/”क्या मीडिया की निंदा करने वाले खुद अपनी गिरेबान में झांकते हैं?” – एन. के सिंह

”क्या मीडिया की निंदा करने वाले खुद अपनी गिरेबान में झांकते हैं?” – एन. के सिंह

शरद पवार को चाटा पड़ा, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इसे घंटो नॉन स्टॉप दिखाया

चाटा एक बार पड़ा और ऐसे दिखाया गया जैसे एक लंबे समय से शरद पवार चाटा ही खा रहे हैं। तीन घंटे बाद वैल्यू एडिशन करते हुए मीडिया ने कहा ‘महंगाई का चाटा।’ तर्कशास्त्र में माना जाता है कि इंडीविजुअल घटना को अगर जर्नलाइज्ड फॉर्मेट में डाल दिया जाए तब वजन और विसनीयता बढ़ती है। जैसे ही हेडलाइन में ‘महंगाई का चाटा’ रूपी वैल्यू एडिशन दिया गया राजनीतिक वर्ग गुस्से में आ गया। सत्ता में बैठे लोगों से लेकर विपक्ष के धुर समाजवादी नेता तक एक बार फिर संसद में मीडिया को कोसने लगे।

यही काम मीडिया ने टीम अन्ना के सदस्य व सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण को मारे-पीटे जाने पर भी किया, यही काम चिदंबरम पर चप्पल फेंके जाने पर भी किया और यही काम राहुल गांधी को खुश करने के लिए जब उत्तर प्रदेश के दो वरिष्ठ नेताओं ने काला झंडा लहराने वाले एक व्यक्ति को लात और जूतों से मारा, तब भी किया; लेकिन तब राजनीतिक वर्ग को ऐतराज नहीं था। डर तब लगा जब मीडिया ने इसे महंगाई-जनित आक्रोश के रूप में बताना शुरू किया। राजनीतिक वर्ग का डर यह था कि तब तो सड़क पर निकलना ही मुश्किल होगा। अब इन स्थितियों को जरा उल्टा करके देखें। अगर मीडिया पवार की घटना को न दिखाए या कम करके दिखाए तब यह आरोप लगता कि मीडिया अज्ञात ताकतों के हाथों में खेल रही है।

अन्ना का धरना जब मीडिया ने कवर किया तब इन्ही लाल-बुझक्कड़ों ने कान के पास मुंह ले जाते हुए बताया, ‘मीडिया को टाटा का पैसा मिला है।’ बात हल्की न जाए तो आगे तर्क दिया- ‘दरअसल, टाटा भी भ्रष्टाचार के शिकंजे में फंसने जा रहे थे तब जनता का ध्यान हटाने के लिए मीडिया को अन्ना की तरफ लगा दिया।’ ये लाल-बुझक्कड़ अपनी मानसिक भड़ास में तर्क का छौंका मारने के लिए अक्सर टाटा, अंबानी या अदृश्य कॉरपोरेट घराना टाइप शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। बात को ज्यादा पुख्ता करना हो तब अमेरिका का भी नाम रख लेते हैं।

मीडिया पर पेशेवराना ढंग से आरोप लगाने वाले कुंठित वर्ग तीन तरह का हैं। पहला वह जो कि हर प्रतिष्ठापित संस्था को ध्वस्त करने के लिए चाय की दुकान से इंडिया इंटरनेशनल सेंटर तक के सेमिनार में अंग्रेजी बोलकर चुनिंदा तर्कवाक्यों का इस्तेमाल करता है, अच्छे जुमलों का इस्तेमाल करता है और लगता है कि कोई दूर की कौड़ी लाया है।

यह वो वर्ग है जो अद्वैतवाद से अवमूल्यन तक किसी भी विषय पर पक्ष में या विपक्ष में उसी शिद्दत से बोल सकता है। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हुए ऐसे सेमिनार-कम-डिनर-कम-दारू पार्टी में दो पेग के बाद यह चेहरे पर गंभीरता लाते हुए कहता है, ‘यू नो पॉवर्टी इज अ सीरियस प्रॉब्लम इन दिस कंट्री’, और फिर पलट कर आयोजकों से कहता है- कल वापसी का टिकट मॉर्निंग फ्लाइट से कराया है? यह वो वर्ग है जो सरकारी इमदाद के रूप में पदों को हासिल करता है, सत्ता सुख का भोग करता है और जब तक सत्ता सुख तब तक जिस संस्था को चाहे गाली दिलवा लें।

