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प्रेम न जाति देखता है न धर्म.. इसका संबंध शरीर से नहीं, दिल से होता है – मटुक नाथ

By   /  October 6, 2011  /  8 Comments

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‘प्रेम के प्रकार’ शीर्षक लेख में मैंने प्रेम के दो मुख्य भेद बताये हैं- प्राकृतिक और सामाजिक। जाति और धर्म प्राकृतिक चीज नहीं है, सामाजिक है। इसलिए केवल सामाजिक प्रेम जाति और धर्म को मानेगा जबकि प्राकृतिक प्रेम स्वभाववश इनकी बंदिशों का उल्लंघन करेगा। प्राकृतिक प्रेम की अपनी जाति होती है जो जन्म के आधार पर नहीं स्वभाव के मेल के आधार पर तय होती है। जन्म के आधार पर जो जाति समाज में प्रचलित है, वह भ्रामक है, वास्तविक जाति नहीं। उसका उपयोग समाज के धूर्त लोग अपने स्वार्थ के लिए और राजनेता वोट के लिए करते हैं। जाति शोषण का एक महत्वपूर्ण औजार है, इसलिए शोषक वर्ग इसे हर हालत में बचाकर रखना चाहता है। प्राकृतिक प्रेम ही इसको नेस्त नाबूद कर सकता है।

धर्म क्या है ? जो हिन्दू घर में पैदा हो गया, वह हिन्दू और जो मुस्लिम घर में जन्मा, वह मुस्लिम ! समाज में यही धर्म का अर्थ है न ? धर्म इतना सस्ता नहीं है भाई कि वह जन्म लेते ही मिल जाय। इतना सस्ता होता तो पूरी धरती धार्मिक हो गयी रहती ! धर्म फोकट में मिलने वाली चीज नहीं है। इसे अर्जित करना पड़ता है। धर्म का चुनाव होता है। जो साधना पद्धति या जीवन शैली जिसके स्वभाव के अनुकूल होगी, वही उसका धर्म होगा। धर्म का अर्थ है स्वभाव में जीना। धर्म का जन्म से कोई संबंध नहीं है। एक हिन्दू नवजातक को मुसलमान के यहाँ रख दीजिए और मुसलमान बच्चे को हिन्दू के यहाँ, हिन्दू मुसलमान हो जायेगा और मुसलमान हिन्दू। जन्म से धर्म का नाता होता तो हिन्दू हिन्दू रहता और मुसलमान मुसलमान; चाहे उसे जिस घर में पालिये।

सामाजिक प्रेम विवाह के अधीन है और विवाह धर्म और जाति के अधीन। गुलामी की अनेक परतों के बीच पलने के कारण सामाजिक प्रेम मनुष्य के आत्मिक विकास में सहायक नहीं होता। उसमें साथी के प्रति अधिकार का भाव प्रधान होता है, समर्पण का नहीं। यहाँ समर्पण का सही अर्थ समझ लेना जरूरी है। साधारण बोलचाल में हम जिसे समर्पण कहते हैं वह वास्तव में पति अथवा पत्नी से समर्पण करवाने की युक्ति मात्र है। वास्तविक समर्पण एक दुर्लभ घटना है। हृदय की मुक्त अवस्था में ऐसी दिव्य घटना घटती है। सामाजिक प्रेम का मतलब होता है- बच्चा पैदा करना, पढ़ाना-लिखाना और परिवार को चलाना। इसके लिए दूसरे का गला काटना पड़े तो काट लेना। अपने बच्चे और परिवार की रक्षा के लिए दूसरों के बच्चों और परिवार का नुकसान भी करना पड़े तो आराम से करना।

