/बड़ी ही कुत्ती चीज है ये साली मीडिया भी… इससे तो बस सावधान रहने की जरूरत है

बड़ी ही कुत्ती चीज है ये साली मीडिया भी… इससे तो बस सावधान रहने की जरूरत है

 

छोटे बेटे की शादी है। हंगामे में नाचने-गाने और अपने छोटे भाई की पत्नी को आशीर्वाद देकर घर में उसका स्वागत करने के लिए उसके बड़े भाई के मौजूद रहने के भी पूरे आसार बन गए हैं। क्या हुआ जो बड़ा भाई सज़ायाफ्ता मुजरिम है? सज़ा भी किसी छोटे-मोटे अपराध की नहीं.. खून करने की। सब मैनेज़ हो जाएगा। ये साली मीडिया है बहुत कुत्ती चीज… सारा खेल बिगाड़ा भी इसी ने है, बस इससे सावधान रहना।

पहले भी कितना कुछ मैनेज किया था? बड़े-बड़े अफसर, वकील और गवाह… लैब टेकनीशियन से लेकर फोरेंसिक एक्सपर्ट तक.. ऐसा लगता था मानो सब के सब मुंह खोलने में सुरसा से ट्रेनिंग लेकर आए हुए थे। कोर्ट का फैसला तक फेवर में आ गया था, लेकिन इस मीडिया ने सारे किए-कराए पर पानी फेर दिया।

फिर तो मीडिया के खिलाड़ी भी बन गया। एक साथ टीवी चैनल, अखबार, मैगज़ीन… कितना कुछ लांच किया? करोड़ों रुपए पानी की तरह बहा डाला। ये मीडिया वालों के नखरे भी कितने? किसी को पैसा चाहिए तो किसी को गाड़ी। काम-धाम कुछ नहीं, कोरी लफ्फाज़ी के लिए भी लाख टके चाहिए। खैर, जरूरत पड़ने पर गधे को भी बाप कहना पड़ता है। इन करमहीनों को भी कहना पड़ा।

‘तथाकथित’ इसलिए जोड़ा कि जो भी आया, ये जानते हुए कि वह एक अपराधी की सिफारिश करने और नेताओं-अधिकारियों से अपनी पहचान के दम पर झूठ को सच बनाने की कीमत वसूलने आया। किसी को पत्रकारिता के मूल्यों की परवाह थोड़े ही थी? बहरहाल कितने ऐसे ही पत्रकार और मीडियकर्मी जमा भी हुए। चाहे मामला हाई कोर्ट में गया, या फिर सुप्रीम कोर्ट में हर बार इन्हीं चिरकुटों से प्रेशर डलवाया। यहां तक कि राष्ट्रपति भवन में भी इनकी एक न चली। सब के सब नालायक निकले।

पूरी तरह नाकारा कहना भी सही नहीं होगा। जब कोर्ट में बात नहीं बनी तो इन्हीं बकवास करने वालों ने किसी तरह चोरी-चुपके पैरोल करवाया था। फिर तो घूमना-फिरना, नाच-गाना… सब कुछ बदस्तूर जारी भी हो गया था। पुराना शौकीन जो ठहरा… बिना पब डिस्को में गए चैन ही नहीं पड़ता था। वो तो किस्मत का फेर था कि बेटे राजा की डिस्कोथेक़ में लड़ाई भी हुई तो पुलिस वाले के बेटे के साथ। तब भी ये विरोधी मीडिया वाले नहा-धो कर पीछे पड़ गए। बेचारे को अबतक दोबारा पैरोल नहीं मिला।

अब इस बार किसी तरह सब को मैनेज़ किया है। देखें क्या होता है? एक बार फिर सब से कहना चाहूंगा… ये साली मीडिया भी बड़ी कुत्ती चीज है। सावधान रहना।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.