Loading...
You are here:  Home  >  मीडिया  >  Current Article

जब मौका आया खुद को सम्मानित करने का तो पत्रकार कैसे चूकते भला?

By   /  December 29, 2011  /  2 Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

नागपुर का तिलक पत्रकार भवन शुक्रवार को बूढ़े पत्रकारों के अजीबोगरीब सम्मान का गवाह बना। लंबे समय से पत्रकारिता कर रहे पत्रकारों को जब पुरस्कृत करने के लिए कोई बड़ा राजनीतिज्ञ नहीं मिला तो खुद ही आयोजन किया और खुद ही अपने आपको थोक में पुरस्कृत भी कर लिया।

विधानसभा का शीतसत्र उपराजधानी में खत्म हुआ। सरकार के अलविदा कहते-कहते पत्रकारों को अपना ही सम्मान करवाने की सूझी। मुख्यमंत्री से समय मांगा। सीएम समझ गए कि बूढ़े पत्रकारों की पत्रकारिता अब कुछ गिने-चुने दिनों की बची है, लिहाजा, आकर टाइम खराब करना उचित नहीं। यही सीएम पिछले वर्ष नागपुर के ही डा.वसंतराव देशपांडे सभागृह में श्री अरविंदबाबु देशमुख पत्रकारिता पुरस्कार वितरण समारोह में युवा पत्रकारों को पुरस्कृत करने मंत्रीमंडल के साथ दौड़े आए थे। डिप्टी सीएम भी कम चलाक नहीं निकले, उन्होंने भी सोचा कि शीतसत्र की के समापन पर जाते-जाते पत्रकारों के कार्यक्रम में हो आते हैं। बूढ़े पत्रकारों का ही सम्मान है तो क्या हुआ, सम्मान के मौके पर ऐसे पत्रकार कूद-कूद कर उनके साथ फोटो खिंचवाएंगे। इससे उनके खिलाफ खबरों के तेवर नरम रहेंगे। इतना ही नहीं, इनकी पीढ़ियां तो इस तस्वीर को अपने ड्राइंग रूम में सजा कर रखेंगी।

राजनीति के खिलाड़ी डिप्टी सीएम अजीत पवार भी मनोविज्ञान जानते हैं, उन्होंने सम्मान के साथ-साथ बूढ़े पत्रकारों को नसीहत भी दे दी। पेड न्यूज ने समाचार पत्रों की विश्वसनीयता को चोट पहुंचाई है। पत्रकारिता की साख तभी रहेगी, जब हिम्मत से बात लिखी जाएगी। पवार ने पत्रकारिता को पेड न्यूज से दूर रखने का आह्वान करते पहले की पत्रकारिता और आज की पत्रकारिता की तुलना किया। नसीहत दी कि कैसे कलम से जनमत बदले हैं। युवा पत्रकारों को ऐसी नसीहत तो समझ में आती है, लेकिन बुजुर्ग पत्रकारों को ऐसी नसीहत दी जाए तो समझने के लिए थोड़ी मथ्था-पच्ची करनी पड़ती है।

दरअसल कार्यक्रम में पुरस्कृत पत्रकारों में ऐसे कई नाम हैं जिनके बारे में संतरानगरी के लोगों में अच्छी प्रतिक्रिया नहीं रहती है। इन्हीं बुजुर्ग पत्रकारों के नेतृत्व में नागपुर की पत्रकारिता का बेड़ागर्क हुआ है। यदि ऐसा नहीं होता तो नागपुर आकर सरकार विदर्भ कि किसानों पर महज मरहम लगा कर नहीं चली जाती। उनकी विरासत को नागपुर की नई पत्रकार पीढ़ी लाद कर चल रही है। यदि इनकी कलम धार तिखी रहती तो पत्रकारों के बीच डिप्टी सीएम उनकी विश्वसनीयता की बात नहीं कहते। पूरे शीतसत्र के दौरान विधानमंडल की कार्यवाही की खबरे ही सुर्खियों में रही। लेकिन कभी ऐसे मुद्दे नहीं उछाले जिससे किसी विधायक का दिल रोता और वह विधानसभा में उस पत्र को लहराते हुए मुद्दा उठाता। तब इससे बड़ा सम्मान उस खबर लिखने वाले और अखबार टीम के लिए और क्या होता। ऐसा सम्मान तो मिला नहीं, इसलिए सम्मान के भूखे बूढ़े पत्रकारों ने खुद ही कार्यक्रम रखा और सम्मान करवा लिया। अन्य अतिथि मंत्री अनिल देशमुख ने स्थानीय नेता है। उन्हें तो नागपुर में ही निवास करना होता है। उन्होंने भी मौके को देखते हुए पत्रकारों को लालच का टुकड़ा घोषणा के रूप में फेंका। कह दिया कि मुंबई में पत्रकारों के लिए सरकार जैसे कार्यरत रहती है, वैसे ही नागपुर के पत्रकारों के लिए भी सुविधा उपलब्ध करानी चाहिए। पाठकों को बता दे की नागपुर ही नहीं पूरे महाराष्ट्र के पत्रकार कब से पत्रकारों पर होने वाले हमले के अपराधा को गैरजमानती बनाने की मांग कर रहे हैं, हर बार सरकार से मांग करते हैं, पर स्वर कभी गरजता नहीं है, सरकार के मंत्री जानते हैं कि ऐसे मिमीयाते स्वारों को ऐसे सम्मान समारोह में एक गुलदस्ता देकर साथ में फोटो खिंचवाल लो, साल भी कलम में जंक लगी रहेगी।

ये पत्रकार हुए सम्मानित-
अपने जीवन को पत्रकारिता में समर्पित (कथित रूप से) करने वाले अनेक पत्रकारों को सम्मानित किया गया। इनमें दैनिक भास्कर के समूह संपादक प्रकाश दुबे व समन्वयक संपादक आनंद निर्बाण को उपमुख्यमंत्री अजीत पवार के हस्ते स्मृतिचिन्ह, शाल देकर सम्मानित किया गया। इनके साथ वरिष्ठद्द पत्रकार मेघनाथ बोधनकर, मनोहर अंधारे, राधेश्याम अग्रवाल, राजाभाऊ पोफली, अमरेश प्रामाणिक, डीटी नंदपवार, राजू मिश्रा, पुरुषोत्तम दातीर, रमेश मालुलकर, गणेश शिरोले, शशिकुमार भगत, विश्वास इंदुलकर, उमेश चौबे, शिरीष बोरकर, विनोद देशमुख, मनीष सोनी, प्रभाकर दुपारे, बालासाहेब कुलकर्णी आदि वरिष्ठद्द पत्रकारों को उपमुख्यमंत्री के हस्ते सम्मानित किया गया। (विष्फोट की विष्फोटक रिपोर्ट)

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. Rachel says:

    That’s what we’ve all been waiting for! Great ponitsg!

  2. karnani says:

    जिन्होंने अपने जीवन को समाज के दिशा और दशा दिखाने में बिता दिया उनके सम्मान में
    राजनेता तो उदासीनता दिखाए लेकिन आप भी व्यंग कर रहे हो ठीक नहीं लगा पत्रकार अपना पूरा जीवन समाज को समर्पित करता है बुजुर्गो का सम्मान तो होना ही चाहिए

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

राजस्थान के पत्रकार सरकार के समक्ष घुटने टेकने पर विवश हैं..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: