Loading...
You are here:  Home  >  कोरोना टाइम्स  >  Current Article

कम से कम उन्हें देखकर ही और लोग कुछ सीख जाएं

By   /  May 18, 2020  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

-सुनील कुमार।।
हमारे आसपास और दूसरी जगहों पर लोगों की मदद करने के लिए बाहर निकले हुए लोगों की तारीफ में हम पहले भी कई बार लिख चुके हैं। लेकिन मुसीबत और खतरे की ऐसी घड़ी में अगर तारीफ के लायक कुछ बातों का दुबारा भी जिक्र हो जाए तो क्या हर्ज है? आज सुबह छत्तीसगढ़ के रायपुर में मंजीत कौर बल नाम की सामाजिक कार्यकर्ता ने फेसबुक पर पोस्ट किया है कि जिन कॉलोनियों या इमारतों में लोगों के पास पानी की खाली बोतलें हों वे 20 बोतलों में पानी भरकर इन नंबरों पर फोन करें, तो बोतलें ले जाकर शहर के सिरे पर मजदूरों के जमघट को दे दी जाएंगी ताकि आगे के सफर में उनके पास पानी रहे, और बोतल रहे। पानी की खाली बोतलें हर संपन्न परिवार में एक बोझ होती हैं, लेकिन खाते-पीते परिवारों के कई नौजवान, कई आदमी, कई महिलाएं, और कई बुजुर्ग रात-दिन मजबूर-मजदूरों के लिए इस कदर लगे हुए हैं कि मानो उनके अपने घर में आग लगी है। भोपाल में एक अधेड़ या बुजुर्ग दिखतीं लेखिका तेजी ग्रोवर रात-दिन छत्तीसगढ़ के मजदूरों के लिए लगी हुई हैं कि उन्हें खाना पहुंच जाए, अनाज पहुंच जाए, वे पैदल छत्तीसगढ़ रवाना न हों, वे पागलों की तरह सोशल मीडिया पर मदद की अपील करती हैं, मदद जुटाती हैं, और अपने परिचितों को लेकर हर किस्म के इंतजाम में लगी हुई हैं। इस मुद्दे पर आज लिखना दो बातों से सूझा है जिसमें से एक 20 मिनट पहले तेजी ग्रोवर का फेसबुक पोस्ट है कि गाजियाबाद के दोस्तों तुरंत संपर्क करो, हम लोग छत्तीसगढ़ के मजदूरों के एक समूह को वहां रोकने की कोशिश कर रहे हैं ताकि वे पैदल रवाना न हों, उनके लिए गाड़ी का इंतजाम कर रहे हैं। उसके पहले उन्होंने अपने किसी परिचित का नाम लेकर लिखा कि तुरंत संपर्क करो, छत्तीसगढ़ के मजदूर विजय नगर चौराहे पर हैं, और उन्हें पैदल वापिस नहीं आने देना है, उनके लिए इंतजाम कर रहे हैं। लेकिन इससे इन कोशिशों से कुछ अधिक विचलित करने वाली एक तस्वीर मध्यप्रदेश की है जिसमें ऊचेहरा नाम की जगह पर दो गरीब बच्चे नंगे पांव सड़क के बीच खड़े हैं और आते-जाते मजदूरों को पूछ-पूछकर खाने के पैकेट बांट रहे हैं, और बता भी रहे हैं कि पैसे नहीं लगेंगे।

