/न पैसे का हिसाब, न कांग्रेस का विरोध, न साथियों की बकबक पर झकझक: बस मौनव्रत

न पैसे का हिसाब, न कांग्रेस का विरोध, न साथियों की बकबक पर झकझक: बस मौनव्रत

करीब हफ्ते भर से अपने सहयोगियों पर हो रहे हमलों के बीच गांधीवादी समाजसेवी अन्ना हजारे ने शनिवार को मौनव्रत पर जाने का ऐलान कर दिया। अन्ना की इस अचानक  की गई घोषणा ने सबको सकते में डाल दिया। अन्ना ने कहा था कि सरकार मौन की भाषा ही समझती है, इसलिए वह खामोशी धारण करने जा रहे हैं। लेकिन, समझा जा रहा है कि इस मौनव्रत का उनके भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं है।

अन्ना हजारे: कई बामारियों का ईलाज़ है मौन व्रत

अन्ना के अनुसार वे अनिश्चितकालीन मौनव्रत पर जा रहे हैं। इस दौरान वह रालेगण सिद्धि के पद्मावती देवी मंदिर परिसर स्थित एक विशाल वटवृक्ष की लटकती जटाओं की बीच बनी विशेष कुटिया में बैठेंगे। मौनव्रत के दौरान वह अपने गांव से बाहर नहीं जाएंगे। अर्थात, पूर्व घोषित उनके सारे दौरे रद्द हो जाएंगे। हालांकि यह पहली बार नहीं है जब अन्‍ना हजारे ने मौन व्रत रखा हो लेकिन कई चुनावी राज्यों के दौरों की घोषणा के बाद अब मौन व्रत का फैसले का मतलब बता पाना मुश्किल है। अधिकतर आलोचकों का मानना है कि कांग्रेस ने अन्ना को किसी तरह विरोधी प्रचार न करने के लिए ‘मना’ लिया है।

अपने तेरह दिनों के विशाल अनशन से सरकार को झुका देने का दावा करने वाले अन्ना के मौन से सरकार के साथ- साथ उनकी टीम के लोगों में भी खलबली मच गई है। चारों तरफ चर्चाओं का बाजार गर्म है कि आखिर ये मौन किसलिए साधा गया है। अन्ना को करीब से जानने वालों का कहना है कि सहयोगियों के बड़बोलेपन से तंग आकर उन्हें यह कदम उठाना पड़ा है। गौरतलब है कि पिछले कई दिनों से अन्ना के कई सहयोगी गलत वजहों से चर्चा में रहे।

हालांकि अन्ना ने मौन रखने को स्वास्थ्य लाभ से जोड़ा है, लेकिन तथ्यों पर ध्यान दें तो इसके पीछे और भी कई कारण नजर आते हैं। आपको बताते चलें कि कुछ दिन पहले रालेगण सिद्धि में ही अन्ना के निकट सहयोगी सुरेश पठारे के दु‌र्व्यवहार के चलते बाहर से आए लोगों के साथ उनकी मारपीट हुई। कश्मीर पर विवादास्पद बयान देने के कारण प्रशांत भूषण की दिल्ली में पिटाई कर दी गई। इसके बाद संतोष हेगड़ ने टीम के ही साथी अरविंद केजरीवाल पर ज्यादा बोलने को लेकर टिप्पणी की। इस सबसे अन्ना खिन्न नजर आ रहे हैं।

पिछले कई दिनों से सिविल सोसाइटी के लोगों पर हिसाब किताब देने का दबाव भी बढ़ रहा है। बताया जा रहा है कि चंदे के रूप में आधिकारिक तौर पर मिले चंदे का भी पूरा हसाब नहीं मिल पाया है और कर्ता-धर्ता इसे सार्वजनिक करने के लिए समय मांग रहे हैं। माना जा रहा है कि इस मौनव्रत से अन्ना अपने सहयोगियों को संदेश देंगे। साथ ही मीडिया द्वारा सहयोगियों के बारे में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर देने से भी बच सकेंगे।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.