1940 के दशक से ही शुरू हो गया था। ‘कम्पनी’ की ग़लत आर्थिक नीतियों और बेज़ा दखलन्दाज़ियों का नतीजा था अवध रियासत में निरंतर चलने वाला सूखा और अकाल। कृषि उत्पाद में पैदा हुए इस ज़रदास्त असंतुलन से आक्रांत अवध का किसान 1830 और 1840 से ही सूबे के एक हिस्से से दूसरे हिस्से या अन्य रियासतों में बड़े पैमाने पर पलायन करने लग गया था। ‘ईस्ट इंडिया कम्पनी’ के आदेश पर सन 1849 की अपनी अवध यात्रा से पूर्व के अपने प्रारंभिक अध्ययन और तैयारियों का जायज़ा लेने के बाद सूबे के रेज़ीडेंट मेजर जनरल डब्ल्यू० एच० स्लीमन ने ‘कंपनी’ को भेजी अपनी ख़त-ओ-ख़ितावत में इन्हें तत्काल रोके जाने की चेतावनी देते हुए लिखा था “यह खतरनाक है जो सूबा-ए-रियासत की दौलत के नज़ाम-ओ-नक़्श को तहस नहस कर देगा।“ ‘कम्पनी’ ने इस बाबत गवर्नर जनरल लार्ड डलहौज़ी को ‘उचित कदम’ उठाने के लिए लिखा लेकिन डलहौज़ी ने जनरल स्लीमन की राय को कूड़े के बस्ते में डाल दाल दिया। नतीजतन यह पलायन पूरे ‘कम्पनी’ निजाम के दौरान जारी रहा और कुछ समय के लिए तभी रुका जब 1857 में ‘ईस्ट इंडिया कम्पनी’ का डिब्बा बंद होने के बाद भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने अपने पांव पसारे। 1870 के दशक में अकाल की स्थितियां और भी विकराल हुईं और इसके चलते पलायन का सिलसिला पुनः चल निकला। 1890 के दशक में प्लेग और फ़्लू आदि महामारियों ने इस पलायन में आग में घी का काम किया जिसका नतीजा यह हुआ कि बम्बई, कलकत्ता (वर्तमान मुंबई और कोलकाता) और पूना जैसे अनेक बड़े शहर ख़ाली हो गए और ब्रिटिश, फ्रेंच और भारतीय उद्योगपतियों के चेहरों पर हवाईयां उड़ने लगीं। तभी अँगरेज़ हुकूमत ने कई अध्यादेश जारी करके इन प्रवासी मज़दूरों के पलायन पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया हालांकि जो कामयाब नहीं हुआ। लोग दम छुड़ा कर भागने लगे थे और बावजूद हुक़ूमत की लाख कोशिशों के, उन्हें रोकना नामुमकिन साबित हुआ।
1890 के दशक में फैले भयंकर ब्यूबोनिक प्लेग रोग ने मुंबई की लगभग 9 लाख की आबादी को घटाकर आधा कर दिया था। दूसरे बड़े शहरों का भी कमोबेश इतना ही बुरा हाल था। लार्ड एल्गिन, लार्ड कर्ज़न और लार्ड मिंटो- 90 केदशक से लगाकर बीसवीं सदी के पहले दशक तक ब्रितानी हुकूमत के ये 3 वाइसराय हुए और तीनों ने इस पलायन को रोकने के लिए अपने अपने समय में अनेक छोटे बड़े अध्यादेश और क़ानून बनाये। क़ानूनों का सबसे क्रूर मकड़जाल लार्ड एल्गिन ने फैलाया जो अन्यथा बड़ा ‘लो प्रोफाइल’ था। 1896 का ‘महामारी एक्ट’ उसी के दिमाग की खुराफ़ात था जिसने आने वाले समय में महामारी के दूसरे बार्बरिक नियमों और उपनियमों को जन्म दिया। आज़ाद भारत के राजनेताओं और नौकरशाही को अंग्रेज़ों के बनाये ये महामारी क़ानून बहुत सुहाते रहे। रत्ती भर छोटे बड़े बदलाव के बिना, बड़ी ‘सदाशयिता’ से वे आज तक इनकी अनुपालना कर रहे हैं।
