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आजतक पर होगी ‘रसिया राज’ की वापसी? देबांग के वापस लौटने की संभावना

By   /  October 6, 2011  /  3 Comments

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टीवी टुडे के अध्यक्ष अरुण पुरी के खबरों से दोबारा जुड़ने के सख्त निर्देश के बाद आजतक के न्यूज़ डायरेक्टर क़मर वहीद नक़वी पुराने लोगों को चैनल में वापस लाने की कवायद में जुट तो गए हैं, लेकिन लगता है अपनी इस कोशिश में वे उन आरोपों को नजरंदाज़ कर रहे हैं जिनकी वजह से उन मीडियाकर्मियों की विदाई हुई थी। अभी हाल ही में आउटपुट हेड के पद पर सुप्रिय प्रसाद की वापसी हुई है और अब देबांग के वापस लाए जाने की चर्चा जोरों पर है। गौरतलब है कि दोनों ही कभी आजतक का हिस्सा रह चुके हैं और देबांग पर उनकी रंगीन तबीयत के चलते कई संस्थानों से निकाले जाने के आरोप लग चुके हैं।

बताया जाता है कि स्टार न्यूज़ के मालिक अवीक सरकार ने देबांग को मैदान में उतारने की कई बार कोशिशें कीं, लेकिन वहां पहले से बढ़िया प्रदर्शन कर रहे दीपक चौरसिया की टीम ने साफ संकेत दे दिए कि एक म्यान में दो तलवारों को नहीं रखा जा सकता। उधर आजतक की लगातार गिरती टीआरपी ने चैनल प्रबंधन को अपनी टीम के पुर्गठन पर मजबूर कर दिया है।

देबांग ने आजतक को शुरुआती दौर में तब ही छोड़ दिया था जब वह दूरदर्शन पर एक बुलेटिन की शक्ल में प्रसारित होता था। उन्होंने ऑस्ट्रेलिया की मशहूर कैरी पैकर की कंपनी चैनल 9 के साथ मिल कर डीडी-2(मेट्रो) पर लंबा टाइम स्लॉट लिया था, लेकिन यह योजना कुछ ही महीनों में फ्लॉप हो गई। फिर वे स्टार न्यूज़ के मर्डोक वर्ज़न से जुड़े और इसके बाद सीएनबीसी आवाज से। कई भाषाओं के जानकार कहे जाने वाले देबांग हालांकि प्रिंट में अंग्रेजी अखबारों – इंडियन एक्सप्रेस, इलस्ट्रेटेड वीकली आदि से जुड़े रहे हैं, लेकिन उनहें इलैक्ट्रॉनिक मीडिया में हिंदी से ही जोड़ा गया। वे एनडीटीवी इंडिया (हिन्दी) के चैनल हेड भी बने, लेकिन करीब डेढ़ साल बाद उनके अधिकार छीन लिए गए।

एनडीटीवी के उनके पूर्व सहयोगियों का कहना है कि देबांग पर यह कार्रवाई उनके खिलाफ़ लड़कियों की बेहिसाब शिकायतों और एसएमएस के तौर पर पेश किए गए सुबूतों के कारण हुई थी। बताया जाता है कि चैनल हेड पद से हटाए जाने के बावजूद वे कई महीने वहां इसीलिए टिके रहे कि कंपनी की नीतियों के तहत मिलने वाले शेयरों का लाभ ले सकें। पिछले साल जून से देबांग अवीक सरकार के स्वामित्व वाले स्टार न्यूज़ में बतौर कंसल्टेंट जुड़े हुए हैं।

अगर स्टार पत्रकारों के लिहाज़ से देखा जाए तो चोटी के खबरिया चैनलों में से आजतक की हालत सबसे खस्ता है। फिलहाल वहां कोई भी एंकर या पत्रकार ऐसा नहीं है जिसे गंभीर या विश्वसनीय स्टार माना जाता हो। चैनल में फिलहाल देबांग के समय के लोगों में से इक्के-दुक्के लोग ही हैं लेकिन सीईओ जी. कृष्णन की विदाई के बाद उनके चहेते शैलेश और एक-दो और लोगों के बारे में भी कयासों का दौर जारी है। हाल ही में वापस लाए गए सुप्रिय प्रसाद को बतौर एक्जिक्युटिव एडीटर – आउटपुट जोड़ा गया है। बटाया जाता है कि सु्प्रिय को भी पिछली बार उनके खिलाफ़ किसी महिला स्टाफ द्वारा लगआे गए गंभीर आरोपों के कारण ही विदा किया गया था।

देखना है कि अगर देबांग की वापसी होती है तो सुप्रिय से कितनी निभ पाएगी?

