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कोरोना के पहले नहीं सीखा पर अब तो सबक ले लें

By   /  May 12, 2020  /  No Comments

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हिन्दुस्तान में चल रहे लॉकडाऊन के बीच आज डेढ़ महीने बाद भी जिस तरह से राज्यों के ऊपर जिम्मेदारी आई हुई है, उससे जूझना देश के किसी भी राज्य के लिए आसान नहीं लग रहा है। सरकारों से बात करें तो लगता है कि यह उनके लिए मुमकिन नहीं है, मजदूरों से बात करें तो लगता है कि उनके लिए इस मुल्क में कोई लोकतंत्र नहीं है। यह तो देखने का नजरिया रहता है जो केन्द्र सरकार से शुरू होता है जिसे लॉकडाऊन करते वक्त यह लगा कि राष्ट्र के नाम एक संदेश देश में पूरा इंतजाम करने के लिए काफी है। राज्य सरकारों को लगा कि उनके प्रदेशों से गए हुए मजदूर जहां हैं, वहां जिंदा रह लेंगे, यह राज्य सरकारों का नजरिया था। यह अपनी खुद की समझ के खिलाफ की भावना थी क्योंकि यह राज्यों के लिए सबसे आसान बात दिख रही थी कि न उन्हें मजदूरों को लाना पड़े, न ही कोरोना जैसी महामारी उनके प्रदेश में बेकाबू हो, न ही सरकार पर आर्थिक बोझ आए। उद्योगपतियों का नजरिया था कि जब तक धंधे-कारखाने बंद हैं, तब तक मजदूर अपने हाल पर किसी तरह जी लें, ताकि काम-धंधा शुरू होने पर मजदूर और कारीगर मौजूद रहें, मालिक तो हासिल रहेंगे। एक ही नौबत, एक ही तस्वीर, लेकिन देखने के नजरिये कितने अलग-अलग थे, अलग-अलग हैं, और अलग-अलग रहेंगे। इस देश में देवी की पूजा की महिमा के राजनीतिक गीत गाने वाले नेता, उनकी पार्टियां, और उनकी सरकारें, ये सबके सब यह नजारा देखकर भी एकदम चुप हैं कि गर्भवती औरतें हजार-हजार किलोमीटर पैदल चल रही हैं, सड़क किनारे बच्चे जन रही हैं, और उन बच्चों को थामे फिर सैकड़ों किलोमीटर के पैदल सफर पर निकल जा रही हैं। जिन वामपंथियों के हाथ आज केरल की सरकार है, और जो देश में सबसे अच्छा काम कर रही है, उसकी बात को अगर छोड़ दें, तो देश के बाकी पार्टियों में से किसी ने भी क्या महिलाओं की ऐसी हालत पर अपनी पार्टी के लाखों-करोड़ों कार्यकर्ताओं के लिए यह फतवा जारी किया कि वे गाडिय़ां लेकर निकलें, और जितने मजदूरों को जितनी दूर तक छोड़कर आ सकें, उतनी दूर तक छोड़कर आएं। जो नेता और पार्टियां अपने करोड़ों कार्यकर्ता होने का दावा करती हैं, क्या वे नमूने के लिए भी, सुबूत के तौर पर भी एक भी ऐसी अपील दिखा सकती हैं कि उन्होंने अपने सारे कार्यकर्ताओं को सड़क पर लोगों की मदद करने, उन्हें उनके प्रदेश की सरहद तक छोड़कर आने को कहा हो?