दूसरा वर्ग है उन लोगों का है जिन्होंने मीडिया को कुछ नजदीक से देखा हैं। इसमें शुमार लोग विविद्यालयों में कार्यरत हैं और लोकप्रियता के लिए गाहे-बगाहे मीडिया की धज्जियां उड़ाते हैं। टीवी चैनलों में भी जाकर क्रांतिकारी भाव से मीडिया के खिलाफ बोलते हैं। चूंकि भ्रष्टाचार कर नहीं सकते इसलिए पहचान के लिए एक विरोधी भाव अख्तियार कर लेते हैं। एक तीसरा वर्ग है जो सबसे ज्यादा घातक है।

घातक इसलिए कि अगर आप किसी संस्था में रहते हुए उस संस्था की नैतिक आधार पर बुराई करते हैं तब आम धारणा यह बनती है कि आप वह नहीं हैं जो अन्य हैं। यह वो वर्ग है जो कि मीडिया से न केवल आजीविका हासिल करता है बल्कि लाखों रुपए की तनख्वाह महीने में खींचता है लेकिन समाजवादी चेहरा बनाए हुए अपने को बाकी सबसे अलग बताता है। पूंजीपति की खाता है और बिरादरी के सभी लोगों को समाजवादी मूल्यों से विरत होने के लिए गाली देता है।

मीडिया की आलोचना का आशय सुधार होना चाहिए, न कि दुकानदारी खड़ी करना। जनता ने जब मीडिया की बुराई की तब मीडिया के एक बड़े वर्ग ने इसे सार्थक भाव से देखा और सुधार के लिए कोशिश करने लगे। चूंकि मीडिया खासकर न्यूज चैनल्स का कंटेंट डिलीवरी सिस्टम एक जटिल प्रक्रिया से गुजरता है इसलिए मानदंड बनाने में समय लगता है। शरद पवार को चाटा मारना, दिखाया जाना इस बात का संदेश दे सकता है कि एक पागलपन की घटना को बार-बार दिखाकर मीडिया बेवजह तूल दे रहा है और एक मंत्री का अपमान कर रहा है। लेकिन जरा दूसरा पहलू देखें।

अगर इसे हम न दिखाएं या कम दिखाएं तब हम अपने उस कर्तव्य से विमुख होते हैं जिसके तहत यह बताना जरूरी है कि देश के केंद्रीय मंत्री को भी आम व्यक्ति चाटा मार सकता है और वह भी उस माहौल में जहां आतंकवाद पैर पसार चुका है। एक अन्य मजबूरी समझें। हर क्षण कुछ नए दर्शक खबरिया चैनलों से जुड़ते हैं, क्या इस खबर से उन्हें वंचित किया जा सकता है? अखबार तो 24 घंटे में एक बार निकलता है लेकिन चैनल आपको हर क्षण खबर अपडेट करने के भाव में रहता है। यह भी संभव नहीं है कि बगैर चाटा दिखाए चाटा मारने वाले को गिरफ्तार होना दिखाएं क्योंकि तब हम खबर का मूल दिखाए बगैर प्रभाव दिखाने लगेंगे जो तकनीकी रूप से गलत होगा।

आज भारत में दंगे या तो होते नहीं हैं या होते हैं तो व्यापक रूप नहीं ले पाते। इसकी वजह यह है कि अगर घटना हुई तो 15 मिनट के अंदर मीडिया वहां पहुंच जाती है और चार घंटे के अंदर देश के किसी भी कोने में ओबी वैन तैनात हो जाती है। लिहाजा उपद्रवी यह जान जाता है कि शुरूआती दंगों के क्षणों को छोड़ दें तो कैमरे से बचना मुश्किल है।

लेकिन इसी के साथ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की एक और समस्या है कि अगर कैमरा सामने हो तो कई बार उपद्रवी अपने नेता को खुश करने के लिए बढ़-चढ़ कर उपद्रव करता है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं द्वारा एक अन्य पार्टी के कार्यकर्ता को लात-जूतों से पीटना भी इसी श्रेणी में आता है। इस तरह की घटनाओं पर अंकुश के लिए ब्रॉडकास्ट एडीटर्स एसोसिएशन ने फैसला लिया कि किसी भी पूर्वनियोजित उपद्रव को कवर नहीं किया जाएगा, कैमरे नहीं लगाए जाएंगे।

मीडिया विरोधियों को यह समझना चाहिए कि मीडिया की सामाजिक उपादेयता और प्रजातंत्र में इसके स्थान के मद्देनजर इसकी निंदा तो की जा सकती है पर इसे नियंत्रित करने की अवधारणा अनुचित होगी।

(एन.के.सिंह ब्रॉडकास्ट एडीटर्स एसोशिएसन के महासचिव हैं। लेख साभारः समयलाइव)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.