प्राकृतिक प्रेम वसुधा को ही कुटुम्ब मानता है- वसुधैव कुटुम्बकम्। प्राकृतिक प्रेम एक ऐसा बीज है, जिसकी ठीक से देख रेख और लालन पालन हो तो वह ऐसा विशाल वृक्ष बनेगा जिसकी फुनगियाँ आकाश से बातें करेंगी, जिसके फूलों की खुशबू हवा में चारों तरफ फैलेगी। जैसे हवा न हिन्दू होती है, न मुसलमान; वैसे ही प्राकृतिक प्रेम किसी धर्म या जाति का नहीं होता। लेकिन सामाजिक प्रेम इन बंधनों में जकड़े होने के कारण प्रेम कहलाने के लायक भी नहीं रह जाता। प्राकृतिक प्रेम का अपना एक समाज हो सकता है। वह समाज एक ऐसे विशाल परिवार की तरह होगा जिसमें सभी प्रेम से आनंदपूर्वक रहेंगे लेकिन कोई किसी पर अपना अधिकार नहीं जमायेगा। इस कल्पना को साकार किया था ओशो ने अमेरिका के ‘रजनीशपुरम’ में। इस पर दूसरा प्रयोग ओशो की प्रतिभासम्पन्न, ओजस्वी और सृजनशील शिष्या माँ आनन्द शीला भारत में ‘प्रेमपुरम्’ की स्थापना के द्वारा करना चाहती हंै। अगर यह प्रयोग शुरू होता है तो इसमें हमारा भी जीवन लगेगा। इस प्रयोग के द्वारा समाज के सामने नजीर प्रस्तुत की जा सकती है कि देखो यह भी एक परिवार है जो प्रेमपूर्ण है; जहाँ न ईष्र्या है, न द्वेष, न कलह, न झगड़ा, न झंझट। केवल प्रेम है, सहयोग है, मैत्री है, आनंद है, अहोभाव है ! रही उम्र की बात। एक खास अवस्था में मानव शरीर में सेक्स का उदय होता है, धीरे धीरे बढ़ता है, चरम सीमा तक जाता है, फिर ढलान शुरू होती है, सेक्स की शक्ति घटने लगती है। घटते घटते सेक्स क्षमता जीरो पर आ जाती है। चूँकि सामाजिक प्रेम के केन्द्र में सेक्स होता है और ढलती उम्र में सेक्स क्षमता क्षीण हो जाती है;

इसलिए इस प्रेम को जीनेवाले लोग अधिक उम्र में प्रेम की घटना देख अचंभे में पड़ जाते हैं ! वे सोचते हैं यह कैसे हो सकता है ? अगर ऐसा हो गया है तो टिकने वाला नहीं है, क्योंकि वृद्ध आखिर सेक्स की यात्रा कब तब कर पायेगा ? जब कुछ समझ में नहीं आता तब आदमी लाचार होकर यह सोचने लगता है कि किसी अन्य लोभ-लाभ में ऐसा प्रेम चल रहा होगा। वे ऐसा इसलिए भी सोच पाते हैं कि विवाह का आधार भी तो लोभ-लाभ ही है ! दहेज जैसी घृणित चीज सामाजिक प्रेम में बड़प्पन का मानदंड है !

सामाजिक प्रेम जीने वालों की बड़ी विडंबना यह है कि वे जीते तो हैं सेक्स में, किन्तु उसी से घृणा भी करते हैं और उसकी भत्र्सना भी करते हैं ! भाषण और लेखन में हमेशा वासनाहीन प्यार की वकालत करते हैं ! इसके ठीक उलट प्राकृतिक प्रेम वाले वासना की महिमा को स्वीकार करते हैं। उसका सारा रस निचोड़ते हैं और छककर पान करते हैं। उसकी कभी निंदा नहीं करते। वासना की गहराई में डूबने से उसकी सीमा भी उनके सामने प्रकट होने लगती है। इसलिए उच्चतर आनंद की तलाश में वे अपनी वासना को ब्रह्मचर्य में रूपांतरित करने की चेष्टा करते हैं और उनमें से कुछ सफल भी होते हैं। वासना को दबाकर जो ब्रह्मचर्य उपलब्ध किया जाता है, वह अनेक मानसिक रोगों को जन्म दे देता है। अहंकार, क्रोध, जलन आदि उसकी बीमारियाँ हैं।