एक तरफ रायपुर में एक महिला शाम सात से रात दो तक मजदूरों के जमघट के बीच इंतजाम में लगी है, अपने तमाम परिचितों को झोंककर रखा है, विचलित होकर कभी सरकार के खिलाफ लिख रही है, तो कभी सरकार के अच्छे काम की तारीफ में लग जाती है। कुल मिलाकर वह पल-पल इन मजदूरों की मदद करने में लगी है जिनकी मदद इस देश की सरकारें ठीक से नहीं कर पा रहीं, लोकतंत्र बिल्कुल नहीं कर पा रहा है। ऐसी कहानियां जगह-जगह है। कृष्ण कांत नाम के एक पत्रकार ने दो-तीन दिन पहले की एक तस्वीर पर दर्द के साथ लिखा है कि किस तरह सूरत से उत्तरप्रदेश रवाना हुए दो कपड़ा-मजदूर रास्ते में एक की तबियत बिगडऩे पर एक साथ उतर गए। बाकी मजदूरों ने साथ नहीं दिया, और वे ट्रक में आगे बढ़ गए। दोस्त की मदद करते हुए अस्पताल ले जाकर तमाम कोशिशों के बावजूद जब वह मर गया, तो उस हिन्दू नौजवान के साथ सिर्फ उसका वह मुस्लिम दोस्त मौजूद था।

यह सब जिस वक्त हो रहा है उस वक्त उत्तरप्रदेश में थानेदार नोटिस जारी करके सड़क के किनारे के घरवालों को लिख रहा है- एक नोटिस जारी कर रही है सड़क किनारे के कई घरवालों को लिखा गया है- प्राय: देखने में आ रहा है कि आपके द्वारा पैदल चल रहे प्रवासी मजदूरों को अपने आवास के सामने रोक लिया जाता है। इस आशय की गोपनीय जानकारी प्राप्त हुई है कि आपके द्वारा रास्ते में मजदूरों को अपने आवास पर खाने-पीने की वस्तुओं की लालच देकर बुलाया जाता है। इससे कोविड-19 के नियमों का उल्लंघन हो रहा है। आप सचेत हों, भविष्य में आपके द्वारा इस प्रकार करने पर महामारी अधिनियम के अनुसार आपके विरुद्ध वैधानिक कार्यवाही की जाएगी।

अब सवाल यह है कि राह चलते मजदूरों को कोई क्या लालच देकर अपने घर बुला लेंगे, और उन्हें खिला-पिलाकर उनसे क्या हासिल कर लेंगे? उनके पास मेहनत से कमाया हुआ टूटा-फूटा, फटा-पुराना जो कुछ था, वह सब तो पूंजीवाद, लोकतंत्र और सरकार ने मिलकर पूरी तरह लूटा हुआ है, उनके पास से लूटने के लिए अब और क्या निकल सकता है? अगर हजार मील के सफर पर चलते मजदूर परिवारों कोई रोककर खाना खिला रहे हैं, कुछ पल बैठने की जगह दे रहे हैं, तो उस पर उत्तरप्रदेश की योगी सरकार की पुलिस का यह रूख है! यह हाल तब है जब सरकारों ने अधिकतर जगहों पर लोगों को ठीक उसी तरह बेसहारा छोड़ दिया है जिस तरह आमतौर पर गाय-बकरियों के मालिक उन्हें घूरों पर खाने के लिए छोड़ देते हैं। इन मजदूरों की ऐसी हालत के बीच भी अगर आम लोगों के बीच से निकलकर महान लोग सामने आ रहे हैं, और अपनी महानता की कोई तस्वीर छपवाने नहीं आ रहे, तो उस बीच सरकारों में जो संवेदनशीलता होनी चाहिए, वह कम से कम उत्तरप्रदेश सरकार के इस नोटिस में तो नहीं है।

