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ठीक नहीं है बड़े फैसले लेने में जल्दबाज़ी करना, कुछ सोच-विचार लें

By   /  November 30, 2011  /  No Comments

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– राजीव गुप्ता।।
यूपीए – 2  इस समय अपने कार्यकाल के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है।  सरकार जल्दबाजी और अपने गलत फैसलों के कारण संसद में रोज नए – नए मुद्दे लाकर समूचे विपक्ष समेत अपने सहयोगियों को भी अचंभित कर उन्हें विरोध करने के लिए मजबूर कर रही है। इस बार के शीतकालीन संसदीय सत्र  में महंगाई और तेलंगाना के मसले में अभी हंगामा थमा भी नहीं था कि 24 नवम्बर 2011 को खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश के सबंध में सरकार ने फैसला लेकर अपनी मुसीबत और बढ़ा ली जिसके चलते सोमवार को भी एक बार फिर से दोनों सदन दिन भर के लिए स्थगित हो गए। गौरतलब है कि है कि मल्टी ब्रांड में सरकार ने 51  प्रतिशत और सिंगल ब्रांड में सरकार ने 100 प्रतिशत का विदेशी पूंजी निवेश स्वीकार कर लिया है,  जिसका भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर पड़ना तय है।  महंगाई,  भ्रष्टाचार,  और कालेधन पर चौतरफा घिरी सरकार ने अपनी नाकामियों को छुपाने एवं अपनी इमेज सुधारने के लिए जो तुरुप का एक्का चला वही उसके गले की फांस बन गया।
जहां महंगाई की मार से आम जनता त्राहि – त्राहि कर रही है, ऐसे में महंगाई से निपटने के लिए सरकार सिर्फ जनता को आश्वासन देती है परन्तु आम आदमी जो छोटे – मोटे व्यापार से अभी टक अपना परिवार पाल रहा था उसको बेरोजगार करने का सरकार ने अपने इस कृत्य से पुख्ता इंतजाम कर लिया है। संसदीय समिति की सिफारिशों को दरकिनार करते हुए सरकार द्वारा विदेशी कंपनियों को खुदरा क्षेत्र में अनुमति देने का निर्णय ” कैबिनेट”  में क्यों लिया गया,  जबकि  शीतकालीन सत्र अभी चल रहा है। ज्ञातव्य है कि 6 जुलाई 2010 को भारत सरकार ने एक चर्चा पत्र जारी कर अपनी मंशा जाहिर की थी जिसमे सरकार  ने संसदीय समिति के विरोध को भी स्वीकार किया था। मामला अब संसद से सड़क तक जा पंहुचा हैं,  जो कि होना लाजिमी भी था क्योंकि खुदरे व्यापार से सीधे आम जनता का सरोकार  है। सरकार का तर्क है कि उसके इस कदम से करोडो लोगों को रोजगार मिलेगा जो कि सिर्फ बरगलाने वाला तर्क – मात्र  से ज्यादा कुछ  नहीं है क्योंकि उसके इस कदम से जितने लोगो को रोजगार मिलेगा उससे कई गुना ज्यादा लोगो की जैसे रेहडी-पटरी लगाने वाले,  फ़ल-सब्जी बेचने वाले, छोटे दुकानदार, इत्यादि प्रकार के मध्यम और छोटे व्यापारियों की रोजी-रोटी छिन जायेगी। इन छोटे व्यापारियों का क्या होगा,  इस सवाल पर सरकार मौन है,  और न ही सरकार के पास इनका कोई विकल्प है।

