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कॉमेडी, एक्शन, रोमांस, थ्रिलर, ट्रेजेडी, ड्रामा उर्फ़ बस डिप्लोमेसी

By   /  May 21, 2020  /  No Comments

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-अनिल शुक्ल।।

आइये आइये देखिये श्रीमान ! देखिये देखिये कैसे क़ुर्बान चढ़ती है चाह मज़दूरों के घर द्वार तक पहुंचने की! आइये और देखिये कैसे पड़ोसी राज की एक राजकुमारी उन्हें सपने दिखाती है 56 दिन से चप्पल घसीटते मज़दूरों को बस में तफरीह कराने की। आइये और देखिये श्रीमान, कैसे कूदते फांदते अपने राज के बॉर्डर पर बीबी बच्चों के साथ जमा हो जाते हैं मज़दूर ! देखिये आज़ाद मुल्क में ज़ंजीर में बंधे कंकाल सा जिस्म वाले मज़दूर! आइये और अपनी आंखों से देखिये लोकतंत्र में भूखे प्यासे धूल फांकते पसीना पीते मज़दूर! आइये और देखिये कैसे डटे रहते है तीन दिन तक मज़दूर, अपने राज के बॉर्डर पर गांव पहुंच जाने की चाह में! आइये आइये श्रीमान ! देखिये देखिये ! कैसे आसमान से उतर आता है एक दानव धरती पर! देखिये देखिये कैसे पहाड़ बनकर मज़दूरों के सामने खड़ा हो जाता है दानव! आइये आइये श्रीमान! आइये और देखिये ! क्या पहुंच पाते हैं मज़दूर अपने गांव में ! क्या हरा पाते हैं मज़दूर दानव को! देखिये देखिये अपनी आंखों से देखिये ! क्या पूरे हो पाते हैं सपने राजकुमारी के! आइये आइये देखिये श्रीमान! देखिये ग्रांड इंडियन थिएट्रिकल कम्पनी का नया शाहकार! बस डिप्लोमेसी! बस डिप्लोमसी! आइये श्रीमान! आइये आइये देखिये! बस डिप्लोमैसी! ग्रांड इंडियन थिएट्रिकल कंपनी का नया ड्रामा! बस डिप्लोमेसी !
ड्रामा पांच दिन तक ख़ूब चला। अख़बारों में कस कर समीक्षा छपीं। टीवी पर प्रोमों की जम कर बारिश होती रही। टिकट भी ख़ूब बिके। सारे शो हाउसफ़ुल गए। पर आख़िरकार ग्रांड इंडियन थिएट्रिकल कंपनी के नया शाहकार- बस डिप्लोमसी! बस में ‘तफ़रीह’ की मज़दूरों की चाह से सजे संवरे ड्रामे का आदित्यनाथ की यूपी में बुद्धवार की शाम ‘द एन्ड’ हो गया। अपने दाख़िले के इंतज़ार में दिल्ली के बॉर्डर पर खड़ी बसें वापस ठिकानों पर लौट गयीं। पथराई आंखों और बीबी-बच्चों के साथ दूसरे राज्यों से लौट कर घर वापसी की पैदल यात्रा पर यूपी का मज़दूर चल निकला। भूख और प्यास के दरिया में डूबते-उतराते और घर से बेघर होकर सड़कों पर भटकते निरीह, बेहाल और बेबस मज़दूरों की ‘रेलबंदी’ की भाजपाई नौटंकी का जवाब देने के लिए कांग्रेस ने ‘बसबंदी’ का थिएटर खोलने की कोशिश की थी। सोमवार अपराह्न से लेकर बुद्धवार शाम तक कांग्रेस ने जगह-जगह यूपी बॉर्डर को 16 सौ बसों से घेर रखा था। परेशान हाल मज़दूर और उनके बीबी-बच्चे इन सीमाओं पर नज़रें गड़ाये देखते रहे कि ‘ख़ुदा के नूर’ की बारिश अब हो और अब हो। बारिश मगर न हुई। बादल उमड़-घुमड़ कर चले गए, बरसे लेकिन नहीं।!
