/और इस तरह जग को जीत कर ‘जगजीत’ बन गया पंजाब का भोला-भाला जीत…

और इस तरह जग को जीत कर ‘जगजीत’ बन गया पंजाब का भोला-भाला जीत…

जगजीत सिंह जब गज़ल गायकी में उतरे थे उन दिनों यह विधा एक ऐसे दौर से गुजर रही थी जिसमें उसके चाहने वालों का एक खास वर्ग था। खुद को गज़ल प्रेमी कहने वाला यह वर्ग या तो शराब या फिर इश्क में डूब जाने को ही अपनी खासियत मानता था और उसका यह भी मानना था कि गज़ल में शास्त्रीय संगीत और उर्दू का होना नितांत आवश्यक है। ऐसे में जगजीत सिंह ने जो साहसिक कदम उठाया उससे उनकी ग़ज़लों ने न सिर्फ़ आम भारतीय यानि उर्दू के कम जानकारों के बीच भी शेरो – शायरी की समझ में इज़ाफ़ा किया बल्कि ग़ालिब , मीर , मजाज़ , जोश और फ़िराक़ जैसे शायरों से भी उनका परिचय कराया। आज उनके निधन से एक ऐसा शून्य बन गया है जिसका भरना आसान नहीं।

जगजीत सिंह का जन्म 8 फरवरी 1941 को राजस्थान के गंगानगर में हुआ था। उनका बचपन का नाम जीत था। उस समय कौन जानता था कि यही जीत बाद में अपनी शैली से जग को जीत लेगा। पिता सरदार अमर सिंह धमानी भारत सरकार के कर्मचारी थे। जगजीत सिंह का परिवार मूलतः पंजाब के रोपड़ ज़िले के दल्ला गांव का रहने वाला है। मां बच्चन कौर पंजाब के ही समरल्ला के उट्टालन गांव की रहने वाली थीं। शुरूआती शिक्षा गंगानगर के खालसा स्कूल में हुई और बाद पढ़ने के लिए जालंधर आ गए। डीएवी कॉलेज से स्नातक की डिग्री ली और इसके बाद कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय से इतिहास में पोस्ट ग्रैजुएशन भी किया।

बहुतों की तरह जगजीत जी का पहला प्यार भी परवान नहीं चढ़ सका। अपने उन दिनों की याद करते हुए वे कहते हैं, ”एक लड़की को चाहा था। जालंधर में पढ़ाई के दौरान साइकिल पर ही आना-जाना होता था। लड़की के घर के सामने साइकिल की चैन टूटने या हवा निकालने का बहाना कर बैठ जाते और उसे देखा करते थे। बाद में यही सिलसिला बाइक के साथ जारी रहा। पढ़ाई में दिलचस्पी नहीं थी। कुछ क्लास मे तो दो-दो साल गुज़ारे।”

जालंधर में ही डीएवी कॉलेज के दिनों गर्ल्स कॉलेज के आसपास बहुत फटकते थे। एक बार अपनी चचेरी बहन की शादी में जमी महिला मंडली की बैठक मे जाकर गीत गाने लगे थे। पूछे जाने पर कहते हैं कि सिंगर नहीं होते तो धोबी होते। पिता की इजाज़त के बग़ैर फ़िल्में देखना और टॉकीज में गेट कीपर को घूस देकर हॉल में घुसना उनकी आदत थी।

बचपन मे अपने पिता से संगीत विरासत में मिला। गंगानगर मे ही पंडित छगन लाल शर्मा के सानिध्य में दो साल तक शास्त्रीय संगीत सीखने की शुरूआत की। आगे जाकर सैनिया घराने के उस्ताद जमाल ख़ान साहब से ख्याल , ठुमरी और ध्रुपद की बारीकियां सीखीं। 1965 में मुंबई आ गए। यहां से संघर्ष का दौर शुरू हुआ। वह पेइंग गेस्ट के तौर पर रहा करते थे और विज्ञापनों के लिए जिंगल्स गाकर या शादी – समारोह वगैरह में गाकर रोज़ी रोटी का जुगाड़ करते रहे। 1967 में जगजीत जी की मुलाक़ात चित्रा जी से हुई। दो साल बाद दोनों 1969 में परिणय सूत्र में बंध गए।