सरकार की दलील है कि भारत में एफडीआई की मंजूरी से किसानो को लाभ होगा उन्हें उनकी फसलों का उचित मूल्य मिलेगा और उपभोक्ताओं को भी सस्ते दामों पर वस्तुएं उपलब्ध होगीं। पर वास्तविकता इससे कही परे है। एक उदहारण से सरकार के इस तर्क को समझने का प्रयास करते है। मान लीजिये टमाटर का खुला बाजार मूल्य 30 रुपये किलो है तो वालमार्ट जैसी अन्य विदेशी कम्पनियाँ जिनके पास अथाह पूंजी है वो 28 रुपये किलो बेचेंगी क्योंकि उनके पास अपने “गोदाम” होंगे जिसमे वो वस्तुओ का स्टॉक रखेंगे और उसके सही मूल्य की प्रतीक्षा करेंगे,  और फिर मीडिया रोजाना इनकी यह कहकर मार्केटिंग करेगी कि “देश में महंगा और विदेश में सस्ता ” अर्थात खुली मंडी में टमाटर 30 रुपये किलो है और वालमार्ट जैसी अन्य कंपनियों के आउटलेट्स में टमाटर 28 रुपये किलो है।  वालमार्ट की वस्तुयों को सस्ता बेचने की स्ट्रेटेजी यही होगी कि कोई ये लाला जी की तरह दस – बीस किलो समान नहीं खरीदेंगे अपितु ये सीधा सैकड़ों – हजारों टन माल एक साथ लेकर अपने गोदामों में भर लेगें ( किसानो की खडी फसल को ही खरीद सकते है / उनको आर्थिक मदद कर उनसे बारगेन कर सस्ता मूल्य लगा सकते है )। जिससे ये  इतनी  बड़ी मात्रा में समान खरीदेंगें अथवा अडवांस में ही उनकी आर्थिक मदद कर देंगे  वो दुकानदार तो अन्य के मुकाबलें में उसे सस्ते मूल्य पर ही देंगा। परिणामतः इनको 28 रुपये किलो टमाटर बेचने में भी ज्यादा घाटा नहीं होगा।

एक बेरोजगारी का अन्य उदहारण लेते हैं – अभी गांवों में छोटे – छोटे फोटोग्राफर फोटो खीचने की दुकान से अपना रोजगार करतें है। परन्तु वालमार्ट एटीएम्  की तर्ज पर फोटो खीचने वाली जैसी मशीने लगायेंगे।  उसमे आपको 10 का नोट डालना होगा और आपकी चार फोटो तत्काल मिल जायेगी। लेकिन उस छोटे फोटोग्राफर के रोजगार का क्या होगा ? सरकार के पास इस समस्या का न तो कोई समाधान है और न ही कोई विकल्प। इस तरह से बेरोजगारी की सबसे बड़ी  मार ऐसे ही छोटे एवं मझले व्यवसायियों पर ही पड़ेगी।  भारत के ग्रामीण क्षेत्र में महिलाओं की बहुत बड़ी ऐसी आबादी है जो कि अपने आँगन अथवा घर के एक हिस्से में बागवानी कर मेंथी, प्याज, मूली,  गोभी, बैगन इत्यादि फसलें उगाकर पास के हाट – बाजार  में बेंच आती है यही उनका रोजगार हो जाता है। परन्तु वालमार्ट के आ जाने से सबसे ज्यादा असर ऐसे ही लोकल बाजारों पर पड़ेगा क्योंकि लोग वालमार्ट के एसी और म्युज़िक जैसी आधुनिकतम टेक्नोलोजी से सराबोर रोशनी की चमक से चमकते हुए आउटलेट्स में जाना पसंद करेंगे जहां उन्हें सेल्स पर्सन अपनी मनभावन मुस्कान से अपनी ओर आकर्षित करेंगे  न कि मिट्टी से सने हुए हाट-बाजारों में जहां दुकानदारों के चिल्लाने की कर्कस आवाज सुनायी देती हो।

