/ISI एजेंट फई के खर्चे पर मौज करते थे पत्रकार, अब मंत्रियों पर निकाल रहे हैं भड़ास

ISI एजेंट फई के खर्चे पर मौज करते थे पत्रकार, अब मंत्रियों पर निकाल रहे हैं भड़ास

कुछ नामचीन पत्रकारों के लिए बेहद खुशी भरी खबर है। अमेरिका में पकड़े गए  आईएसआई के कश्मीरी अलगावादी एजेंट गुलाम नबी फई ने दावा कर दिया कि उसने पिछले दो दशकों में भारत सरकार के कई मंत्रियों से नियमित तौर पर मुलाकात की थी। सभी अखबारों और चैनलों ने इस खबर को प्रमुखता से छापा और दिखाया। इन खबरों में कहीं भी इस बात का ज़िक्र नहीं आया कि यह वही फई है जिससे उसकी स्पॉन्सर्ड यात्रा पर मिलने जाने वालों की फेहरिस्त में दिलीप पडगांवकर और कुलदीप नैयर जैसे दर्जन भर पत्रकार शामिल थे।

खबरों में इस बात का ज़िक्र है कि फई ने भारतीय दूतावास के साथ बातचीत का एक जरिया भी बना लेने की बात कही है, लेकिन इन बातचीतों में पत्रकार भी शामिल रहे थे इसका जिक्र कहीं नहीं है। 62 साल के फई ने अमेरिकी अदालत में आईएसआई एजेंट होने का आरोप स्वीकार किया था। उसने एक बयान में कहा है कि भारत के मंत्रियों और अधिकारियों से मिलना और नई दिल्ली के साथ संवाद कायम करना रणनीति का हिस्सा था। हालाकि, भारत सरकार ने फई के इस दावे को खारिज कर दिया है।

ग़ौरतलब है कि फई के सेमिनारों में भाग लेने के लिए उसके खर्चे पर जाने वालों में मशहूर पत्रकार दिलीप पडगांवकर, कुलदीप नैयर, राजेंद्र सच्चर, गौतम नवलखा, हरिंदर बवेजा, मनोज जोशी, हामिदा नईम, वेद भसीन, अलगाववादी नेता मीरवाइज़ उमर फारूक और जेडी मोहम्मद समेत तमाम भारतीय रहे हैं।

फई ने अपने बयान को ‘कश्मीर मेरे लिए क्यों महत्वपूर्ण है’ का नाम दिया है। उसने लिखा है, ”बीते 20 वर्षों के दौरान मैंने संयुक्त राष्ट्र महासचिव के पूर्व वरिष्ठ सलाहकार यूसुफ बक और ‘वर्ल्ड कश्मीर फ्रीडम मूवमेंट’ के अध्यक्ष रहे मरहूम अयूब ठुकेर के साथ चंद्रशेखर, नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल के कई सदस्यों से मुलाकात की थी।”

हालांकि फई ने पीटीआई की ओर से ईमेल के जरिए भेजे गए सवाल का जवाब नहीं दिया। इस सवाल में उन भारतीय मंत्रियों और अधिकारियों के नाम मांगे गए थे, जिनसे आईएसआई के इस एजेंट ने कथित तौर पर मुलाकात की थी। फई ने दावा किया है, ”बीते 11 वर्षों के दौरान मैंने भारतीय दूतावास के चार अलग-अलग अधिकारियों से मुलाकात की थी। ये अधिकारी एक के बाद एक यहां तैनात हुए थे और इन लोगों ने अपने जाने की स्थिति में नए अधिकारी से मेरा परिचय करवाया।”

वॉशिंगटन स्थित भारतीय दूतावास ने भी फई के दावे से जुड़े पीटीआई के सवाल का जवाब नहीं दिया। दूतावास से ईमेल के जरिए सवाल पूछा गया था कि क्या फई का दावा सही है और अगर यह सत्य है तो किन अधिकारियों ने उससे मुलाकात की थी? फई के मुताबिक यह हमेशा से उसकी आदत रही है कि भारतीय दूतावास के साथ संवाद का माध्यम बनाकर रखा जाए।

उसने कहा है, ”मैं 1999 से भारतीय दूतावास के अधिकारियों से समय-समय पर मिलता रहा था। यह मुलाकात हर महीने और कभी-कभी दो महीने पर होती थी। मार्च, 2006 से हम हर महीने मिलते थे और कई बार महीने में दो बार भी मुलाकात हो जाती थी। कश्मीर पर हम जब भी संगोष्ठि अथवा सम्मेलन का आयोजन करते थे तो मैं भारतीय राजदूत को बतौर वक्ता उपस्थित होने का निमंत्रण देता था।”

फई ने कहा, ‘भारतीय दूतावास के अधिकारियों के साथ सूचनाओं का आदान-प्रदान करने और पहले से ही ब्यौरा हासिल करने की मुझे आदत थी। भारतीय राजदूत के लिए निमंत्रण पत्र मैं उस अधिकारी को देता था, जिससे अक्सर मेरी मुलाकात किसी सार्वजनिक कैफ़िटीरिया में होती थी।’

फई ने माना है कि उसने निजी तौर पर गलतियां की हैं और उसे इसका गहरा अफसोस भी है। उसका दावा है कि वह कश्मीर की आजादी के लिए लड़ रहा था, हालांकि इसके विपरीत उसने अदालत में स्वीकार किया था कि वह पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के लिए जासूसी करता था। वर्जीनिया की एक अदालत में बीते सप्ताह फई ने स्वीकार किया उसने आईएसआई से गोपनीय माध्यमों से धन हासिल किया, जिससे अमेरिकी सरकार को दो से चार लाख डॉलर का नुकसान हुआ। वह ‘कश्मीरी अमेरिकन काउंसिल’ नामक संगठन चलाता था।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.