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

3 Comments

  1. Shivnath Jha says:

    शुभ संकेत. अरुण पूरी जी का भी और संभवतः अकबर साहेब का. इस पुरे क्रिया-कलाप में अकबर साहेब की भूमिका को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है. आज तक एक प्रतिष्ठित तक चैनल है, इसमें कोई संदेह नहीं. यह अलग बात है नब्बे के दशक के पूर्वार्ध से, विशेषकर जब एस.पी. सिंह साहेब थे, आजतक तो सातवें आसमान पर चला गया था, लेकिन अन्य टीवी चैनलों/पत्रकारों/सम्बद्दताओं के प्रवेश से न केवल आज तक बल्कि अन्य सभी टीवी चैनलों में बदलाब/उठापटक आया. टीवी के “तथाकथित पत्रकार महिलाओं” के “भीषण” प्रवेश ने पुरे माहौल को एक न केवल विषाक्त किया बल्कि दिशाहीन भी बना दिया.

    पिछले बीस वर्षों का टीवी इतिहास पर अगर गौर फ़रमाया जय तो शायद चैनलों में काम करने वाले “पुरुष” वर्ग उतना आगे नहीं बढ़ सके जितना “महिलाएं”. और यह बात सिर्फ टीवी में ही नहीं वरन समाचार पत्र पत्रिकों में भी अपना दबदबा रखा. एक दृष्टान्त: नब्बे के उत्तरार्ध में बहादुर शाह ज़फर से प्रकाशी एक अंग्रेजी समाचार पत्र में “एक महिला पत्रकार की खबरे अक्सर प्रथम पृष्ट पर इसलिए छाप जाते थे – माह में २० – क्योकि वे संपादक के “बहुत करीब” मानी जाती थी. उस पत्र के ब्यूरो चीफ भी ‘स्तब्ध’ रहते थे.

    दिवांग साहेब बहुत ही पुराने पत्रकार है, नब्ज पर पकड़ है. आज के पत्रकार, खासकर जो अपने आयु के तिस वशंत को भी देखे/देखी होंगे, इस पत्रिका को शायद ही जानते होंगे. सुप्रिया साहेब भी बहुत अच्छे हैं.

    लेकिन जो सबसे बड़ी बात है वह यह की “अगर कोई अच्छा स्वादिष्ट खाना, सजे थाल में, विन्यास के साथ किसी के सामने परोस कर दे और बोले आपके लिए है, बहुत मेहनत से बनायीं हूँ, आप स्वाद लें, कोई हर्ज नहीं है की आप खाना खाकर आयें हैं या घर जाकर खाना खायेंगे, तो ऐसे व्यक्ति को आप क्या कहेंगे?” दिल आखिर दिल है…

  2. a.k. singh says:

    आजतक की गिरती टीआरपी की बात है तो अलग बात है ,…..लेकिन देवांग सुप्रियों, दीपक ,प्रसून जी, प्रबल जी इत्यादि कई बड़े लोगों के निकलने के बाद टीआरपी पर असर नहीं । हां लेकिन जो बाहर गए जिस चैनल में गए वहां की टीआरपी बढ़ गई। तो बात साफ है पुराने लोगों को जोड़ने की नहीं कंटेट को चेंज करने की जरूरत है । पुराने की जगह नए को मौका देने की जरूरत है लेकिन ठोक बजाकर मौका दे।

  3. Naresh Gupta says:

    आज तक न्यूज़ चैनल के प्रबन्ह्कों ने अगर चैनल की लोक्प्रिअता के गिर रहे ग्राफ को ऊपर उठाने के लिए अपने पुराने साथिओं को फिर से अपने साथ जोड़ने का निर्णय लिया है ,तो व्यपरिरिक तोर लिया गया

    निर्णय ठीक लगता है. अगर देबांग से किस्सी को कोई परेशानी रही है तो वेह मैनेजमेंट से सीधी बात कर सकते हैं.रही चंनेल्स पर अश्लीलता परोसने की बात तो अपनी trp बदने के लिए यह चैनल वाले कुछ भी कर सकते हैं आज जो सेक्स ka शररे आम खेल टीवी चंनेल्स पर देखने को मिल रहा है उसने बचों की सोच बदल दी है .वेह इसके इलावा कोई बात ही नहीं करते .उनकी बात चीत का फुन्दा येही टोपिक होता .जो सोचेंगे वोही करें गे .larkian तो खुद आमंत्रित करती हैं . इस मैं देबांग जैसे लोगों का क्या कसूर .फ्हिर भी मैं येही कहना चाहता हूँ के अगर कहीं धुआं उठा है तो आग ज़रूर लगी होगी.यह जिन लोगिन का मामला है उन्हें ही निबटने दीजिए /इससे कोई इस्सुए मत बनाएँ/सभी चैनल वाले एक ही थेलीके चिट्टे बट्टे है /

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