सरकार का एक तर्क यह है कि 10 लाख की आबादी तक के शहर मे ही इनको अपने आउटलेट्स खोलने की इज़ाज़त होगी (परंतु बाद मे यह सीमा किमी. के आधार पर हो जायेगी)। सरकार का दूसरा तर्क यह है कि खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश से किसानो को लाभ होगा। पर यह सच नहीं है क्योंकि वालमार्ट इत्यादि भारत में व्यवसाय करने के लिए आयेंगे जिनका उद्देश्य अधिक से अधिक लाभ कमाना होगा न कि किसी सहकारी समिति की तरह किसानों को लाभ पहुँचाना होगा। आजादी के बाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरु से लेकर अब तक कृषि जगत में बुनियादी तौर पर कई  प्रमुख समस्याएँ जैसे सड़क, भण्डारण,   बिजली, सिचाई, उन्नत बीज, खाद, और उनकी मार्केटिंग इत्यादि बनी रहीं है। पर पहली सबसे प्रमुख समस्या है भण्डारण की जो कि सीधे तौर पर सरकार की जिम्मेदारी है। परन्तु सरकार किसानो  को भण्डारण की उचित सुविधा मुहैया कराने में असफल रही है। परिणामतः गोदामों में अथवा खुले आसमान के नीचे अनाज सड़ जाता है पर भुखमरी से मरते लोगों तक अनाज नहीं पहुँच पाता है। एक सर्वे के अनुसार भारत सरकार का बजट लाखों – करोड़ों में होता है और समूचे देश में भण्डारण – व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए मात्र 7687 करोड़ रुपये की लागत आयेगी। परन्तु सरकार इसको दुरुस्त करने की बजाय तथा अपनी कमियों को छुपाने के लिए विदेशी निवेशको को ला रही है यह अपने आप में आश्चर्यजनक है।

दूसरी प्रमुख समस्या है सड़क परिवहन की। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार  भारत में 3 .3 मिलियन किमी. सड़क नेटवर्क है जो की विश्व में दूसरा सबसे बड़ा नेटवर्क है।  इस वर्ष केन्द्र सरकार ने 5694 कि0मी0 सड़कों को राष्ट्रीय राजमार्ग के रूप में घोषित किया है।  इससे नौवीं योजना अवधि (1997 से आगे) में घोषित कुल राष्ट्रीय राजमार्गों की लंबाई 23,439 किमी. हो गई है। राष्ट्रीय राजमार्गों के विकास के लिए केंद्र सरकार सीधे तौर पर जिम्मेदार है परन्तु राज्यीय राजमार्ग और प्रमुख जिला राजमार्ग का विकास पी. डब्ल्यू. डी. विभाग देखता है तथा जिला और ग्रामीण सडकों का विकास स्थानीय प्राधिकरणों जैसे पंचायत व नगर पालिकाओं की देख-रेख में होता है। भारत की 30 लाख किलोमीटर से अधिक सड़कों में से राष्ट्रीय राजमार्ग लगभग दो प्रतिशत है, राज्यों के राजमार्ग चार प्रतिशत, जबकि 94 प्रतिशत जिला और ग्रामीण सड़कें हैं। और यहीं पर केंद्र-राज्यों के बीच फंड को लेकर खींच-तान में आपूर्ति-श्रृंखला संरचना ढह जाती है।

तीसरी प्रमुख समस्या है विद्युत् उत्पादन की। विद्युत् मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2010 – 2011 के दौरान सभी स्रोतों से कुल विद्युत् उत्पादन 811 .143 बिलियन यूनिट हुआ।  मांग अधिक और सप्लाई कम होने की वजह से नियमत: बिजली जाती रहती है, जो कोल्ड-चेन के परिचालन को बेहद मुश्किल बना देती है। बड़े रिटेलर अपने स्वार्थ हेतु भण्डारण की व्यवस्था को तो सुधार सकते है परन्तु सड़क और बिजली के इस मुद्दे को नहीं सुलझा सकते। सरकार अपनी इन प्रमुख नाकामियों में सुधार करें न कि अपनी जिम्मेदारी से पीछे भागे और अपनी कमियों को ढकने के लिए वालमार्ट  जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को खुदरा क्षेत्र में प्रवेश देने के नाम पर करोड़ों लोगों को बेरोजगार कर उन्हें सड़क पर ले आये। बाद में यही बेरोजगार लोग लोग देश के विकास में अवरोध बनकर सरकार का सबसे बड़ा सिरदर्द बनेगें। सरकार विदेशी निवेश से महंगाई कम होने का तर्क भी दे रही है क्योंकि इनके आ जाने से करीब भारतीय अर्थव्यवस्था में अनुमानित 400  करोड़ डॉलर का निवेश होगा। जो कि शुरुआती दौर में अवश्य ही भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सही हो पर  बाद में ये कम्पनियाँ यही से अपना फंड जनरेट करेंगी। साथ ही हमें यह समझना होगा कि अभी भारत की हालत कोई चंद्रशेखर के प्रधानमंत्री कार्यकाल की तरह नहीं है कि हमें विदेशों से कर्ज लेकर अपनी अर्थव्यवस्था को बचाना पड़ेगा।