जगजीत सिंह ने ग़ज़लों को जब फ़िल्मी गानों की तरह गाना शुरू किया तो आम आदमी ने ग़ज़ल में दिलचस्पी दिखानी शुरू की लेकिन ग़ज़ल के जानकारों की भौहें टेढ़ी हो गई। ख़ासकर ग़ज़ल की दुनिया में जो मयार बेग़म अख़्तर , कुन्दनलाल सहगल , तलत महमूद , मेंहदी हसन जैसों का था। उससे हटकर जगजीत सिंह की शैली शुद्धतावादियों को रास नहीं आई।

दरअसल , यह वह दौर था जब आम आदमी ने जगजीत सिंह , पंकज उधास सरीखे गायकों को सुनकर ही ग़ज़ल में दिल लगाना शुरू किया था। दूसरी तरफ़ परंपरागत गायकी के शौकीनों को शास्त्रीयता से हटकर नए गायकों के ये प्रयोग चुभ रहे थे। आरोप लगाया गया कि जगजीत सिंह ने ग़ज़ल की शुद्धता और मूड के साथ छेड़खानी की। लेकिन , जगजीत सिंह अपनी सफ़ाई में हमेशा कहते रहे हैं कि उन्होंने प्रस्तुति में थोड़े बदलाव ज़रूर किए हैं लेकिन लफ़्ज़ों से छेड़छाड़ बहुत कम किया है। बेशतर मौक़ों पर ग़ज़ल के कुछ भारी – भरकम शेरों को हटाकर इसे छह से सात मिनट तक समेट लिया और संगीत में डबल बास , गिटार , पिआनो का चलन शुरू किया। यह भी ध्यान देना चाहिए कि आधुनिक और पाश्चात्य वाद्ययंत्रों के इस्तेमाल में सारंगी , तबला जैसे परंपरागत साज पीछे नहीं छूटे।

1981 में रमन कुमार निर्देशित ‘ प्रेमगीत ’ और 1982 में महेश भट्ट निर्देशित ‘ अर्थ ’ को भला कौन भूल सकता है। 1994 में ख़ुदाई , 1989 में बिल्लू बादशाह , 1989 में क़ानून की आवाज़ , 1987 में राही , 1986 में ज्वाला , 1986 में लौंग दा लश्कारा , 1984 में रावण और 1982 में सितम के गीत चले और न ही फ़िल्में। ये सारी फ़िल्में उन दिनों औसत से कम दर्ज़े की फ़िल्में मानी गईं। ज़ाहिर है कि जगजीत सिंह ने बतौर कंपोज़र बहुत कोशिशें कीं लेकिन वे अच्छे फ़िल्मी गाने रचने में असफल ही रहे। इसके उलट पार्श्वगायक जगजीत जी सुनने वालों को सदा जमते रहे हैं।

बहुत कम लोगों को पता होगा कि अपने संघर्ष के दिनों में जगजीत सिंह इस कदर टूट चुके थे कि उन्होंने स्थापित प्लेबैक सिंगरों पर तीखी टिप्पणी तक कर दी थी। हालांकि बाद में उन्होंने अपनी भूल को स्वीकारा। इसके बाद उनकी दिलचस्पी राजनीति में भी बढ़ी और भारत – पाक करगिल लड़ाई के दौरान उन्होंने पाकिस्तान से आ रही गायकों की भीड़ पर एतराज किया। तब जगजीत सिंह का कहना था कि उनके आने पर बैन लगा देना चाहिए। दरअसल , जगजीत को पाकिस्तान ने वीज़ा देने से इंकार कर दिया था। लेकिन जब पाकिस्तान से बुलावा आया तब जगजीत सिंह की नाराज़गी दूर हो गई। ये इस शख़्स की भलमनसाहत थी कि जगजीत ने ग़ज़लों के शहंशाह मेहदी हसन के इलाज के लिए तीन लाख रुपए की मदद की। उन दिनों मेंहदी हसन साहब को पाकिस्तान की सरकार तक ने नज़रअंदाज़ कर रखा था।

(जगजीत सिं की निजी जानकारियां मुक्त ज्ञानकोश विकीपीडिया पर आधारित)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.