दरअसल ‘बस डिप्लोमसी’ का बिगुल बीते सप्ताहांत से ही फुंक गया था। ड्रामा शुरू हुआ। पहले सीन का सेट लगा दिल्ली में। शंख फूंकने की शुरुआत कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने की। बीती 16 मई को उन्होंने यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ख़त लिखकर 1 हज़ार मज़दूरों को कांग्रेस की बसों में राजस्थान से यूपी से भेजे जाने की पेशकश की। प्रियंका और कांग्रेस का आलाकमान भली-भांति जानते थे कि मज़दूरों और कोटा की कोचिंग के बच्चों को सरकारी बसों में मंगवाकर आदित्यनाथ ने न सिर्फ़ अपनी पार्टी के शिवराज सिंह चौहान और मनोहरलाल खट्टर जैसे मुख्यमंत्रियों को धूल चटा दी बल्कि अपने सहयोगी पार्टनर नीतीश कुमार जैसों को भी ठेंगा दिखाने में कामयाबी हासिल की थी। प्रियंका के ख़त को मार्मिकता की चाशनी में डुबो कर लिखा गया था। यह मज़दूरों की ‘बेचारगी’ पर ‘रहम खाने’ की अपील से सराबोर था। दर्शक दीर्घा में बैठा मज़दूर डबडबायी आंखों से तमाशा देखता रहा और मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना करता रहा- हे भगवान, योगी जी को मना लो। आख़िरकार पर्दा गिरा।
दूसरे सीन का सेट लगा लखनऊ में। तुर्क और अफ़ग़ान शैली के (मिले-जुले) आर्किटेक्चर की तर्ज़ के खंभे लगे। जैसी कि उम्मीद थी, योगी जी एकबारगी प्रियंका के झांसे में नहीं आये। उनकी शुरूआती ना नुकुर करने की जो सामाजिक प्रतिक्रिया हुई उससे साफ़ हो गया कि बीते 2-3 हफ़्ते में उन्होंने जो ‘डिविडेंट’ बटोरा था’ वह रेत की मानिंद मुट्ठी से फिसल रहा है। ज़बरदस्त बैक ग्राउंड म्यूज़िक के साथ उन्होंने पैतरा बदला। हां कर दी। इस ‘हां’ में उन्होंने एक तुग़लक़ी फ़रमान भी जोड़ दिया-सभी एक हज़ार बसों का ‘आइडेंटिफिकेशन परेड’ में पेश होने के लिए लखनऊ पहुँचने का हुक़ुम! दोनों तरफ की तुर्की-बतुर्की और इस ‘दमदार दलील’ के बाद कि बसों को हज़ार किमी की बेमतलब यात्रा में नाहक न झोंका जाय, आख़िरकार तय पाया गया कि बसों की जांच यूपी की बॉर्डर पर ही होगी। दर्शक वृन्द ने हिंदी में ‘थैंक गॉड’ कहा और चैन की सांस ली। पर्दा गिर गया।
मंगलवार को सेट आगरा-भरतपुर बॉर्डर पर लगा। बसें जुटनी शुरू हो गयीं। फतेहपुर सीकरी से सटे चौमा शाहपुर के नाके पर राजस्थान से आने वाली बसों को पुलिस ने रोक दिया। कागज़ों की छानबीन में 40 फीसदी बस परमिट को ‘फर्जी’ बताया गया। ये भी कहा गया कि बहुत सी बसों की ‘फिज़िकल कंडीशन’ ठीक नहीं। ‘ओके कंडीशन’ का सर्टिफिकेट पेश किया गया लेकिन नामंज़ूर कर दिया गया। ‘क्लाइमेक्स’ आ गया। बसों की पैरवी में उप्र० कांग्रेस कमेटी के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू पहुंच गए। दलील दी की जिन 60 फीसदी बसों के परमिट से कोई शिकायत नहीं, उन्हें प्रवेश की इजाज़त दे दी जाय। काफी देर के बहस-मुहाविसे के बाद लल्लू और उनके सहयोगियों को गिरफ़्तार कर लिया गया। ‘महामारी एक्ट 1897’ के तहत नेताजी लोगों का चालान हुआ। यूपी में किसी राजनेता को महामारी एक्ट की तरफ से दिया गया यह पहला ‘गार्ड ऑफ़ ऑनर था। अगले दिन आगरा जज ने ज़मानत दी तो जेल के गेट पर स्वागत में लखनऊ पुलिस पहले से तैयार खड़ी थी, हार फूल की हथकड़ी डाल कर लखनऊ ले भागे। पहले चौमा से लखनऊ फिर भरतपुर से जयपुर तक, और दोनों राज्यों के ‘उप’ कूदे। इधर से दिनेश उधर से सचिन। अंततः दिल्ली में जम कर जूतम-पैज़ार हुआ। प्रियंका जी ने अफ़सोस प्रकट किया। लड़ाई-लड़ाई माफ़ करो, कुत्ते की…..साफ़ करो। पर्दा गिरा दिया गया।