सेक्स का संबंध शरीर से है, लेकिन प्रेम का संबंध शरीर से ज्यादा मन से है, भाव से है। इसलिए भावपूर्ण प्रेम उम्र का अतिक्रमण कर जाता है। वह उम्र को नहीं मानता। जो प्रेम उम्र को न माने समझिये भाव का है। प्रेम की यात्रा भाव से भी आगे बढ़ती है। कहते हैं, यह आत्मा तक पहुँचती है और जन्म जन्मांतर तक चल सकती है। वहाँ तक यात्रा करना बहुत रोमांचक हो सकता है। जो लोग सेक्स को ही प्रेम समझते हैं, उनका कहना ठीक है कि बुढ़ापे में प्रेम दुखदायी हो जाता है। इसलिए सामाजिक प्रेम करने वालों को उम्र का बंधन स्वीकार लेना चाहिए। लेकिन जो प्रेम को इससे अलग भी कुछ समझते हैं, उनके लिए प्रेम सदा सुखदायी है। इसलिए प्राकृतिक प्रेम में उम्र का कोई बंधन नहीं होता। वहाँ हर उम्र प्यार की उम्र होती है। हर मौसम प्यार का मौसम होता है।

सामाजिक प्रेम की सबसे बड़ी चिंता किसी भी तरह समाज चलाने की होती है। इसमें प्राकृतिक प्रेम उसे सबसे बड़ा खतरा नजर आता है ! इसलिए प्राकृतिक प्रेम का विरोध किया जाता है और उसे हर तरह से कुचलने की चेष्टा की जाती है। आप पूछते हैं राजीव मणिजी कि प्राकृतिक प्रेम घर-समाज के बीच कैसे तालमेल बैठायेगा ? मैं कहना चाहता हूँ कि समाज के साथ तालमेल बैठाने की जरूरत क्या है ? फायदा क्या होगा ? यह समाज तो भ्रष्ट है, इसके साथ ऐसे प्रेम का तालमेल कैसे बैठेगा ? क्या जीवन किसी तरह तालमेल बैठाकर घिसट घिसट कर जीने के लिए है ? जीवन तो रूपांतरण के लिए है। जो प्रेम रूपांतरण में सहायक हो, सिर्फ वही वरेण्य है। इस तरह के प्रेम के सहारे अपना जीवन रूपांतरित करते हुए समाज का निर्माण करना है। नया समाज ज्यों-ज्यों बनने लगेगा, त्यों-त्यों वर्तमान समाज अपने आप विदा होने लगेगा। इसे ध्वस्त करने की सलाह नहीं दे रहा हूँ , क्योंकि नया जब आता है तो पुराना अपने आप विदा होने लगता है। उसे अलग से विदा करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसलिए नये समाज के निर्माण के लिए चिंतन और प्रयास करने की बात कह रहा हूँ । एक ऐसा समाज जो व्यक्तियों के प्रेम को फैलने के लिए पूरा आकाश उपलब्ध कराये। जिस समाज में अधिकांश व्यक्ति प्रेमपूर्ण होंगे, वही स्वस्थ, सुंदर और शिष्ट समाज हो सकता है।

(मटुक नाथ पटना विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं और अपनी शिष्या जूली से विवाहेत्तर संबंध रखने फिर उन्हीं के साथ रहने के कारण खासे चर्चित रहे हैं। कुछ लोग उन्हें स्वच्छंद प्रेम का मसीहा भी कहते हैं। यह लेख उन्होंने अपने फेसबुक पर लिखा है। वहीं से साभार लेकर प्रकाशित।)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

8 Comments

  1. बहुत सही कहा है आपने प्राकृतिक प्रेम ही मनुष्य को बुढ़ापे में सहारा प्रदान करेगी नहीं तो रोज आप खबरे पढ़ते है की किस प्रकार ब्रिध दम्पति को घर में जलील किया जाता है मटुकनाथ जी आपको इतना अच्छा लेख लिखने के लिए साधुबाद
    संजीव चौरसिया मुंबई