हर तरफ फजीहत करवाने के बाद वर्तमान सरकार बड़े उद्योगपतियों को खुश करने के लिए आर्थिक सुधार के नाम पर एक के बाद एक जैसे विरोधों के बावजूद मैनिफैक्चरिंग पालिसी को मंजूरी, पेंशन फंड के बारे में संसद की स्थाई समिति की गारंटीशुदा आमदनी की सिफारिशों को ताक पर रखते हुए पी.एफ.आर.डी.ए कानून में संशोधन करके विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने के प्रस्ताव को मंत्रिमंडल द्वारा मंजूरी देना आदि जैसे फैसलों से सरकार अपनी कटिबद्धता एवं गंभीरता दिखाना चाहती है। इसके अलावा एयरलाइन्स उद्योग में विदेशी निवेश के साथ – साथ शेयर बाजार में क्यूएफआई अर्थात बड़े विदेशी निवेशकों को शेयर बाज़ार में  सीधे निवेश करने की इजाजत देने की तैयारी भी कर चुकी है। भारत जैसा देश जहां की आबादी लगभग सवा सौ करोड़ हो,  आर्थिक सुधार की अत्यंत आवश्यकता है परन्तु आर्थिक सुधार भारतीयों के हितों को ध्यान में रखकर करना होगा न कि विदेशियों के हितो को ध्यान में रखकर।

वर्तमान  सरकार भी इटली, पुर्तगाल, स्पेन, इत्यादि देशों की नक़ल कर बड़े उद्योगपतियों को खुश करने के लिए सारा बोझ आम जनता पर ही डाल रही है। सामान्यतः बड़े – बड़े उद्योगपति सार्वजानिक रूप से बयान नहीं देते परन्तु अभी हाल के दिनों में जिस तरह से बड़े उद्योग घरानों ने सार्वजानिक बयान दिए उससे लगता है कि सरकार दबाव में आ गयी है और जल्दबाजी में बिना किसी की सलाह लिए खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष पूंजी निवेश ( एफडीआई ) जैसा निर्णय  ले लिया। चंद बड़े उद्योग घरानों को खुश करने के चक्कर में सरकार ने करोड़ों लोगो को हासिये पर क्यों रखा यह अपने आप में ही एक प्रश्न है ? अपने को आम जनता की सरकार कहलाने वाली सरकार की जनता के प्रति उसकी संवेदना क्या है,  एफडीआई के फैसले से जाहिर होता है।पिछले कई दिनों पर नजर दौडायेंगे  तो पाएंगे कि आम जनता का  बड़े बड़े उद्योगपति कभी एटमी बिजली संयंत्र के नाम पर, कभी ऑटोमोबाइल सेक्टर में, कभी अल्य्मुनियम संयंत्र के नाम पर विरोध झेल रहे है जिससे उनकी पूंजी का बहुत नुक्सान हो रहा है परिणामतः वो बहुत नाराज है। अतः सरकार जल्दबाजी में बिना किसी से सलाह किये चाहे वो राजनैतिक पार्टियाँ हो अथवा आम जनता लगातार फैसले लेकर अपने को मजबूत इच्छाशक्ति वाली सरकार दिखाना चाहती है जो कि इस सरकार की  हठ्धर्मिता का परिचायक है।  सरकार किसके इशारे पर और किसको खुश करने के लिये आर्थिक सुधार के नाम इतनी जल्दबाजी में फैसले ले रही है असली मुद्दा यह है।

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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