लेकिन आज देश भर में जगह-जगह जिस तरह बिना किसी प्रचार के लालच के लोग खतरे में पड़कर भी लोगों की मदद करने में रात-दिन लगे हैं, कहीं एक कोई मुस्लिम आदमी है जो लावारिस छोड़ दी गई हिन्दू, मुस्लिम तमाम किस्म की लाशों को उनके धार्मिक रीति-रिवाजों के मुताबिक निपटा रहा है, बहुत सी जगहों पर लोग अपने धर्मस्थान दूसरे धर्म के लोगों के लिए खोलकर, खाना खिलाने के लिए बैठे हैं, इन सब बातों से हिन्दुस्तान के बेहतर इंसानों का पता लगता है, और यह भी पता लगता है कि सरकारों में बैठे बहुत से लोग, बहुत सी सरकारें ऐसी बेहतर बातों से ठीक उतनी ही दूर हैं जितनी दूर मजदूर अपने घरों से हैं। लोगों के समर्पण, लोगों के हौसले, लोगों के नि:स्वार्थ त्याग, और लोगों के सरोकार, इन सब पर भी बार-बार चर्चा होनी चाहिए क्योंकि लोगों में भलमनसाहत के बारे में जिस तरह से भरोसा खत्म हो चुका है, उस भरोसे का वापिस आना, और कायम होना भी जरूरी है। यह दुनिया अब तक चाहे जिस किसी झांसे में जी रही थी, कोरोना ने हिन्दुस्तान में यह साबित कर दिया है कि लोकतंत्र, या देश की सरकार सबसे गरीब के सबसे नाजुक वक्त में उससे हजार मील दूर बैठी हुई है, और दिल्ली में अपने ऐशोआराम की खूबसूरती बढ़ाने के लिए 20 हजार करोड़ रूपए मंजूर करके बैठी है, उसे खर्च करने पर आमादा है। देश के गरीबों को यह समझ आ गया है कि उनकी जगह सरकारों के लिए पांच बरस में एक बार पोलिंग बूथ के बाहर तो है, लेकिन उससे अधिक कुछ नहीं है। ऐसे में कुछ राज्य सरकारें अच्छा काम कर रही हैं, और यह बात भी इतिहास में अच्छी तरह दर्ज होगी। फिलहाल हम यह चाहते हैं कि जो लोग तरह-तरह के गढ़े हुए झूठ फैलाकर नफरत बढ़ाना चाहते हैं, उनके बीच कम से कम कुछ जिम्मेदार लोग तो बेहतर और महान इंसानों के त्याग के बारे में बाकी लोगों को बताएं, हो सकता है कि बाकियों में से कुछ को इससे प्रेरणा मिले, और हो सकता है कि बाकी में से कुछ ऐसे में घर बैठे शर्म खाकर चुल्लू भर पानी में डूब मरें। ऐसे लोगों के मरने से भी धरती पर से बोझ ही कम होगा।

आज सोशल मीडिया गिनती में चाहे कम हो, लेकिन भले और सरोकारी लोगों की वजह से मानवता कही जाने वाली इस खूबी की कहानियां देख रहा है। इनसे सीखकर लोगों को खुश तो करना चाहिए। और कुछ नहीं तो सूखे बिस्किट और पानी की घर में भरी हुई साफ बोतलों को लेकर राह पर निकल पड़ें, और जहां जो दिखे उससे पूछते चलें, उसे देते चलें। ऐसे अनगिनत वीडियो सामने आए हैं जिसमें मजदूर सैकड़ों किलोमीटर बाकी सफर के लिए भी जरूरत से अधिक बिस्किट-पानी लेने से मना कर रहे हैं। कम से कम उन्हें देखकर ही और लोग कुछ सीख जाएं।

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

Manisa escort Tekirdağ escort Isparta escort Afyon escort Çanakkale escort Trabzon escort Van escort Yalova escort Kastamonu escort Kırklareli escort Burdur escort Aksaray escort Kars escort Manavgat escort Adıyaman escort Şanlıurfa escort Adana escort Adapazarı escort Afşin escort Adana mutlu son

You might also like...

महात्रासदी में बदलती महामारी..

Read More →
Eyyübiye escort Fatsa escort Kargı escort Karayazı escort Ereğli escort Şarkışla escort Gölyaka escort Pazar escort Kadirli escort Gediz escort Mazıdağı escort Erçiş escort Çınarcık escort Bornova escort Belek escort Ceyhan escort Kutahya mutlu son
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
WhatsApp chat
%d bloggers like this: