/गोल्ड सुख की राह पर कई कंपनियां, पुलिस का दामन भी नहीं बेदाग

गोल्ड सुख की राह पर कई कंपनियां, पुलिस का दामन भी नहीं बेदाग

गोल्ड सुख के बाद अब जयपुर में गोल्डरस ट्रेड इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और स्वर्णयुग नाम की दो और चिटफंड कंपनियों ने लोगों को करोड़ों का चूना लगाया है। पुलिस ने इस मामले में दोनों कंपनियों के कंपनी के मैनेजरों समेत 10 लोगों को गिरफ्तार कर लिया है। गोल्डरस ट्रेड इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर विकास जैन को पुलिस ने धर दबोचा है, लेकिन स्वर्णयुग के 3 डायरेक्टर पहले ही फरार हो चुके हैं। गोल्डरस ट्रेड इंडिया पर 1100  और स्वर्णयुग पर करीब 1500 निवेशकों को ठगने का आरोप है।

उधर खबर है कि गोल्ड सुख ठगी कांड में एपीओ हुए तीन पुलिस इंस्पेक्टरों में से एक की गिरफ्तारी हो सकती है। शुरुआती जांच में पाया गया है कि इंस्पेक्टर साहब गोल्ड सुख को सुख-सुविधा पहुंचाते थे। चर्चा ये भी है कि कुछ आला अधिकारियों की पत्नियों ने भी इन कंपनियों से करोड़ों के वारे-न्यारे किए हैं।

कमिश्नरेट और पुलिस मुख्यालय स्तर से इस बात की जांच की जा रही है कि इंस्पेक्टर की लापरवाही से गोल्ड सुख को लाभ पहुंचा या फिर गोल्ड सुख के डायरेक्टरों से इसकी मिलीभगत थी। मिलीभगत साबित होने पर गिरफ्तारी हो सकती है। पुलिस अपने इस इंस्पेक्टर की कॉल डिटेल निकलवा रही है। इससे यह साफ हो जाएगा कि कंपनी के डायरेक्टरों से इस इंस्पेक्टर की बात होती थी या नहीं। अगर होती थी तो कितनी लंबी और दिन में कितनी बार। कंपनी के खिलाफ दर्ज मामलों में एफआर लगाने में इस इंस्पेक्टर की खासी भूमिका रही।

बताया जा रहा है कि एक पुलिस इंस्पेक्टर ने अपने बच्चों का राजस्थान से बाहर एक कॉलेज में करीब एक करोड़ रुपए डोनेशन देकर ऐडमिशन कराया था। यह इंस्पेक्टर गोल्ड सुख मामले में चर्चा में रहा था। अब पुलिस महकमे में इस सवाल पर चर्चा हो रही है कि इंस्पेक्टर के पास एक करोड़ रुपए कहां से आए?

कमिश्नरेट में तैनात कुछ आईपीएस अधिकारियों पर भी ठगों से फायदा उठाने की चर्चा है। एक अधिकारी तो बौखलाहट में पुलिस इंस्पेक्टरों पर बरस भी चुके हैं। उन महोदय ने बैठक में साफ कह डाला कि गोल्ड सुख मामले में उनके नाम को लेकर जबरन अफवाहें फैलाई जा रही हैं। बकौल उनके, वे यह भी जानते हैं किन-किन पुलिस अधिकारियों ने मीडिया को उनके बारे में बताया।

पुलिस महकमे में यह भी चर्चा है कि गोल्ड सुख कंपनी के डायरेक्टर एक पुलिस इंस्पेक्टर को मोटी रकम देते थे। इस इंस्पेक्टर के माध्यम से ही यह रकम पुलिस मुख्यालय तक पहुंचती थी। हालांकि दूसरी चर्चा ये भी है कि इन अधिकारियों ने अपनी-अपनी पत्नियों और रिश्तेदारों के नाम से कंपनी में पैसा लगाया था और चेन सिस्टम में अपने मातहत पुलिसकर्मियों का पैसा लगवा कर खूब मुनाफा कमाया है।

अब पुलिस मुख्यालय के आला अधिकारी इस बात की जांच कर रहे हैं कि गोल्ड सुख से मोटी रकम किस-किस अधिकारी के पास पहुंचती थी, लेकिन ये जांच कितनी निष्पक्ष रहेगी यह कहना मुश्किल है। दिलचस्प बात यह है कि अभी भी कई चिटफंड कंपनियां इन्हीं अधिकारियों की मदद से मोटी रकम वसूलने में बेरोक-टोक जुटी हैं और पुलिस ठगों के भाग जाने के बाद मिलने वाली शिकायतों का इंतजार कर रही है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.