इन 3 दशकों में बने सभी छोटे-बड़े क़ानूनों, उप नियमों और अधिनियमों के पीछे मुख्य उद्देश्य 3 थे। चाहे अकाल हो या महामारी का ख़ौफ़, ब्रिटिश विकसित होती औद्योगिक अर्थ व्यवस्था को किसी भी कीमत पर महफूज़ रखना चाहते थे और इसकी एवज में औद्योगिक श्रमिकों के पलायन को किसी भी क़ीमत पर रोकना उनका पहला मक़सद था। । दूसरा-वे भारतीय कामगारों और कृषकों के नाममात्र के लोकतांत्रिक और मानवाधिकारों को भी इन क़ानूनों की आड़ में गड़प कर जाना चाहते थे उन्होंने किया भी। । तीसरा-इस सारी गहमागहमी और मसमसे का रोना रोकर वे सत्ता को ख़ुद के हाथों में और ज़्यादा केन्द्रीभूत करना चाहते थे। उनकी इन सारी दमनात्मक कार्रवाइयों के बावजूद पलायन रुका नहीं। चाहे शोक में, चाहे दहशत में, वे पलायन करते रहे और करते रहे। पैदल-पैदल कभी खुले आम कच्ची-पक्की सड़कों पर तो कभी छिप-छिप कर गाँव-देहातों की पगडंडियों पर या कभी सीमित संख्या वाली रेल पटरियों के किनारे-किनारे। कभी पशु वाहनों या ट्रक-मोटर गाड़ियों में तो यदा कदा रेलगाड़ियों में भी।
ऐसा नहीं है कि श्रमिकों और धरती पुत्रों के इस पलायन ने भारतीय समाज के दूसरे यापक हिस्सों और प्रकारांतर से ब्रितानी हुकूमत पर असर न डाला हो। 1900-1910 के पूरे दशक में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के (जो कि तब तक मुख्यतः भारतीय मध्यवर्ग के स्वर के रूप में ही विद्यमान थी) छोटे जलसों से लेकर महाधिवेशनों तक में, किसानों और औद्योगिक मज़दूरों के सवाल धीरे धीरे अपना असर बढ़ाते गए और इसी का प्रभाव था कि दक्षिण अफ्रीका से लौट कर गांधी जी ने 2010 के दशक में जब अपना राजनीतिक महिमामंडल रचा तो गरीब किसान और कृषि श्रमिकों के सवाल उनके ‘हिज मास्टर्स वॉइस’ थे। गांधी जी के असहयोग आंदोलन और कांग्रेस के प्रभावी विरोध ने ब्रितानी हुकूमत पर दबाव डाला और इस तरह पलायन करते हिन्दुस्तानियों पर होने वाले दमन कुछ हद तक कम हुए हो सके और इससे उनके पलायन को कुछ ठहराव मिला। । 20 के दशक में जब पहली बार भारत में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना हुई, ये मज़दूर और किसान ही थे जो उसका आधार बने। कम्युनिस्टों की ट्रेड यूनियनों के लाल बावटों (झंडों) ने ही पहले बम्बई, आगे चलकर कलकत्ता और फिर कानपुर, अहमदाबाद, हैदराबाद और दूसरे अनेक बड़े औद्योगिक शहरों में इन मज़दूरों के कदम पर थाम लिए।
कामगारों का पलायन आज फिर उबाल पर है। 1857 अपने को दोहरा रहा है। 1840, 1870, 1890 और 1910 के दशक एक बार फिर अपनी पुनरावृत्ति करने को बेताब हैं। भारतीय मीडिया चाहे जितनी उपेक्षा करे, सत्ताधारी दल जितनी भी घृणा दर्शाये और राजनीतिक विपक्ष चाहे जितने ‘एक्सक्यूज़’ ढूंढें, धरतीपुत्रों का पलायन एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय एजेंड बन चुका है। उन्नीसवीं सदी की मानिंद वे आज भी कभी पैदल खुले आम पक्की सड़कों पर तो कभी छिप-छिप कर गाँव-देहातों की पगडंडियों पर, कभी रेल पटरियों के किनारे-किनारे, कभी साइकिलों पर, कभी पशु वाहनों में तो कभी ट्रक, बस या सामान ढोने वाली मोटर गाड़ियों में या फिर टिकट खरीदकर कभी न्हीं रेल गाड़ियों के भीतर सवार होकर, ‘मार्च’ कर रहे हैं। यह पलायन वस्तुतः महान यात्रा है निःसंदेह जिसके गर्भ में बड़ा बदलाव छिपा है और जो बीते इतिहास की हुक़ूमक्तों को ठोंक-पीट कर दुरुस्त करती आयी है।
इसने इतिहास बदला है । इसने नया इतिहास रचा भी है।
इसी ने हमें भी इतिहास का पाठ पढ़ाया है।


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संपादक

अनिल शुक्ल: पत्रकारिता की लंबी पारी। ‘आनंदबाज़ार पत्रिका’ समूह, ‘संडे मेल’ ‘अमर उजाला’ आदि के साथ संबद्धता। इन दिनों स्वतंत्र पत्रकारिता साथ ही संस्कृति के क्षेत्र में आगरा की 4 सौ साल पुरानी लोक नाट्य परंपरा ‘भगत’ के पुनरुद्धार के लिए सक्रिय।

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