  2. atul kumar gautam says:

    very good sir , aapne bahut khub likha hai

  3. RAM SHABD YADAV says:

    BAHUT अच्छा ,प्रेम कुदरत का दिया बरदान है और धर्म जाती मनुष्य की बने हुई है, मई आप के विचार का स्वागत करता हु

  4. Bimal Raturi says:

    मोना जी आप ठीक कह रही है हैं पर “चोर के मुख से सच्चाई पर भासन अच्छा नहीं लगता …. ” आप बिलकुल ठीक कह रही है मटुकनाथ अपनी वासना को प्यार का नाम दे रहा है…. मुझे नहीं नहीं लगता इसे प्यार का मतलब भी पता है…..

  5. पहले एक लड़की से शादी करो उस से बच्चे पैदा करो 25 साल बाद एक और २० साल की जवान लड़की को भगा के ले जाओ रंगरेलिया मनाओ फिर मीडिया के सामने पुरानी पत्नी से (प्रेमिका सहित) जूते खाओ तब जा कर आदमी लव गुरु बनता है समाज से मिली गालिया एवं घृणा से उस के ज्ञान के चक्षु खुल जाते है और साथ मैं खुल जाती है शब्दकोष की पुस्तक जिस से ये बड़े बड़े शब्द छन छन के बहार आते है प्रेम ,जात ,धर्म ,प्रक्रति ? चचा मटुक तुम्हारे जैसो को बॉलीवुड वालों ने भी 25 साल पहले ही पढ़ लिया था ! जूली जूली तेरे लिए चढ़ जाऊं सूली ,तू ही तो मेरी जान है …..

  6. इसलिए सामाजिक प्रेम करने वालों को उम्र का बंधन स्वीकार लेना चाहिए। लेकिन जो प्रेम को इससे अलग भी कुछ समझते हैं, उनके लिए प्रेम सदा सुखदायी है। इसलिए प्राकृतिक प्रेम में उम्र का कोई बंधन नहीं होता। वहाँ हर उम्र प्यार की उम्र होती है। हर मौसम प्यार का मौसम होता है।
    जिस समाज में अधिकांश व्यक्ति प्रेमपूर्ण होंगे, वही स्वस्थ, सुंदर और शिष्ट समाज हो सकता है।

  7. mona says:

    बिमल जी आप नाहक में मटुकनाथ पर शंका कर रहे हैं, दरअसल में उसने धर्म के मर्म पर जो लिखा गया है उसे पढ़ा है इसलिए वो सही कह रहा है, रहा सवाल प्रेम का तो बेशक वो प्रेम के मर्म को तिल भर ना समझ सका है, तभी तो वह विवादित है, वरना प्रेम करने वाले तो मानव से महामानव हो जाते हैं. छिछोरे नहीं कहलाते. ये बहुत चालाक है अपनी वासना को प्रेम शब्द से आवृत करना चाहता है ताकि वह पूजित हो. परन्तु नील पात्र में गिरे सियार के स्वयं को विष्णु मानने का क्या प्रतिफल मिला था वही इसके साथ हुआ. आप अपनी ऊर्जा इस पर व्यर्थ न गंवाइये.

  8. Bimal Raturi says:

    आप के किसी भी लेख का वास्तविक जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं होता है, कुछ बाते जो मुझे ज्यादा पूछने लायक लगी वो ये की …
    आप का धर्म क्या है अपनी बीवी को छोड़ कर बेटी की उम्र की लड़की के साथ रहने पर ??
    आप प्यार की ब्बतें कैसे कर सकते हैं जो अपनी बीवी को नहीं समझ सका वो और चीज क्या ख़ाक समझेगा???
    और आप का जुली से प्यार वाकई मन्न से है या केवल शाररिक???

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