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नामी अखबार भूले पत्रकारिता-नैतिकता, छापा जिस्मफरोशी की आरोपी अभिनेत्री का नाम

By   /  November 22, 2011  /  5 Comments

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पुणे के एक फाइव स्टार होटल में पकड़ी गई एक टीवी एक्ट्रेस। पुणे पुलिस को सूचना मिली थी कि मायानगरी में टीवी और फिल्मों में काम करनेवाली कुछ लड़कियां वहां आकर जिस्मफरोशी का धंधा करती हैं। इसके बाद पुलिस ने जाल बिछाया और नकली ग्राहक के जरिए इस अभिनेत्री के एजेंट से संपर्क साधा।

पुलिस का कहना है कि एजेंट ने ग्राहक को बताया कि उसे एक घंटे के लिए डेढ़ लाख रुपए खर्च करने होंगे और इसके लिए फाइव स्टार होटल में रूम बुक करना होगा, लेकिन अभिनेत्री जैसे ही अपने एजेंट के साथ होटल पहुंची पुलिस ने दोनों को मौके पर ही गिरफ्तार कर लिया।”

 

पुलिस के आरोप पर छपी ऐसी दर्जनों रिपोर्ट आए दिन अखबारों में प्रकाशित होती रहती हैं, लेकिन उनमें से किसी में आरोपी महिला का नाम नहीं छापा जाता। इतना ही नहीं, उनका चेहरा भी नहीं दिखाया जाता। यह परंपरा ही नहीं, बल्कि कानून भी है, लेकिन अमर उजाला और नवभारत टाइम्स जैसे नामी अखबारों ने पुणे की एस खबर को छापने में जोश में होश खो दिया।

दोनों अखबारों ने न सिर्फ अभिनेत्री का नाम छाप दिया, बल्कि उसका इतिहास और घर का पता तक बता दिया। जिस्मफरोशी की आरोपी महिलाओं की तस्वीरें और नाम सार्वजनिक न करने के पीछे दो-तीन  तर्क दिए जाते हैं। अक्सर ये आरोप एकतरफा होते हैं और इनमें पुलिस के सिवा कोई गवाह नहीं मिलता। ऐसे में बिना आरोप साबित किए महिला पर कीचड़ उछालना अनैतिक माना जाता है।

 

 

कानूनी पहलू यह है कि अक्सर इन आरोपियों की शिनाख्त परेड करवाई जाती है। पहचान सार्वजनिक कर देने पर अभियोजन पक्ष यानि पुलिस को आरोप सिद्ध करने में परेशानी आती है। आरोपी यह कह सकती है कि उसकी पहचान सार्वजनिक करने से उसकी पहचान आसानी से हो गई।

पुलिस का आरोप है कि कई सीरियलों में काम कर चुकी एक्ट्रेस उस हाई प्रोफाइल सेक्स रैकेट का हिस्सा थी जिसे पुणे के एक नामी होटल में चलाया जा रहा था।

भारतीय संविधान में जिस्मफरोशी के धंधे में उतरी महिला को आरोपी के साथ-साथ भटकी हुई या इस्तेमाल की जा रही पीड़ित भी माना जाता है। ऐसे में उसका नाम, चाहे कितना भी चर्चित क्यों न हो, सार्वजनिक कर देना न सिर्फ अमानवीय, बल्कि अपराध माना जाता है। सवाल यह उठता है कि ऐसे में इन अखबारों पर क्या कोई कार्रवाई होगी?

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

5 Comments

  1. sanjay darbar says:

    टीवी एक्ट्रेस मजबूरी में यह काम नहीं करती है. पैसे कमाने की अंधी दौड़ में वो शामिल है इसलिए नाम छापना बहुत ज़रूरी है.

  2. prakhar says:

    उनोने कोई गलत काम नहीं किया है..ये अभिनेत्रिया ऐसे काम इसलिए करती है क्युकी इन्हें डर नहीं है वो जानती है की पकडे जाने पर भी उनका नाम छिपा लिया जायेगा.. अगर ऐसे ही सख्ती से समाचार channel पकडे जाने वाली अभिनेत्रियों के नाम देने लगेंगे तो ऐसा काम करने से वो डरेंगी.
    आज कल इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज की छात्राए भी ऐसे कामो में आ गई है.
    और कॉलेज की छात्र छात्राए घटिया किस्म की पार्टिओं में नशे और आपत्तिजनक हालत मे पकडे जाते है ज़रूरी है इनके भी नाम और तस्वीरे समाचार में दिखाए जांए. ज़रूरी हो गया है की पकडे जाने पे इनकी तस्वीर नाम काम ये सब छापा जाये और इन्हें लोगो में शर्मिंदा किया जाये.
    नहीं तो ये और बाकि लड़किया जो ऐसे काम करने का सोच रही है दरेंगी नहीं..
    इनमे डर पैदा करना ज़रूरी है.

    नाम छाप के कोई गलत काम नहीं किया. गलत काम आप लोग करते है जो नाम छिपाते है और जिस्मफरोशी को बढ़ावा देते है.
    shame on you mediadarbar..

  3. हमें पत्रकारिता से जुड़े २० वर्श्ज़ हो गए है. हमें हमारे पतरकारिता के गुरुओ ने पहली शिखस्य
    ही यह दी थी की कभी भी पितित लड़की या एसे परकर्नो में महिला का नाम नहीं प्रकाशित करे
    ८६ से आज तक हमने गुरेज किया है इस दोरान उड़ीसा उछ नायालय का भी फेंसला आया हुआ है लेकिन बड़े आखबार वाले क्या सोचते है यह तो वो ही जाने. मेरा मानना है की यह गलत है

  4. sanjaytiwari says:

    shame shame

  5. Rajesh Rathod says:

    नाम छापना गलत बात है. यह पत्रकारिता के आदर्श मापदंडो
    का भी उल्लंघन है. इससे बचाना चाहिए.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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