/क्या संन्यासी या योग गुरु से छिन जाते हैं मौलिक अधिकार?

क्या संन्यासी या योग गुरु से छिन जाते हैं मौलिक अधिकार?

मीडिया दरबार साप्ताहिक आलेख प्रतियोगिता के तहत प्रकाशित:-

वन्दना गुप्ता – इन्सान के जन्म के साथ ही उसे उसके मौलिक अधिकार स्वतः ही प्रदान हो जाते हैं और उन्हें कोई नहीं छीन सकता फिर चाहे वो बच्चा हो , बड़ा हो , अमीर  हो , गरीब हो या साधू सन्यासी हो या फकीर हो क्योंकि सबसे पहले हम सब इन्सान हैं और भारतीय हैं . भारत में जन्म लेने वाला प्रत्येक व्यक्ति को संविधान ने कुछ अधिकार दिए हैं जिन्हें  कोई कानून  या व्यक्ति या सरकार नहीं  छीन सकते  .


जहाँ तक प्रश्न सन्यासियों और योगगुरुओं की बात है तो इसके लिए भी हमें अपने धर्मग्रंथों का अवलोकन करना चाहिए उनमे हर प्रश्न का उत्तर है. श्रीमद भागवत में जब वेण के अत्याचारों से प्रजा त्रस्त हो गयी और चारों तरफ हाहाकार मचने लगा और पृथ्वी भी व्याकुल हो गयी उस वक्त हमारे ऋषि मुनियों ने ही सबसे पहले कदम उठाया और निर्णय लिया कि  इसे मार देना चाहिए और उसे मारकर उसके शव का मंथन किया तब जाकर राजा पृथु का जन्म हुआ जिसके नाम पर इस धरती को पृथ्वी कहा जाता है और जिसने सारे संसार में शांति और सद्भाव का वातावरण निर्मित किया ………..इसे देखते हुए तो कहा ही जा सकता है कि जब देश में अन्याय का बोलबाला होने लगे जनता त्राहि त्राहि करने लगे तो योग गुरु हों या सन्यासी उन्हें भी निर्णय लेने और आन्दोलन चलाने का अधिकार है और वैसे भी सबसे पहले वो उस देश के नागरिक होते हैं बाद में सन्यासी ……….इस दृष्टि से भी देखा जाये तो उन्हें सिर्फ धर्म कर्म में लगे रहने का ही नहीं बल्कि देश को सही दिशा देने का भी उतना ही अधिकार है जितना एक सामान्य नागरिक या प्रधानमंत्री को होता है.
सन्यासी या योग गुरु होने से कोई अपने लोकतान्त्रिक अधिकार नहीं खोता उन्होंने सिर्फ मोह माया से नाता तोडा है लेकिन जगत के उद्धार और कल्याण के लिए ही ये मार्ग अपनाया है तो सबसे ज्यादा उन्ही का फ़र्ज़ बनता है कि  जब देश की स्थिति ख़राब हो रही हो तो उसे सही दिशा दिखाएं तभी उनका सन्यासी या योग गुरु होना सार्थक होगा .  सन्यासी हो या योग गुरु या आम जनता सरकार किसी के अधिकारों का दोहन नहीं कर सकती.  और यदि सरकार ऐसा कोई कदम उठाती  है तो उसके खिलाफ जाने में भी कोई बुराई नहीं है फिर चाहे कोई भी हो ……..क्यूँकि ये अधिकार उन्हें  संविधान ने ही दिए हैं ……….और जब कोई भी कार्य शान्तिपूर्वक किया जा रहा हो और यदि वहाँ कोई अनुचित कार्यवाही सरकार की तरफ से की जाती है तो सरकार भी कटघरे में खडी होती है उसी प्रकार जैसे एक आम नागरिक ………….ये बात सरकार को भी समझनी होगी कि वो जनता के द्वारा ही निर्मित है , जनता के लिए है और यदि कोई भी सरकार अपनी मनमानी करती है तो जनता उसे उचित दंड भी देना जानती है फिर चाहे सन्यासी हो या आम जनता ………..अपने अधिकारों के प्रति सचेत और जागरूक होने लगी है अब जनता इसलिए सरकार को अपनी तानाशाही नीतियों को बदलना होगा और जनता की आवाज़ सुननी होगी वरना कब सरकार का तख्ता पलट जाये जान भी नहीं सकेगी ……..क्योंकि जनता जब आन्दोलन की राह पर उतरती है तब सिर पर कफ़न बांध कर उतरती है फिर चाहे कितनी ही कुर्बानियां क्यूँ ना देनी पड़ें इसका सबसे अच्छा उदाहरण तो सारी जनता और देश के सामने है ही कि अंग्रेजों को कैसे हमारा देश छोड़कर जाना पड़ा चाहे उसमे वक्त लगा मगर जनता ने  अपना मुकाम हर हाल में पाया चाहे लड़कर या फिर सत्याग्रह से ………एक बार आन्दोलन की राह पर उतरी जनता को वापस मोड़ना आसान नहीं होता ये बात आज की सरकार को समझ लेनी चाहिए .
हर इन्सान सबसे पहले भारतीय नागरिक है फिर चाहे वो कोई भी हो और अपने मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए वो किसी भी हद तक जा सकता है .
भारत का संविधान सबको बराबर का अधिकार देता है जिसमे हर इन्सान अपने हक़ के लिए आवाज़ उठा सकता है फिर इसके लिए उसे कानून या सरकार से ही क्यूँ ना लड़ना पड़े और वो चाहे कोई भी क्यों ना हो ………….आज देश जनता का है और कल भी रहेगा ये बात सबको समझनी चाहिए .बिना जनता के सहयोग के कोई भी सरकार कहीं भी स्थिर नहीं रह सकती इसका ताज़ा उदाहरण मिस्र की क्रांति है यदि सरकार उससे भी सबक नहीं ले सकती तो यही कहा जायेगा कि अब सरकार के गिनती के दिन रह गए हैं .
मगर सबसे अहम् मुद्दा कि  सन्यासी या योग गुरु से उनके मौलिक अधिकार छिन  जाते हैं तो उसे कोई भी कानून या सरकार नहीं छीन सकती क्यूँकि वो कोई आतंकवादी नहीं हैं और ना उन्होंने कोई ऐसा जघन्य अपराध किया है कि उनसे उनकी स्वतंत्रता या अधिकार छीन लिए जायें.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.