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गिर कर शहतूत बनते हुए..

By   /  May 11, 2020  /  No Comments

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क्या आपने कभी शहतूत देखा है,
जहां गिरता है, उतनी जमीन पर
उसके लाल रस का धब्बा पड़ जाता है।
गिरने से ज़्यादा पीड़ादायी कुछ नहीं।
मैंने कितने मजदूरों को देखा है
इमारतों से गिरते हुए,
गिरकर शहतूत बन जाते हुए।

ईरानी कवि साबिर हका की यह कविता इस समय जितनी प्रासंगिक है, शायद किसी और समय न हो। अपने घरों को लौट रहे आप्रवासी मजदूर सड़कों और फुटपाथों पर, बल्कि अब तो रेल की पटरियों पर भी शहतूत बन जाने को मजबूर हैं। कभी भूख-प्यास के चलते, कभी बीमारी और थकान के कारण और कभी हादसों का शिकार होकर। पिछले एक-डेढ़ महीने से ऐसा कोई दिन नहीं बीत रहा है जब किसी मजदूर के अपनी मंजिल पर पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देने की ख़बर न आती हो। लेकिन बीते शुक्रवार औरंगाबाद में जो हुआ, वह लॉकडाऊन के दौरान सबसे ज़्यादा दिल दहला देने वाला हादसा साबित हुआ।

जालना के एक कारखाने में काम करने वाले कुछ मजदूर पटरियों के संग-संग उस स्टेशन के लिए चल पड़े जहां से उन्हें अपने गृहप्रदेश के लिए ट्रेन मिलने का भरोसा था। वे इतना ही जानते थे कि लॉकडाऊन के कारण रेलगाड़ियों की आवाजाही बंद है। लगभग 40 किमी सड़क और फिर पटरियों के साथ चलते-चलते जब वे थक गए तो थोड़ा सुस्ताने के लिए रुके और उन्हीं पटरियों पर सो गए। उन्हें क्या पता था कि जब वे अपने गांव-अपने परिवार के बीच होने का सपना देख रहे होंगे, तब अचानक कोई मालगाड़ी उन्हें उस लोक की यात्रा पर ले जाएगी जहां से कोई वापस नहीं आता। विडंबना है कि जिस गाड़ी से उन्हें घर आना था, उससे उनके पार्थिव शरीर वापस आए।

जैसे ही इस हादसे की खबर आई प्रधानमंत्री ने ट्वीट कर घटना पर अफसोस जताया और रेल मंत्रालय को इसकी जांच के लिए निर्देशित कर दिया।  हादसा चूंकि महाराष्ट्र में हुआ और मरने वाले मध्यप्रदेश के थे, तो दोनों राज्यों की सरकारों ने मुआवज का ऐलान कर दिया। यह बात समझ से परे है कि इस घटना में जांच करने जैसा क्या है। क्या सरकार में बैठे लोगों को दिख नहीं रहा है कि अपने गांव-देस की ओर पलायन कर रहे मजदूर कैसी-कैसी जिल्लतें झेल रहे हैं। वे सड़क पर चलते हैं तो पुलिस मारती है, पुलिस से बचें तो कोई ट्रक आकर उन्हें कुचल देता है और जंगलों से गुजरते हैं तो लूट लिए जाते हैं। ऐसे में वे रेल पटरियों पर न जाएं तो क्या करें! और देश के किसी एक नहीं, हर हिस्से में मजदूर पटरियों का सहारा लेने को मजबूर हैं। इक्का-दुक्का चैनल जो इन मजदूरों के हाल देश के सामने ला रहे हैं, वे पहले ही देशद्रोही करार दे दिए गए हैं, लिहाजा सरकार उन्हें तो देखने-सुनने से रही।

बहरहाल, देखने वाली बात है कि रेल मंत्रालय कब और कैसी जांच करता है, किसे दोषी ठहराता है और क्या सजा तय करता है। लेकिन जो क्या इस बात की कभी जांच होगी कि आखिर ऐसे हालात बने ही क्यों और क्या इनके लिए जिम्मेदारी कभी तय होगी? क्यों लाखों लोग अपने पैरों पर हजारों किलोमीटर का सफर करने को मजबूर हैं, अपनी मेहनत के बूते रूखी-सूखी ही सही, रोटी कमाने वालों को हाथ क्यों पसारने पड़ रहे हैं, उनके अपने सूबे की सरकार क्यों उनके साथ दुश्मनों सा सलूक कर रही है, कौन हैं वो लोग, जो प्रलोभन देकर मजदूरों को उनके गांव, उनके घर से दूर ले जाते हैं और फिर उनका शोषण करते हैं, उन्हें बंधुआ बनाकर रखना चाहते हैं, कौन है जो बस की एक सीट के लिए उनसे कई दुगुनी-तिगुनी कीमत वसूल कर रहा है या ट्रेन के तथाकथित रियायती किराए के नाम पर उनकी गांठ से पाई-पाई निकाल लेना चाहता है?