राज्य सरकारों की आज की नौबत ठीक वैसी ही है जैसी कि उत्तराखंड में भूस्खलन होने के बाद उस तबाह प्रदेश की हुई थी। यह अलग बात है कि आज चट्टानों ने गांवों को कुचला नहीं है, आज हिन्दुस्तानी मेहनतकश मजदूर हजारों किलोमीटर का सफर करते हुए भी मोटेतौर पर जिंदा हैं। लोकतंत्र ने उनको मार डालने में कोई कसर नहीं रखी थी, लेकिन मेहनत की आंच से तपे हुए उनके बदन, और जिंदा रहने का उनका पक्का इरादा, बेमुद्दत हौसला उनको चलाए जा रहा है। हमारे पुराने और नियमित पाठकों को याद होगा कि हमने हर किसी किस्म की आपदा के लिए राज्य शासन को तैयारी करने का सुझाव दिया था। उस वक्त ऐसी महामारी का तो अंदाज नहीं था, लेकिन मानव निर्मित या किसी प्राकृतिक विपदा से निपटने के लिए क्या-क्या किया जाना चाहिए, प्रदेश के नक्शे पर हर अस्पताल, हर रक्तदाता, हर समाजसेवी संगठन के नाम-नंबर किस तरह दर्ज करके रखने चाहिए ऐसी बहुत सी बारीक बातें भी हमने आपदा प्रबंधन की तैयारी के लिए सुझाई थी। लेकिन सरकार का आपदा प्रबंधन का नजरिया अपने एक विभाग के तहत एक फाईल तक सीमित रहता है, और छत्तीसगढ़ भी उससे कोई अछूता नहीं है। इस राज्य में भी ऐसी किसी मुसीबत की कल्पना करके भी यह तैयारी नहीं थी कि समाज के कौन से लोग मुसीबत के वक्त अपनी गाडिय़ां लेकर सड़कों पर उतरने के लिए तैयार हो सकते हैं। छत्तीसगढ़ में लाखों खिलाड़ी हैं, और कसरत करने वाले, एनसीसी में जाने वाले लाखों नौजवान हैं जिनकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता अधिक है, और जो आज काम आ सकते थे। लेकिन सरकार की तरफ से कोई ऐसी संगठित और व्यवस्थित योजना इन डेढ़ महीनों में भी नहीं दिखी है जिसमें समाज के लोगों की इस अतिरिक्त और उत्साही क्षमता का इस्तेमाल हो सके। और यह राज्य कोई अपवाद नहीं है, पूरे देश का यही हाल है, कोई भी प्रदेश ऐसा नहीं दिखता जहां सरकारों ने अपने बजट, अपने अफसर, और अपने जिले या नीचे के स्तर तक के सरकारी ढांचे से परे जनता की कोई योजना बनाकर रखी हो। आज भी जहां-जहां सामाजिक भवन लोगों को ठहराने के लिए मिल रहे हैं, वे सबके सब आग लगने पर खोदे गए कुएं हैं। जो सामाजिक संगठन लोगों को खाना पहुंचा रहे हैं, वे सरकारी योजना के बिना अपनी मर्जी से कर रहे हैं, या उन्हें प्रशासन ने आखिरी में जोड़ा है। जो राजनीतिक दल खुद होकर लोगों के लिए कुछ इंतजाम कर रहे हैं, वे भी अपनी मर्जी से कर रहे हैं, सरकार की किसी आपदा प्रबंधन योजना के तहत नहीं। आज भी सरकारों को चाहिए कि अपने प्रदेश में चलने वाले आईआईएम जैसे प्रबंधन संस्थानों से कहे कि वे मौजूदा समस्याओं, और मौजूदा आपात तैयारियों को देखते हुए आगे के लिए समाज का, संचार का, सरकार का, आवागमन का, खानपान का, इलाज और ठहरने का एक ऐसा खाका तैयार किया जाए जो कि किसी भी वक्त की मुसीबत में बस कम्प्यूटर की एक बटन जितनी दूरी पर रहे।

