/नामी अखबार भूले पत्रकारिता-नैतिकता, छापा जिस्मफरोशी की आरोपी अभिनेत्री का नाम

नामी अखबार भूले पत्रकारिता-नैतिकता, छापा जिस्मफरोशी की आरोपी अभिनेत्री का नाम

पुणे के एक फाइव स्टार होटल में पकड़ी गई एक टीवी एक्ट्रेस। पुणे पुलिस को सूचना मिली थी कि मायानगरी में टीवी और फिल्मों में काम करनेवाली कुछ लड़कियां वहां आकर जिस्मफरोशी का धंधा करती हैं। इसके बाद पुलिस ने जाल बिछाया और नकली ग्राहक के जरिए इस अभिनेत्री के एजेंट से संपर्क साधा।

पुलिस का कहना है कि एजेंट ने ग्राहक को बताया कि उसे एक घंटे के लिए डेढ़ लाख रुपए खर्च करने होंगे और इसके लिए फाइव स्टार होटल में रूम बुक करना होगा, लेकिन अभिनेत्री जैसे ही अपने एजेंट के साथ होटल पहुंची पुलिस ने दोनों को मौके पर ही गिरफ्तार कर लिया।”

 

पुलिस के आरोप पर छपी ऐसी दर्जनों रिपोर्ट आए दिन अखबारों में प्रकाशित होती रहती हैं, लेकिन उनमें से किसी में आरोपी महिला का नाम नहीं छापा जाता। इतना ही नहीं, उनका चेहरा भी नहीं दिखाया जाता। यह परंपरा ही नहीं, बल्कि कानून भी है, लेकिन अमर उजाला और नवभारत टाइम्स जैसे नामी अखबारों ने पुणे की एस खबर को छापने में जोश में होश खो दिया।

दोनों अखबारों ने न सिर्फ अभिनेत्री का नाम छाप दिया, बल्कि उसका इतिहास और घर का पता तक बता दिया। जिस्मफरोशी की आरोपी महिलाओं की तस्वीरें और नाम सार्वजनिक न करने के पीछे दो-तीन  तर्क दिए जाते हैं। अक्सर ये आरोप एकतरफा होते हैं और इनमें पुलिस के सिवा कोई गवाह नहीं मिलता। ऐसे में बिना आरोप साबित किए महिला पर कीचड़ उछालना अनैतिक माना जाता है।

 

 

कानूनी पहलू यह है कि अक्सर इन आरोपियों की शिनाख्त परेड करवाई जाती है। पहचान सार्वजनिक कर देने पर अभियोजन पक्ष यानि पुलिस को आरोप सिद्ध करने में परेशानी आती है। आरोपी यह कह सकती है कि उसकी पहचान सार्वजनिक करने से उसकी पहचान आसानी से हो गई।

पुलिस का आरोप है कि कई सीरियलों में काम कर चुकी एक्ट्रेस उस हाई प्रोफाइल सेक्स रैकेट का हिस्सा थी जिसे पुणे के एक नामी होटल में चलाया जा रहा था।

भारतीय संविधान में जिस्मफरोशी के धंधे में उतरी महिला को आरोपी के साथ-साथ भटकी हुई या इस्तेमाल की जा रही पीड़ित भी माना जाता है। ऐसे में उसका नाम, चाहे कितना भी चर्चित क्यों न हो, सार्वजनिक कर देना न सिर्फ अमानवीय, बल्कि अपराध माना जाता है। सवाल यह उठता है कि ऐसे में इन अखबारों पर क्या कोई कार्रवाई होगी?

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.