केन्द्र और राज्य सरकारों की अब तक की कार्रवाई से जाहिर है कि उसने इस हादसे को आये दिन होने वाले हादसों की तरह ही लिया है। जांच का आदेश देकर और मुआवजा बांट कर वे अपनी जिम्मेदारी से फारिग हो जाना चाहती हैं। लेकिन यह महज एक हादसा नहीं, व्यवस्था द्वारा की गई हत्या है। इस हादसे से अलग भी न जाने कितने मजदूर राह चलते अपनी जान गंवा चुके हैं। अगर व्यवस्था की हृदयहीनता उनके लिए जिम्मेदार नहीं है तो फिर कौन जिम्मेदार है और क्या वे भी मुआव•ो के हकदार नहीं हैं? सरकार क्या अब भी स्वीकार नहीं करेगी कि लॉकडाऊन से पहले मजदूरों को घर लौटने के लिए पर्याप्त समय दिया गया होता या उसके बाद भी समय रहते उनके लिए जरूरी इंतजाम कर दिए गए होते, तो अच्छे दिनों की आस में घर छोड़कर निकले मजदूरों को अपने परिवारों के लिए अंधकार छोड़कर न जाना पड़ता।

इस हादसे को लेकर कुछ लोग आश्चर्य और व्यंग्य के साथ पूछ रहे हैं कि मजदूर पटरियों पर क्यों सोए हुए थे और उनकी मौत के लिए सरकार कैसे जिम्मेदार है। वरिष्ठ पत्रकार पी सांईनाथ का यह कथन ऐसे ही लोगों के लिए है कि जब आप इस बात से बेपरवाह थे कि ‘वे किन हालातों में जी रहे हैं, तो अब उनकी मौत की खबर सुनकर ताज्जुब क्यों होता है।’ यह बात उन पर भी लागू होती है जो इस घटना से  व्यथित हैं। हम अक्सर गरीब बस्तियों के टीन और तिरपाल से ढंके दड़बेनुमा मकानों को हिकारत भरी नजरों से देखते हैं, लेकिन आज अगर साइकिल पर आगे छोटे बच्चे को और पीछे बुजुर्ग मां को बिठाकर ले जाते मजदूर की तस्वीर हमारे मन में टीस पैदा कर रही है, अपनी दुधमुंही बहन को बारी-बारी से पीठ पर लादने वाले बच्चों के नजारे हमारी आंखों में आंसू ला रहे हैं या ऐसा ही कोई और दृश्य हमें बेचैन कर रहा है, तो क्या कल भी हम इन्हें याद रखेंगे?

यह अकारण नहीं है कि बेवक़्त और बेवजह हुई ये तमाम मौतें नोटबंदी के दौरान हुई मौतों की याद दिला रही हैं। चौंकाने वाले अंदाज में किया गया वह फैसला भी सैकड़ों मौतों का कारण बना था। लेकिन उस वक़्त भी सरकार ने उन्हें खारिज कर दिया था और इस समय भी वह इन मौतों को बहुत सामान्य ढंग से ले रही है। जबकि साफ दिखाई दे रहा है कि आप्रवासी मजदूरों का यह पलायन जल्दी थमने वाला नहीं है और न ही उनके जान गंवाने का सिलसिला। और होगा यही कि हमेशा की तरह सरकारी दस्तावेजों में ये मौतें केवल एक आंकड़ा बनकर दर्ज हो जाएंगी। लेकिन यह सवाल बना रहेगा कि मजदूरों का शहतूत बनकर गिरते जाना, क्या ‘न्यू इंडिया’ का एक और ‘न्यू नॉर्मल’ बन रहा है? यदि हां, तो उन लाल धब्बों को कैसे मिटाया जा सकेगा जो वे जमीन पर नहीं, व्यवस्था के माथे पर छोड़कर जा रहे हैं।
(टीप: साबिर हका की कविता का हिन्दी अनुवाद: गीत चतुर्वेदी)

(देशबन्धु)

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