अगले दिन चौथा सीन शुरू हुआ। इस बार सेट दिल्ली-नोएडा के बॉर्डर पर ले आया गया। सुन्दर-सुन्दर सी बसें दिखीं। दूर-दूर तक। बहुत सी लक्ज़री बसें भी थीं। बसें देख कर हुगली की 6 साल की तितली के मुंह में पानी आ गया। वह आज तक ऐसी सुंदर बस में नहीं बैठी थी। हुगली ने कस के 2 लप्पड़ लगाए और बस की ‘नजर’ उतारी। जमना के पप्पू के मुंह में भी बसों को देख-देख कर पानी आता रहा लेकिन तितली का हाल देखकर उसने रत्ती भर मुंह नहीं खोला। ड्रामा शुरू हुआ। म्यूज़िक बजा, लोग आते गए। बहस मुहाविसा शुरू हो गया। वे लोग एक दूसरे पर चढ़ते रहे। बसों को फर्ज़ी बताया गया। प्रत्युत्तर में कहा गया कि ‘फ़र्ज़ी’ डॉक्यूमेंट हो सकते हैं, बसें कैसे हो गयीं? फिर पता चला कि दिए गए नंबर स्कूटर और ऑटो के हैं। जवाब में कहा गया कि मज़दूर हैं कोई सेठ नहीं। जब पैदल या चप्पल चटकाते जा सकते हैं, तो ऑटो में क्या कष्ट? फिर आया कि बसों की बॉडी ख़राब है। जवाब में कहा गया मज़दूर हैं, मिस्टर इंडिया नहीं। अब तक ‘टेंशन बिल्डअप’ हो चला था। चीख़ कर पूछा गया- ” ये बॉडी बॉडी क्या लगा रखा है बे?” जवाब में दूसरा ‘बे’ आया। फिर तीसरा, फिर चौथा। फिर ‘बहन जी’ प्रकट हुईं। फिर ‘माताजी’ उतरीं। ढूंढ-ढूंढ कर काफी दूर तक ऐतिहासिक रिश्तेदारियों का ज़िक्र चला। अंत में चप्पल-जूते फिंके।
ये सभी जूनियर आर्टिस्ट थे, कोई स्टार कास्ट नहीं, इसलिए ख़ूब हंसी-ठठ्ठा हुआ। ज़बरदस्त कॉमेडी हुई। देश भर के ड्राइंग रूम में चाय-कॉफ़ी के प्यालों में कॉमेडी का ज़बरदस्त उफ़ान आया लेकिन दर्शक दीर्घा में बैठे पूरनचंद , रामवीर, मुन्नी कमला, जुम्मन, अब्दुल गनी, सलमान, जमीला और सकूरन को बिलकुल हंसी नहीं आयी। वे तो ऊपर वाले से यही मनाते रहे- इन्हें अक्कल दो भगवन। सुना है भगवान ‘लॉकडाउन लीव’ पर थे। कोई सुनवाई नहीं हुई। मज़दूरों की आंख से आंसू टपकते रहे-टप्प…. टप्प…. टप्प। अंता में पर्दा गिर गया। दर्शकों ने अपने आंसू पोंछे, ओटली-पोटली संभाली। पांव के छालों पर मरहम लगाया और चल दिए अपने गाँव की ओर पईयां-पईयां।
इस तरह ड्रामे’ का अंत हो गया। कांग्रेसियों की बसों को यूपी की भाजपा पुलिस ने ज़ब्त कर लिया। इसके बाद, जैसा कि रिव्यू छपते हैं और उसमें भले-बुरे की टिप्पणियां कही जाती हैं, भला-बुरा कहा गया। प्रियंका जी ने पूरे घटनाक्रम पर अफ़सोस प्रकट किया। कहा कि बस नहीं चलवानी थी और मज़दूरों को ऐसे ही सड़क पर घिसटवाना था तो पहले ही बता देते, ग़रीब के 5 दिन ख़राब न होते, वगैरा वगैरा। कांग्रेस की कोशिश है कि इस बसबन्दी में योगी जी की खूब धुलाई हो।
योगी जी को इसका खूब ज्ञान है। सुना गया है कांग्रेस के हॉस्टाइल होते ही अपनी बसों को लगवा देंगे बस स्टैंड पर । करो बेटा तफ़रीह !

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संपादक

अनिल शुक्ल: पत्रकारिता की लंबी पारी। ‘आनंदबाज़ार पत्रिका’ समूह, ‘संडे मेल’ ‘अमर उजाला’ आदि के साथ संबद्धता। इन दिनों स्वतंत्र पत्रकारिता साथ ही संस्कृति के क्षेत्र में आगरा की 4 सौ साल पुरानी लोक नाट्य परंपरा ‘भगत’ के पुनरुद्धार के लिए सक्रिय।

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