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UP में गुंजाईश नहीं किसी भी पार्टी को बहुमत मिलने की, क्या दो बार होंगे चुनाव?

By   /  October 1, 2011  /  4 Comments

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-ओमकार मणि त्रिपाठी।।

वर्ष 2007 के विधानसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में जब बहुजन समाज पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला था और मायावती के नेतृत्व में सरकार का गठन हुआ था, तो ऐसा लगा था कि इस प्रदेश में अब गठबंधन युग और राजनीतिक अस्थिरता का दौर खत्म हो चुका है,लेकिन अब एक बार फिर आबादी के लिहाज से देश के सबसे बडे सूबे में त्रिशंकु विधानसभा के आसार नजर आ रहे हैं। संभावना तो इस बात की भी बन सही है कि शायद 2012 में होने वाले चुनाव के बाद ऐसी स्थितियां उत्पन्न हों, जिसमें कोई गठबंधन करके भी सरकार बनाने की स्थिति में न हो और दोबारा चुनाव कराना पडे।

मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल पूरा होने में लगभग 6 माह का वक्त रह गया है, लेकिन कोई भी राजनीतिक दल यह दावा कर पाने की स्थिति में नहीं है कि आगामी चुनाव में वह अपने दम पर बहुमत हासिल करके सरकार बना लेगा। यह सही है कि भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों और मायावती की स्वच्छंद और निरंकुश कार्यशैली के कारण बसपा की लोकप्रियता का ग्राफ नीचे आया है, लेकिन यह भी उतना ही सही है कि किसी विपक्षी दल की लोकप्रियता में कोई खास इजाफा भी नहीं हुआ है।

उत्तर प्रदेश के बारे में अक्सर कहा जाता है कि वहां लोग पार्टी या नेता को नहीं, बल्कि जाति को वोट देते हैं और इस समय लगभग हर पार्टी का जातीय समीकरण बिगडा हुआ है। पिछले चुनाव में मायावती ने अपने परंपरागत दलित वोटों के साथ ब्राह्मण मतदाताओं को जोडकर बहुमत हासिल किया था, लेकिन इस बार ब्राह्मणों में बसपा को लेकर पहले जैसा उत्साह नहीं दिख रहा है और कुछ दलित जातियां भी बसपा से बिदकती नजर आ रही हैं।
दूसरे नंबर की पार्टी समाजवादी पार्टी का जातीय समीकरण भी मजबूत होने के बजाय पहले से कमजोर ही हुआ है।

बेनीप्रसाद वर्मा के कांग्रेस में जाने के बाद कुर्मी समुदाय में अपनी पकड़ खो चुकी सपा को दूसरा झटका अमर सिंह की विदाई से लगा और साथ में थोडा-बहुत क्षत्रिय समाज जो था, उसने खुद को आहत महसूस किया। मुस्लिम मतदाता भी अब पहले की तरह मुलायम सिंह के पक्ष में एकजुट नहीं है,वह कई टुकडों में बंटता नजर आ रहा है। मुस्लिम समाज का एक हिस्सा पीस पार्टी से जुड गया है,जबकि राहुल गांधी की सक्रियता के बाद एक हिस्सा कांग्रेस के प्रति और सत्ता में होने के कारण एक हिस्सा बसपा की ओर भी आकर्षित हुआ है।
उधर भाजपा ने उमा भारती को मैदान में उतारकर कल्याण सिंह के जाने से हुए नुकसान की भरपाई करने और रुठे लोधी मतदाताओं को फिर से अपने खेमे की कोशिश की है, लेकिन उमा भारती के पास समय इतना कम है कि शायद ही यह मिशन पूरा हो सके। ब्राह्मणों और अन्य सवर्ण जातियों के एक बडे हिस्से का रुझान अभी भी बसपा की तरफ होने से भी भाजपा के लिए मुश्किलें पैदा हो रही हैं।

रही बात कांग्रेस की, तो राहुल गांधी ने पांच साल गलियों की खाक छान-छानकर जो थोडी-बहुत हवा बनाई थी, अन्ना के आंदोलन ने उस पर पानी फेर दिया है। अभी के हालात में तो कांग्रेस को यथास्थिति बनाए रखने के लिए भी संघर्ष करना पड सकता है। कुल मिलाकर सूबे की राजनीति में सक्रिय इन चारों प्रमुख दलों में से किसी के बहुमत हासिल करना तो दूर, 150 सीटों तक पहुचने का भी संभावना नजर नहीं आ रही है। जहां तक चुनाव के बाद के गठबंधन का सवाल है,तो कांग्रेस और सपा को मिलकर भी बहुमत लायक सीटें मिल पायेंगी,यह कह पाना मुश्किल है।

भाजपा के लिएमुलायम सिंह का समर्थन कर पाना मुश्किल होगा और बसपा को समर्थन देने से फिर जगहंसाई का डर रहेगा। मायावती का जो स्वभाव है, तो वह किसी को समर्थन देने के बजाय फिर से चुनाव कराना पसंद करेंगी। ऐसी स्थिति में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बिहार की तर्ज पर सरकार बनाने के लिए यूपी में भी दो बार चुनाव करवाने पडेंगे।

ओमकार मणि त्रिपाठी “बुलंद इंडिया” पत्रिका के मुख्य संपादक हैं. 

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

4 Comments

  1. kulwant mittal says:

    और 18 – 12 – 2011 को बहिन मायावती द्वारा लखनऊ के रमाबाई आंबेडकर मैदान से विधान सभा चुनावों की घोषणा कर दी है.
    अब फरबरी २०१२ में उत्तर प्रदेश में विधायक का चुनाव होना तय है …………..
    लगता है अबकी बार फिर से सूबे में बी. एस.पी. की ही सरकार बनती दिख रही है….
    आगे आगे देखिये होता है क्या..

  2. kulwant mittal says:

    यू पी में एक बार ही चुनाव होंगे , और अभी तक के समीकरण के आधार पे तो बहुजन समाज पार्टी की ही चौथी बार फिर से सरकार बनती दिखाई दे रही है…….
    आगे आगे देखिये ….होता है क्या.

  3. vijay kumar says:

    kisi bhi political party ke paas BSP jaisa Committed Dalit Vote Bank nahi hai jisko vote ke liye kehne ki jarurat nahi hoti. Yeh vote bank kisi bhi candidate ko nahi balki BSP yani Mayawati Ji ko vote karta hai aur karta rahega. Jitna bhi Mayawati ko criticise kiya jata hai utna hi yeh vote bank majboot hota hai. Mayawati ka Politican graff kabhi neeche nahi aane wala hai woh akeli aise leader hai jiske parivaar ka koi bhi member politics mein nahi hai. Pehle clerk, patvaari, constable, inspectors aur chhote karamchaari suspend hote the lekin Mayawati Ji ne Commissioners, Collectors, IAS, IPS, Docrors, Engineers aur bade bade officers ko suspend kiya jisase doosre karmchariyon ko sabak mil jaye. Mein keval yeh kehna chahta hoon ki Goverment keval Mayawati Ji ki hee banegi…seats kitni bhi ayein.

  4. RAJDEEP says:

    if in this election Pease party participate in full streanth Then I am sure Babaji make miracle in eleaction…..Just wait & watch….

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