जैसा कि किसी गंभीर बीमार के इलाज के मामले में होता है, ऐसा ही एक गोल्डन अवर, सुनहरा घंटा) हर मुसीबत के वक्त होता है। आग लगे तब फायर ब्रिगेड का नंबर ढूंढने में वक्त बर्बाद करने वाले सब कुछ जल जाने देने के लिए जिम्मेदार रहते हैं। और हो सकता है कि राज्य सरकारों की कोई दिलचस्पी ऐसी कोई योजना में न हो, क्योंकि कई बार बदइंतजामी सरकारी अमले को सुहाती है, ऐसे में आईआईएम जैसे संस्थानों को खुद होकर आपदा प्रबंधन के ऐसे मैप बनाने चाहिए जो कि किसी प्रदेश के हर किलोमीटर पर उपलब्ध संसाधनों को नाम और नंबर सहित दर्ज करके रखे। हम आदतन हर बरस एकाध बार सरकारों के लिए ऐसी नसीहत लिखते हैं जिसे सरकार में शायद ही कोई पढ़ते हों, लेकिन आम जनता को भी यह समझ में आना चाहिए कि सरकारी कामकाज में अगर कोई कमी-कसर है, तो वक्त पडऩे पर उसके बारे में सवाल किए जा सकें।

दो लाईनों में अगर हम अपनी सोच को अगर फिर से दोहराएं, और पुरानी सलाह के साथ कोरोना-बदइंतजामी का नया तजुर्बा जोड़कर कहें, तो पहली बात यह कि सरकार को अपने ढांचे से बाहर समाज की ताकत का नक्शा बनाकर रखना चाहिए जो कि सरकारी अमले से हजार गुना अधिक बड़ा है, और ताकतवर है। जिस तरह कई संस्थाएं रक्तदाताओं के नाम और नंबर का रजिस्टर रखती हैं, उसी तरह सरकार को समाज और लोगों की हर उत्साही क्षमता का नक्शा बनाकर रखना चाहिए, उसका ऐसा दस्तावेजीकरण और कम्प्यूटरीकरण करना चाहिए कि वह मुसीबत के वक्त तुरंत ही इतनी बड़ी ताकत का इस्तेमाल किया जा सके। आज अगर इस देश में ऐसे उत्साही लोगों की एक लिस्ट हर राज्य के पास होती, तो किसी मजदूर को एक मील भी पैदल नहीं चलना पड़ता, और लोग अगले शहर तक उन्हें छोड़कर आने की ताकत रखते हैं। लेकिन आज जो सबसे मेहरबान लोग हैं, उनकी ताकत को भी सरकार ने महज खाने और पानी तक सीमित रखा है। इस लोकतंत्र में आज यह साबित हो चुका है कि सरकार तंत्र इस देश का पूरा फ्लाप शो है। जैसा कि हम कुछ दिन पहले यहां लिख चुके हैं यह देश संचितों और वंचितों के बीच बंटी हुई आबादी का एक खंडित देश है। यह देश केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच बुरी तरह टकराव और भेदभाव वाला एक खंडित संघ है। यह देश अड़ोस-पड़ोस के राज्यों के बीच अनबोले सरीखे रिश्तों वाला एक देश है जिसमें कोई भी सरकार अपनी जमीन से अपने निवासियों के अलावा बाकी सबको किसी भी तरह धकेलकर दूसरे प्रदेश में दाखिल करा देने में दिलचस्पी रखती है। यह पूरा सिलसिला बताता है कि कोई राज्य केन्द्र पर निर्भर नहीं रह सकते, कोई स्थानीय संस्थाएं राज्य पर निर्भर नहीं रह सकतीं, और मजदूर तो अपने खून-पसीने के अलावा और किसी पर निर्भर नहीं रह सकते। ऐसे में हिन्दुस्तानी समाज की सामूहिक चेतना, उसकी सामूहिक क्षमता का एक नक्शा बनाना जरूरी है ताकि मुसीबत के वक्त मदद की ताकत रखने वाले लोग मदद की जरूरत वाले लोगों के सीधे भी काम आ सकें। लेकिन चूंकि ऐसी व्यापक योजना बनाना जनता के बस का नहीं है, इसलिए इसमें सरकार और आईआईएम जैसे संस्थानों की भागीदारी जरूरी है। कोरोना से अगर हम इतना भी नहीं सीख पाए, तो इस ठोकर से नुकसान तो हो ही चुका है, अगली ठोकर से भी नुकसान इससे बड़ा भी हो सकता है।
( दैनिक छत्तीसगढ़)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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