/कभी दूध बेचती थीं ममता बनर्ज़ी…

कभी दूध बेचती थीं ममता बनर्ज़ी…

कहते हैं ठान लो तो कुछ भी मुश्किल नहीं। यह कहावत ममता बनर्जी पर सौ फीसदी सही बैठती है। ममता का जन्म निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में 5 जनवरी 1955 को हुआ था। ममता ने कानून और शिक्षा के अलावा कला में भी डिग्री हासिल की है। उन्होंने अपनी पढ़ाई बहुत मुश्किलों में पूरी की है।

परिवार चलाने के लिए दूध विक्रेता बनी

ममता ने वे दिन भी देखें हैं जब गरीबी के चलते दूध बेचने का काम करना पड़ा था। ममता के पिता स्वतंत्रता सेनानी थे और जब वह बहुत छोटी थीं तभी उनकी मृत्यु हो गई थी। बाद में उन्होंने अपने परिवार को चलाने के लिए दूध विक्रेता का कार्य करने का निर्णय लिया। उनके लिए अपने छोटे भाई-बहनों के पालन-पोषण में अपनी विधवा मां की मदद करने का यही अकेला तरीका था।

मुसीबत ने ममता को सख्त बना दिया

मुसीबत के उन दिनों ने ममता को इतना सख्त बना दिया और उन्होंने पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों को सत्ता से बेदखल करने के अपने सपने को पूरा करने में दशकों गुजार दिए। अब जाकर उनका यह सपना पूरा हो गया। ममता ने कांग्रेस से मतभेद के बाद करीब एक दशक पहले अलग पार्टी बना ली थी और कालांतर में वह माकपा की प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के रूप में सामने आई। इस बार के चुनावों में ममता ने वामदलों के गढ़ को ढहा दिया।

दृढ निश्‍चयी ममता

कहते हैं ममता शुरू से ही दृढ निश्चयी महिला रही हैं। जो सोचती हैं वह करके रहती हैं। उन्होंने अपने राजनैतिक कैरियर की शुरुआत कांग्रेस से की और जल्द ही 1976 में स्टेट महिला कॉलेज की जेनरल सेक्रेटरी बन गई।

सादा जीवन उच्च विचार

कहा जाता है कि शुरू से ही ममता का रहन सहन बहुत सादा रहा है। वह कपड़ों, कॉस्मेटिक्स और ज्वेलरी पर कभी पैसा खर्च नहीं करतीं। सूती कपड़े का कंधे से लटकता झोला और सूती साड़ी उनकी पहचान बन गई। कई बार उनके सादे जीवन पर प्रश्न भी उठा लेकिन जल्द  ही लोग उनकी सादगी के कायल हो गए। इसी दौरान उन्होंने शादी न करने का फैसला कर लिया। क्योंकि ममता का मिशन इतना मुश्किल था कि शायद परिवार को वक्त नहीं दे पातीं।

रेल और केंद्रीय मंत्री बनने के बावजूद ममता अपने कोलकाता के कालीघाट मंदिर के नजदीक स्थित एक मंजिला घर में रहती रहीं। वह हमेशा सादी सूती साड़ी, कंधे पर एक झोले और रबड़ की चप्पलों में नजर आईं। यहां तक कि वह अर्से तक अपने निजी सचिव की पुरानी फिएट कार की ही सवारी करती रहीं।

अब मुख्यमंत्री बनने के बाद इस फायर ब्रांड नेता के तवरों की असली परीक्षा होगी। देखना है वह अपने प्रदेश में बदलाव की बयार सचमुच बहा पाएंगी?

 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.